“हर बहस जीतने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि जिंदगी भी जीत जाए, क्योंकि कई बार अपनी बात मनवाते-मनवाते इंसान अपने ही लोगों को खो देता है।” मनुष्य सामाजिक प्राणी है। जन्म से लेकर जीवन के अंतिम पड़ाव तक वह रिश्तों से घिरा रहता है। माँ-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी, बच्चे, मित्र, रिश्तेदार और पड़ोसी—ये सभी हमारे जीवन को अर्थ देते हैं। हम कितना भी धन कमा लें, कितनी भी सफलता प्राप्त कर लें, लेकिन यदि हमारे अपने ही हमसे दूर हो जाएँ तो मन के किसी कोने में एक खालीपन हमेशा बना रहता है। फिर भी आज के समय में रिश्तों में दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। कारण हमेशा कोई बड़ी घटना नहीं होती। कई बार एक छोटी-सी बात, एक गलत शब्द, एक तीखा जवाब या अपनी बात को हर हाल में सही साबित करने की जिद रिश्तों में ऐसी दरार पैदा कर देती है, जिसे भरने में वर्षों लग जाते हैं। हमारे भीतर एक अजीब-सी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है—“मैं गलत कैसे हो सकता हूँ?” हम चाहते हैं कि हमारी बात सुनी जाए, हमारी भावनाओं को समझा जाए, हमारी गलती को नजरअंदाज किया जाए और सामने वाला हमेशा पहले झुके। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि रिश्ता दो लोगों से बनता है और उसे निभाने के लिए दोनों को कभी-कभी अपनी जिद छोड़नी पड़ती है। सच तो यह है कि हर बात में सही होना जरूरी नहीं है। रिश्ते में बने रहना ज्यादा जरूरी है।, सही होने और रिश्ते को बचाने के बीच का अंतर—सही होना बुरी बात नहीं है। गलत को गलत कहना भी जरूरी है। अन्याय सहना भी कोई संस्कार नहीं है। लेकिन हर परिस्थिति को जीतने के लिए बहस करना और हर बात में अपनी श्रेष्ठता साबित करना रिश्तों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। कई बार हम जानते हैं कि सामने वाला हमारी बात समझ चुका है, फिर भी हम बहस जारी रखते हैं। हमें केवल अपनी बात मनवानी होती है। रिश्तों में हर बात का, हिसाब नहीं होता, हर गलती का हर बार, जवाब नहीं होता। कभी तुम चुप रह जाना, कभी हम समझ जाएँगे । कुछ तुम कदम बढ़ाना, कुछ हम पास आएँगे। हर बात में जीत गए, तो क्या हासिल होगा? अपना ही कोई दिल से, अगर दूर हो जाएगा । थोड़ा तुम झुक जाना, थोड़ा हम झुक जाएँ, टूटने से पहले रिश्तों को, आओ मिलकर बचाएँ। जिंदगी फिर लौटकर, कभी नहीं आती है, जो कद्र अपनों की कर लो, वही असली कमाई है। हर बात में सही होना जरूरी नहीं, किसी अपने के दिल में बने रहना जरूरी है।
पति-पत्नी के बीच छोटी-सी बहस शुरू होती है—. “तुमने ऐसा क्यों कहा?”, “क्योंकि तुमने पहले ऐसा किया था।”, “मैंने इसलिए किया क्योंकि तुमने मुझे मजबूर किया।” , और देखते ही देखते बात उस घटना से निकलकर वर्षों पुराने मामलों तक पहुँच जाती है। फिर दोनों के पास अपनी-अपनी दलीलें होती हैं, लेकिन रिश्ते के पास क्या बचता है?
थकान, नाराजगी और दूरी।—-कभी-कभी हमें यह समझना चाहिए कि सामने वाले को गलत साबित करने से हमें क्या मिलेगा? यदि हमारी जीत के बाद हमारा अपना व्यक्ति हमसे बात करना बंद कर दे, तो ऐसी जीत किस काम की?
