दिनेश कुमार
और जब यह प्रणाली विफल हो जाए, तो क्या केवल लड़का या लड़की ही जिम्मेदार हैं, या उस पंडित की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए जिसने कुंडली को ‘संपूर्ण मिलान’ बताया था? इस लेख का उद्देश्य किसी धर्म या परंपरा की निंदा करना नहीं है, बल्कि समाज को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करना है। हमें अब यह विचार करना होगा कि क्या हम विवाह को केवल “पारंपरिक कर्मकांडों” से तय करें या आधुनिक मानसिक, सामाजिक, शैक्षणिक और व्यवहारिक आधार पर भी जोड़े की संगति जांचें?
क्या हमें विवाह से पहले लड़के-लड़की की आपसी सहमति, संवाद, समझदारी और संस्कारों को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए ? और क्या ऐसे मामलों में पंडित-पुजारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए, या फिर समाज को ऐसे अंधानुकरण से बाहर निकलने का साहस दिखाना चाहिए? कुंडली मिलान एक परंपरा हो सकती है, लेकिन इसे अंतिम सत्य मानना और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों से पुजारियों को पूर्णतः मुक्त रखना एकतरफा सोच है। समाज को अब आगे बढ़ते हुए आधुनिक समझ, संवाद और सत्यनिष्ठा को प्राथमिकता देनी होगी तभी विवाह जैसे पवित्र बंधन को सही मायनों में सफल और सुरक्षित बनाया जा सकता है।

