कश्मीर ही उम्मीद की किरण है

भारतीय जनता पार्टी अपने आप को राष्ट्रवादी मानती है और गुजरात में सरदार सरोवर बांध के पास नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल की एक ऊंची मूर्ति का नाम दिया है एकता की मूर्ति। किंतु इनकी पूरी राजनीति हिन्दू-मुस्लिम को बांटने के आधार पर चलती है। ताजा उदाहरण तो बहुत ही शर्मनाक है।
भाजपा ने जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा को एक ज्ञापन देकर मांग की है कि इस वर्ष श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय, कटरा में एम.बी.बी.एस. में हुए दाखिले रद्द किए जाएं क्योंकि इसमें 50 में से 42 मुस्लिम छात्र हैं। आम-तौर पर हिन्दुत्ववादी सोच वाले लोग आरक्षण का विरोध करते हैं एवं काबिलियत को महत्व देते हैं। लेकिन उन्होंने उप-राज्यपाल से इस विश्वविद्यालय में सौ प्रतिशत हिन्दू छात्रों के लिए आरक्षण की मांग की है क्योंकि उनका कहना है कि यह विश्वविद्यालय हिन्दू श्रद्धालुओं के दान से बना है। विधान सभा में विपक्ष के नेता भाजपा के सुनील शर्मा कहते हैं कि श्रद्धालुओं की भावना का ध्यान रखा जाए। जम्मू-कश्मीर के ही राजौरी जिले की मंजाकोट तहसील में मात्र एक हिन्दू परिवार है जिसकी किराने की दुकान है। उसके ग्राहक वहां की मुसलमान आबादी है। अब इस हिन्दू परिवार की कमाई को हिन्दू माना जाए अथवा मुसलमान?
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने स्पष्ट किया है कि इस विश्वविद्यालय को राज्य सरकार की ओर से पिछले वर्ष रुपए 24 करोड़ और इस वर्ष रुपए 28 करोड़ मिले हैं। यह कितने शर्म की बात है कि भाजपा अब शैक्षणिक संस्थानों में काबिलियत के बजाए धर्म के आधार पर दाखिले की बात कर रही है। इसके कितने खतरनाक परिणाम हो सकते हैं इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। इस मामले में मदन मोहन मालवीय की तारीफ करनी पड़ेगी जिन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनाया लेकिन कहा कि ’भारत सिर्फ हिन्दुओं का देश नहीं है। यह मुस्लिम, इसाई व पारसियों का भी देश है। यह देश तभी मजबूत व विकसित बन सकता है जब भारत में रहने वाले विभिन्न समुदाय आपसी सौहाद्र्य के साथ रहेंगे। ये मेरी आशा और प्रार्थना है कि जीवन व प्रकाश का यह जो केन्द्र अस्तित्व में आ रहा है उससे ऐसे छात्र निकलेंगे जो न सिर्फ बौद्धिक रूप से दुनिया की दूसरी जगहों से निकलने वाले छात्रों की बराबरी कर सकेंगे बल्कि एक उत्कृष्ट जीवन जी सकेंगे, अपने देश से प्रेम करेंगे तथा सर्वोच्च सत्ता के प्रति वफादार रहेंगे।’ मालवीय जी, जो हिन्दू समासभा से भी जुड़े हुए थे, सही अर्थों में राष्ट्रवादी थे जबकि वर्तमान भाजपा के नेताओं की सोच संकीर्ण ह,ै जिनका राष्ट्रवाद हिन्दूत्व के दायरे तक ही सिमट कर रह जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि कौन सी सोच देशहित में है।
इस बांटने वाली राजनीति से भाजपा को मत मिलते हैं इसलिए वह इसी राजनीति को आगे बढ़ा रही है। उसे देश से कोई मतलब नहीं है। किंतु गनीमत है कि सारे लोग अभी इस राजनीति का शिकार नहीं हुए हैं। जम्मू-कश्मीर में ही एक ऐसी घटना घटी है कि लगता है महात्मा गांधी ने कश्मीर के बारे में जो कहा था कि यहां उम्मीद की किरण दिखाई पड़ती है वह कितनी सच बात है।
