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आवारा कुत्तों को रखने का मतलब यह नहीं कि आप लोगों के जीवन को प्रभावित करेंगे

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश की समरिन बानों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि आवारा कुत्तों को रखने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें सड़कों पर ले जाया जाए और लोगों के जीवन को प्रभावित किया जाए।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 65 से अधिक आवारा कुत्तों के संरक्षण की मांग करने वाली एक महिला की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसे उसे पालने का दावा किया गया था। न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील से एक अलग पीठ के समक्ष लंबित इसी तरह के मामले में अभियोग चलाने की मांग करने वाली याचिका दायर करने को कहा।
पीठ ने कहा कि आवारा पुत्तों को रखने का मतलब यह नहीं है कि आप उन्हें सड़कों पर ले जाएंगे। लड़ेंगे और लोगों के जीवन को प्रभावित करेंगे। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि जैसा कि बताया गया है कि इसी तरह के के मुद्दे पर एक अन्य पीठ मामले पर विचार कर रही है। वर्तमान रिट याचिका पर विचार नहीं किया जाता है।
समरिन बानो की याचिका पर हुई सुनवाई
शीर्ष अदालत मध्य प्रदेश की समरीन बानो की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि राज्य में आवारा कुत्तों की रक्षा नहीं की जा रही है। उसने आरोप लगाया कि अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं और 67 आवारा कुत्तों के लिए सुरक्षा की मांग की। जिन्हें उन्होंने पालने का दावा किया था।

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