रिश्ते अदालत नहीं होते- रिश्तों में हर बात का फैसला नहीं किया जा सकता। रिश्ते कोई अदालत नहीं हैं जहाँ हर घटना के सबूत पेश किए जाएँ, गवाह बुलाए जाएँ और अंत में फैसला सुनाया जाए कि गलती किसकी थी।
रिश्ते भावनाओं से चलते हैं।—यह जरूरी नहीं कि हर बार यह तय किया जाए कि किसने पहले गलती की। कभी-कभी जरूरी यह होता है कि गलती के बाद रिश्ता कैसे बचाया जाए। हम अक्सर कहते हैं— “पहले उसने माफी माँगे।”, “पहले वही फोन करे।, “पहले वही बात करे।” लेकिन इस “पहले” के इंतजार में कई रिश्ते हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। जिस व्यक्ति से हमें प्रेम है, उसके सामने पहल करने में हार नहीं होती।
किसी रिश्ते को बचाने के लिए पहला कदम उठाना कमजोरी नहीं, बल्कि भावनात्मक परिपक्वता है।
अहंकार रिश्तों का सबसे बड़ा दुश्मन—-रिश्तों में सबसे खतरनाक चीज हमेशा गुस्सा नहीं होती। कई बार अहंकार उससे भी ज्यादा खतरनाक होता है। गुस्सा कुछ समय बाद शांत हो सकता है, लेकिन अहंकार इंसान को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि —“मैं क्यों झुकूँ? “मैं क्यों माफी माँगूँ?, “मैं ही हमेशा क्यों समझूँ?” , “उसे मेरी जरूरत है, मुझे उसकी नहीं। यहीं से रिश्ते कमजोर होने लगते हैं। सच्चाई यह है कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति इतना आत्मनिर्भर नहीं है कि उसे कभी किसी की जरूरत न पड़े। मनुष्य को प्रेम चाहिए, अपनापन चाहिए, साथ चाहिए और सबसे ज्यादा चाहिए—अपनों का विश्वास।* पैसा कठिन समय में बहुत कुछ खरीद सकता है, लेकिन किसी अपने का सच्चा साथ नहीं खरीद सकता।माता-पिता और बच्चों के रिश्ते में भी जरूरी है समझ —पीढ़ियों के बीच विचारों का अंतर हमेशा रहा है। माता-पिता अपने अनुभवों के आधार पर बच्चों को समझाते हैं और बच्चे अपने समय की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना चाहते हैं।
कई बार माता-पिता कहते हैं।“हमने जिंदगी देखी है, हमें ज्यादा पता है। वहीं बच्चे कहते है —“आज का समय बदल गया है।दोनों की बात में अपना-अपना सच हो सकता है । माता-पिता का अनुभव मूल्यवान है, लेकिन बच्चों की दुनिया भी अलग है। बच्चों को हर बात पर डाँटने के बजाय उन्हें सुनना भी जरूरी है। उसी तरह बच्चों को भी यह समझना चाहिए कि माता-पिता की हर सलाह नियंत्रण की इच्छा से नहीं आती। कई बार उसके पीछे चिंता, प्रेम और अपने अनुभवों से मिली सीख होती है। रिश्ता तब सुंदर बनता है जब दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे को बदलने के बजाय समझने की कोशिश करती हैं।—पति-पत्नी: कौन सही, कौन गलत? —विवाह दो व्यक्तियों का नहीं, दो अलग-अलग संस्कारों और अनुभवों का मिलन है। दोनों का पालन-पोषण अलग वातावरण में हुआ होता है। उनकी पसंद, सोच, आदतें और प्रतिक्रिया देने का तरीका अलग हो सकता है। इसलिए मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन मतभेद और मनभेद में बहुत अंतर है। मतभेद विचारों का हो सकता है, लेकिन मनभेद दिलों में दूरी पैदा करता है। पति-पत्नी को यह समझना चाहिए कि हर विवाद में किसी एक की जीत और