जम्मू के नरवल इलाके में जम्मू विकास प्राधिकरण, जिसके उपाध्यक्ष, रूपेश कुमार, उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा नियुक्त किए गए हैं, पत्रकार अरफाज़ डैंग के 3 मरले अथवा 0.01875 एकड़ पर बने 40 वर्ष पुराने घर को अवैध कब्जा बताकर बुलडोजर से गिरवा दिया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह के अनुसार यह कार्यवाही बिना उनकी सरकार की अनुमति के की गई है। इससे पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार कौन चला रहा है। लेकिन जो सुखद आश्चर्य की बात हुई वह यह कि पड़ोसी कुलदीप शर्मा ने पत्रकार डैंग के परिवार को नया घर बना कर रहने के लिए पहले से ज्यादा जमीन 5 मरले या 0.0312501 एकड़ दान में दी है। कुलदीप शर्मा का कहना है कि जिन्होंने अरफाज़ का घर गिराया वे संवेदनहीन लोग थे और उनसे यह देखा नहीं गया कि पूरा परिवार सड़क पर आ गया। कुलदीप शर्मा कोई अमीर आदमी नहीं हे। इसके बावजूद उन्होंने यह भी कहा कि यदि जम्मू विकास प्राधिकरण उनकी जमीन पर बने घर को भी गिराने आया तो वे अरफाज़ के परिवार को दोगुनी और जमीन देंगे। कुलदीप शर्मा का कहना है कि अरफाज कोई अजनबी नहीं, उनका पड़ोसी है और अगर उन्हें भीख भी मांगनी पड़ी तो वे उसके घर का पुनर्निर्माण करेंगे। जबकि भाजपा लगातार नकारात्मक राजनीति कर रही है कुलदीप शर्मा ने अपने फैसले से एक माकूल जवाब देकर भाजपा को शर्मसार किया है।
कुलदीप शर्मा के निर्णय से प्रभावित होकर पम्पोर के एक व्यापारी ने कुलदीप शर्मा को एक करोड़ रुपए कीमत की एक कनाल जमीन इनाम में देने का फैसला लिया है। वे अपना नाम उजागर नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि ऐसे समय में जब लोग जाति, धर्म, सम्प्रदाय, नस्ल के नाम पर लड़ रहे हों तो कुलदीप शर्मा ने साबित कर दिया है कि मानवता जिंदा है। उन्होंने कहा कि जमीन क्या वे तो कुलदीप शर्मा के लिए खून भी देने को तैयार हैं जिन्होंने धार्मिक आधार से ऊपर उठकर एक मुसलमान को अपनी जमीन दी है।
इसके बाद शोपियां के एक सज्जन मोहम्मद इकबाल शाह ने कुलदीप शर्मा की पहल से प्रभावित होकर हिन्दू-मुस्लिम एकता को और मजबूत करने के लिए कुलदीप शर्मा को शोपियां में 10 मरले जमीन देने का ऐलान किया है। ’मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ और ’हिन्दू मुस्लिम सिक्ख, इसाई, आपस में हैं भाई-भाई’ जैसे साम्प्रदायिक सद्भावना के नारों में उनका दृढ़ विश्वास है। शायद इसी को कश्मीरियत कहते हैं जिसे महात्मा गांधी ने पहचान लिया था। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में ’कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत’ को रेखांकित किया था। देश के अन्य भाग के लोगों को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
नफरत की राजनीति का जवाब नफरत नहीं बल्कि मोहब्बत और सद्भावना है। यदि देश के लोग भाजपा की राजनीति के जाल में फंस कर खुद साम्प्रदायिक हो जाने के खतरे से बचना चाहें तो उन्हें लगातार सद्भावना के कदम उठाने होंगे जैसा कुलदीप शर्मा और जम्मू-कश्मीर के दो व्यापारियों ने कर के दिखाया है। भाजपा की राजनीति को कुंद करने का यही एक उपाय है। नफरत का जवाब सद्भावना।

 – संदीप पाण्डेय 

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