नीरज कुमार
जंतर-मंतर-2 शुरू हो चुका है। ऐसा लगता है कि अपने अंतिम परिणाम तक पहुँचने तक यह सिलसिला क्रमशः जारी रहेगा। नेताओं के खिलाफ छोटे-बड़े आंदोलन इस देश में हमेशा होते रहे हैं, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था के प्रमुख या किसी ब्यूरोक्रेट को हटाने की मांग को लेकर इतना व्यापक और लगातार बढ़ता हुआ जनआंदोलन शायद ही देश ने पहले कभी देखा हो। यह अपने आप में एक गंभीर संकेत है।
इस आंदोलन को केवल किसी एक व्यक्ति या किसी एक अधिकारी के खिलाफ असंतोष के रूप में देखना बड़ी भूल होगी। इसके पीछे कहीं ज्यादा गहरी बेचैनी है—संवैधानिक संस्थाओं की गिरती साख, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बढ़ता अविश्वास और सत्ता तथा संस्थाओं के बीच कमजोर होती स्वतंत्रता।
आज आम नागरिक के मन में यह सवाल पैदा हो रहा है कि आखिर लोकतंत्र में संस्थाओं की भूमिका क्या रह गई है? क्या चुनाव आयोग, मीडिया, प्रशासन और दूसरी संवैधानिक संस्थाएं सत्ता से स्वतंत्र होकर अपना काम कर रही हैं? या धीरे-धीरे संस्थाओं की स्वायत्तता इतनी कमजोर कर दी गई है कि जनता को उनके निष्पक्ष होने पर भी सवाल उठाने पड़ रहे हैं? और शायद यही इस पूरे दौर की सबसे बड़ी चिंता है।
एक रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट ने जिस तरह सवालों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया, उसने यह भी दिखाया कि यदि पत्रकारिता सत्ता के दबाव से मुक्त होकर सिर्फ अपना काम करने लगे, तो लोकतंत्र में सवालों की ताकत कितनी बड़ी हो सकती है। सोचिए, अगर इस देश में सिर्फ एक महीने के लिए जेनुइन पत्रकारिता होने लगे तो क्या होगा?
अगर मीडिया सिर्फ सत्ता से सवाल पूछे, जनता के सवालों को सामने रखे, दस्तावेजों की पड़ताल करे और बिना भय के सच लिखे—तो सत्ता के लिए जनता के सवालों से बचना कितना मुश्किल हो जाएगा। इसी तरह अगर चुनाव आयोग केवल एक काम पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से कर दे—चुनाव करा दे—तो जनता स्वयं तय कर देगी कि किस सरकार की कितनी लोकप्रियता है और किसके दावे कितने वास्तविक हैं।
आज स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि लोगों के बीच यह धारणा बनने लगी है कि सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक सुरक्षा चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते सवालों के बीच छिपी हुई है। यही कारण है कि चुनाव आयोग को लेकर उठने वाले हर सवाल को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं हैं; वे जनता के विश्वास का सबसे बड़ा माध्यम हैं। लेकिन इस अंधेरे समय में एक उम्मीद भी दिखाई दे रही है।
जब ऐसा लगने लगा था कि भारत पूरी तरह एक ‘डार्क एज’ में प्रवेश कर जाएगा और Idea of India में विश्वास रखने वाले प्रबुद्ध, तार्किक और संवेदनशील लोग खुद को विवश महसूस करने लगे थे, तभी देश के युवाओं ने अपने प्यारे देश को बचाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठानी शुरू कर दी है। यह जरूरी नहीं कि इन युवाओं के पास भविष्य का पूरा नक्शा तैयार हो।
असल उपलब्धि यह है कि उन्होंने वर्तमान की जड़ता और नाउम्मीदी को तोड़ दिया है। उन्होंने यह कह दिया है कि लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट देने का नाम नहीं है। लोकतंत्र सवाल पूछने का साहस है। असहमति व्यक्त करने का अधिकार है। सत्ता को जवाबदेह बनाने की कोशिश है। संविधान की रक्षा के लिए सड़क पर उतरने की प्रतिबद्धता है।
अभिजीत दीपके ने कितनी सुंदर बात कही है—
“गांधी इस देश की आत्मा हैं, अंबेडकर इसकी रीढ़ हैं और नेहरू इसका दिमाग हैं।”
इस कथन में आधुनिक भारत की एक पूरी वैचारिक यात्रा समाहित है।
यह कितनी सुखद और आश्वस्त करने वाली बात है कि WhatsApp University के दुष्प्रचार के दौर में, युवाओं को सांप्रदायिक बनाने की लगातार कोशिशों के बावजूद, देश का एक हिस्सा फिर से गांधी, अंबेडकर और नेहरू के विचारों की ओर लौट रहा है।
युवा फिर पूछ रहा है—भारत कैसा होना चाहिए?
क्या वह भारत, जहां धर्म के नाम पर समाज बांटा जाए?
या वह भारत, जहां हर नागरिक को बराबरी मिले?
क्या वह भारत, जहां सत्ता से सवाल करना अपराध समझा जाए?
या वह भारत, जहां असहमति लोकतंत्र की ताकत हो?
क्या वह भारत, जहां संस्थाएं सत्ता के सामने झुक जाएं?
या वह भारत, जहां संविधान संस्थाओं को सत्ता से ऊपर खड़ा करे?
यही सवाल आज जंतर-मंतर से उठ रहा है।
और शायद यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी है।
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र का सबसे खतरनाक समय वह नहीं होता जब लोग सत्ता से असहमत होते हैं; सबसे खतरनाक समय वह होता है जब लोग सवाल पूछना छोड़ देते हैं।
जंतर-मंतर-2 यह बता रहा है कि भारत ने अभी सवाल पूछना छोड़ा नहीं है।
और जब युवा सवाल पूछने लगते हैं, सड़कें संवाद का माध्यम बनने लगती हैं और संविधान फिर से राजनीतिक चेतना का केंद्र बनने लगता है, तब इतिहास करवट लेने लगता है।
शायद यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं है।
शायद यह भारतीय लोकतंत्र की बेचैनी की वह आवाज है, जो धीरे-धीरे पूरे देश में सुनाई देने लगी है।