दूसरे की हार जरूरी नहीं। कभी पति को समझौता करना होगा, कभी पत्नी को। कभी एक को चुप रहना होगा, कभी दूसरे को। यह चुप्पी डर की नहीं, समझदारी की होनी चाहिए। कभी-कभी पत्नी को लगता है कि पति उसकी भावनाओं को नहीं समझता और पति को लगता है कि पत्नी उसकी परिस्थितियों को नहीं समझती। दोनों अपनी-अपनी जगह सही महसूस कर सकते हैं। लेकिन विवाह का उद्देश्य यह साबित करना नहीं कि कौन सही है। उद्देश्य यह है कि दोनों साथ सही रास्ता खोजें।
बच्चों के सामने रिश्तों का व्यवहार—बच्चे केवल हमारी बातें नहीं सुनते, वे हमारे व्यवहार को देखते हैं। यदि घर में पति-पत्नी हर छोटी बात पर झगड़ते हैं, एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं या बच्चों के सामने एक-दूसरे का अपमान करते हैं, तो बच्चे रिश्तों के बारे में वही सीखते हैं। यदि घर में लोग एक-दूसरे की बात सुनते हैं, गलती होने पर माफी माँगते हैं और नाराजगी के बाद भी साथ बैठते हैं, तो बच्चे भी यही सीखते हैं। इसलिए बच्चों को संस्कार केवल किताबों से नहीं मिलते। घर का वातावरण ही उनकी पहली पाठशाला है।* हम बच्चों से कहते हैं कि बड़ों का सम्मान करो, लेकिन क्या हम स्वयं अपने माता-पिता या जीवनसाथी का सम्मान करते हैं? हम बच्चों से कहते हैं कि झूठ मत बोलो, लेकिन क्या हम स्वयं हर परिस्थिति में सच बोलते हैं? बच्चों को धैर्य सिखाने से पहले हमें स्वयं धैर्य रखना होगा।
हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं— आज सोशल मीडिया और मोबाइल ने हमारी प्रतिक्रिया की गति बहुत बढ़ा दी है।
पहले किसी बात पर गुस्सा आता था तो शायद कुछ समय बाद प्रतिक्रिया होती थी। अब संदेश पढ़ते ही जवाब दिया जाता है । कई बार हम गुस्से में ऐसे शब्द लिख देते हैं जिन्हें बाद में मिटाना चाहते हैं, लेकिन सामने वाले के मन से वे शब्द नहीं मिटते। इसलिए जरूरी है कि हर बात का तुरंत जवाब न दिया जाए। कभी-कभी कुछ समय की चुप्पी रिश्ते को बचा सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि गलत बात को हमेशा सहन किया जाए। बल्कि इसका अर्थ है कि प्रतिक्रिया देने से पहले स्वयं से पूछा जाए— “क्या मेरा जवाब समस्या को हल करेगा या और बड़ा करेगा?”
यदि जवाब समस्या को बढ़ाने वाला है, तो कुछ समय रुक जाना बेहतर है।
माफी माँगना छोटा होना नहीं है—हममें से बहुत लोग माफी माँगने से इसलिए बचते हैं क्योंकि हमें लगता है कि इससे हमारी कमजोरी साबित होगी। लेकिन वास्तव में माफी माँगने के लिए बहुत साहस चाहिए।
“मुझसे गलती हुई।” यह छोटा-सा वाक्य कई बड़े विवाद खत्म कर सकता है । माफी का अर्थ यह नहीं कि हम हमेशा दोषी हैं। माफी का अर्थ है कि हमें रिश्ते की कीमत अपनी जिद से अधिक समझ आती है। और माफी तभी सार्थक होती है जब वह केवल शब्द न हो, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई दे।कभी-कभी सामने वाला भी अपनी लड़ाई लड़ रहा होता है। हम अक्सर लोगों के व्यवहार को देखते हैं, लेकिन उनकी परिस्थितियों को नहीं देखते। कोई व्यक्ति चिड़चिड़ा है तो शायद वह किसी परेशानी से गुजर रहा हो। कोई कम बोल रहा है तो शायद उसके मन में बहुत कुछ चल रहा हो। कोई हमारे साथ पहले जैसा व्यवहार नहीं कर रहा तो संभव है कि वह स्वयं किसी भावनात्मक संघर्ष में हो। हर व्यवहार को व्यक्तिगत रूप से लेना भी उचित नहीं। हम नहीं जानते कि सामने वाला भीतर से किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। इसलिए थोड़ी सहानुभूति, थोड़ा धैर्य और थोड़ा अपनापन कई रिश्तों को टूटने से बचा सकता है।
रिश्तों में हिसाब-किताब क्यों?— एक और समस्या यह है कि हम रिश्तों में हिसाब रखने लगे हैं। “मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।”, “मैंने तुम्हें इतने साल संभाला।”, “मैंने तुम्हारे लिए यह छोड़ा।”, “तुमने मेरे लिए क्या किया?”- जब रिश्ते में “मैंने” और “तुमने” का हिसाब बढ़ने लगता है, तो प्रेम कम होने लगता है। सच्चे रिश्ते में हर चीज का हिसाब नहीं रखा जाता। माँ बच्चे के लिए जो करती है, उसकी रसीद नहीं होती। पिता परिवार के लिए जो त्याग करता है, उसका बिल नहीं होता। भाई-बहन के बीच किया गया सहयोग कोई लेन-देन नहीं होता। जीवनसाथी का साथ कोई व्यापार नहीं है।
जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ हिसाब छोटा पड़ जाता है।—उम्र बढ़ती है तो रिश्तों की कीमत समझ आती ह। युवा अवस्था में हमें लगता है कि हमारे पास पूरी दुनिया है। दोस्त बहुत हैं, काम बहुत है, भविष्य बहुत बड़ा है। लेकिन समय के साथ समझ आता है कि भीड़ और अपने लोगों में अंतर होता है। हर कोई हमारे सुख में शामिल हो सकता है, लेकिन दुख में खड़ा रहने वाले बहुत कम होते हैं। जिंदगी आगे बढ़ते-बढ़ते हमें यह एहसास कराती है कि कुछ लोग हमारी जिंदगी में केवल रिश्ते के नाम से नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं का हिस्सा बनकर रहते हैं। इसलिए जब वे हमारे साथ हों, तब उनकी कीमत समझनी चाहिए। किसी अपने के चले जाने के बाद पछताने से अच्छा है कि उसके रहते उसका हाथ पकड़ लिया जाए।
रिश्ते बचाने के लिए किन बातों का ध्यान रखें?- रिश्तों को मजबूत रखने के लिए बहुत बड़ी-बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती। कुछ छोटी आदतें रिश्तों में बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं— *पहली बात—सुनना सीखें।- सिर्फ अपनी बात कहने के लिए नहीं, सामने वाले को समझने के लिए सुनें।
दूसरी बात—हर बात पर प्रतिक्रिया न दें।, कुछ बातें समय के साथ अपने आप छोटी हो जाती हैं।
तीसरी बात—गलती स्वीकार करें।, गलती स्वीकार करने से व्यक्ति छोटा नहीं होता।
चौथी बात—पुरानी बातों को बार-बार न दोहराएँ।—यदि किसी ने गलती स्वीकार कर ली है और सुधारने की कोशिश कर रहा है तो उसे हर विवाद में वही गलती याद दिलाना उचित नहीं।
पाँचवीं बात—सम्मान बनाए रखें।, गुस्से में भी ऐसे शब्द न बोलें जिन्हें वापस लेना संभव न हो।
छठी बात—अपनों के लिए समय निकालें। रिश्ते केवल फोन पर “कैसे हो?” पूछने से नहीं चलते। कभी साथ बैठना, साथ खाना, बातचीत करना भी जरूरी है।
सातवीं बात—तुलना न करें।— किसी पति की तुलना दूसरे पति से, किसी बच्चे की दूसरे बच्चे से या किसी परिवार की दूसरे परिवार से करना रिश्तों में असंतोष पैदा करता है।
रिश्ते हमेशा परफेक्ट नहीं होते— यह भी समझना जरूरी है कि कोई रिश्ता हमेशा सुखद नहीं होता। हर रिश्ते में मतभेद होंगे, नाराजगी होगी, गलतफहमियाँ होंगी। लेकिन मजबूत रिश्ते वे नहीं होते जिनमें कभी विवाद नहीं होता। मजबूत रिश्ते वे होते हैं जिनमें विवाद के बाद भी लोग एक-दूसरे को छोड़ते नहीं। रिश्ता तब मजबूत होता है जब दो लोग कह सकें— “हमारी सोच अलग हो सकती है, लेकिन हमारा रिश्ता उससे बड़ा है।” “हम नाराज हो सकते हैं, लेकिन एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं।”, “हम एक-दूसरे की हर बात से सहमत नहीं हो सकते, लेकिन एक-दूसरे का सम्मान जरूर करेंगे।” , यही परिपक्व रिश्ते की पहचान है।
*कब झुकना चाहिए और कब नहीं?— यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना भी आवश्यक है। हर रिश्ते को बचाना जरूरी नहीं, यदि उसमें लगातार अपमान, हिंसा, शोषण या गंभीर अन्याय हो। रिश्ते बचाने के नाम पर अपनी गरिमा और सुरक्षा को खत्म करना समझदारी नहीं है। “झुकना” और “स्वयं को मिटा देना” एक बात नहीं है। समझौता और अन्याय सहना भी एक बात नहीं है। जहाँ प्रेम, सम्मान और सुरक्षा मौजूद हों, वहाँ छोटी-छोटी बातों में अहंकार छोड़ना रिश्ते को मजबूत करता है। लेकिन जहाँ लगातार अपमान या नुकसान हो, वहाँ स्वस्थ सीमाएँ बनाना आवश्यक है। इसलिए रिश्तों में समझदारी का अर्थ केवल चुप रहना नहीं, बल्कि यह पहचानना भी है कि कहाँ प्रेम से रिश्ता बचाना है और कहाँ अपनी गरिमा की रक्षा करनी है।
अंततः क्या महत्वपूर्ण है?— जब हम जीवन के अंतिम पड़ाव पर पीछे मुड़कर देखते हैं, तो शायद हमें यह याद नहीं रहेगा कि किस बहस में हमने अपनी बात साबित की थी।
हमें शायद यह भी याद नहीं रहेगा कि किसने किससे पहले माफी माँगी थी। लेकिन हमें याद रहेगा कि कौन हमारे कठिन समय में हमारे पास बैठा था।कौन हमारी आँखों के आँसू समझ गया था। किसने बिना पूछे हमारा हाथ थाम लिया था। किसने हमारी गलती के बावजूद हमारा साथ नहीं छोड़ा। और शायद तब हमें यह एहसास होगा कि जिंदगी में सबसे बड़ी जीत किसी बहस को जीतना नहीं थी।
सबसे बड़ी जीत थी—अपने रिश्तों को बचाए रखना।
आज जरूरत है कि हम अपने घरों में थोड़ी नरमी लाएँ। शब्दों में मिठास लाएँ। अपने प्रियजनों की बात सुनें। जहाँ जरूरी हो वहाँ माफी माँगें। जहाँ संभव हो वहाँ माफ करें।
हर बार यह साबित करने की कोशिश न करें कि हम सही हैं। कभी सामने वाले की बात को भी सही मान लें। कभी अपने प्रियजन के लिए अपनी जिद छोड़ दें। कभी बिना किसी कारण के फोन करके कह दें— “तुम मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो।” क्योंकि जिंदगी बहुत छोटी है और समय बहुत तेज। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें टूटने के बाद जोड़ा तो जा सकता है, लेकिन पहले जैसा बनाया नहीं जा सकता। इसलिए जब तक अपने साथ हैं, उन्हें समय दें, सम्मान दें और प्रेम दें। *क्योंकि अंत में जिंदगी यह नहीं पूछेगी कि तुम कितनी बहसें जीते थे। जिंदगी यह पूछेगी कि तुम्हारे अपने कितने लोग तुम्हारे साथ खड़े थे।
– ऊषा शुक्ला








