‘इण्डिया गेट’ भारतीयों का अपमान! 

जगन्नाथ सिंह

ज्ञानतावश भारत की शान समझे/बताये जाने वाले ‘इण्डिया गेट’ के नीचे से ‘अमर जवान ज्योति’ को हटाया जाना सर्वथा सम्मानजनक है। इण्डिया गेट हमारे सम्मान का प्रतीक नहीं, वास्तव में भारतीयों एवं भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान रहा है। उसके नीचे 1971 में ‘अमर जवान ज्योति’ के नाम से मशाल जला दी गयी थी। इसे ‘बांग्ला मुक्ति संग्राम’ में प्राणों का उत्सर्ग करने वाले सैनिकों के प्रति सम्मान का नाम दिया गया। यह 1931 में 12 फरवरी को बनकर तैयार हुआ था। इसके पीछे तब के ब्रिटिश साम्राज्य का मूल विचार उस भावना को दबाना था जो अंग्रेजों के विरुद्ध भारत के लाखों घरों में सालों से अन्दर ही अन्दर उबाल ले रही थी। गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में ब्रिटिश इण्डियन आर्मी के लगभग 90,000 सैनिकों ने शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने में अपनी जान गँवा दी थी। इनमें ब्रिटिश सैनिक तो गिने-चुने थे, अधिकतर भारत के जवान थे जिनके घरों-परिवारों को तत्कालीन हुकूमत ने उनकी हालत पर छोड़ दिया था।
इण्डिया गेट के इतिहास से जुड़ी हर एक बात को बख़ूबी समझना बहुत आवश्यक है। ‘इण्डिया गेट’ को बने क़रीब 91 साल हो रहे हैं। इसका निर्माण 1931 में पूरा हुआ था। असल में तब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय ‘ब्रिटिश इण्डियन आर्मी’ में जान गँवाने वाले लगभग एक लाख भारतीयों के परिवारों की दशा की अनदेखी को लेकर तत्कालीन गुलाम भारत में विरोध की एक अतिरिक्त ज्वाला दहकने लगी थी। उनके प्रति फ़र्ज़ी संवेदना जताने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने 12 फरवरी, 1931 को इण्डिया गेट का निर्माण पूरा कराया। यह भारतियों का भ्रम तो हो सकता है किन्तु इसे ‘भारत का गौरव’ कैसे कहा जा सकता है?
भारत में 2008 में राष्ट्रकुल खेल हुए थे। इन खेलों के परिप्रेक्ष्य में जब नयी दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्रों को चमकाया जा रहा था तभी मैंने अपने एक ‘ब्लॉग’ में यह बात लिखी थी कि किसी भी विदेशी को भारत की शान के रूप में दिखाने के लिए इण्डिया गेट नहीं ले जाया जाना चाहिए। उस समय इण्डिया गेट सहित दिल्ली के बहुत सारे इलाकों और स्थलों को इसलिए चमकाया जा रहा था ताकि (कथित तौर पर) इस आयोजन के दौरान भारत-भ्रमण को आने वाले विदेशी भारत के बारे मे अच्छी धारणा लेकर अपने देश वापस जाएँ।
राष्ट्रीय गौरव और आत्म सम्मान के लिए ऐसा करना बहुत आवश्यक और औचित्यपूर्ण है कि किसी भी अवसर पर भारत आने वालों के मन में हमारे देश के प्रति अच्छी धारणा बने परन्तु इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि विदेशियों को अपने गौरवशाली विरासत वाले  स्मारकों को ही दिखाया जाना चाहिए और सायास पूर्ववर्ती ‘गुलाम भारत’ के दौरान, ख़ासकर अंग्रेजी हुकूमत के कारनामों और उपलब्धियों को दिखाने से परहेज किया जाना चाहिए। यदि आजादी से पहले के ब्रिटिश शासनकाल की गौरव गाथा व उपलब्धियों को दिखाया जाता है तो यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का घोर अपमान ही होगा। भारत में ‘इण्डिया गेट’ एक ऐसा ही स्थल है, जिसे हम प्रत्येक विदेशी को सबसे पहले दिखाते हैं, क्योंकि स्थापत्य कला की दृष्टि से यह अत्यधिक सुन्दर एवं महत्त्वपूर्ण स्थल है। इण्डिया गेट की दीवारों पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध मे शहीद हुए जवानों के नाम अंकित हैं जो गुलामी के दौरान अंग्रेज शासन की गौरव-गाथा के अतिरिक्त कुछ नहीं कहते! यह शर्मनाक ही कहा जा सकता है। इसे सबसे बड़ी गौरव गाथा के रूप मे दर्शाना स्वतंत्र भारत मे कहाँ तक औचित्यपूर्ण है? गौर कीजिए- राष्ट्रकुल खेलों के समय इण्डिया गेट की दीवार पर अंकित नामों को और अधिक चमकाने और उभारने का काम भी चल रहा था जो निःसन्देह उचित नहीं प्रतीत होता है। यह बात भी मैंने कोई चौदह साल पहले उठायी थी। कोई इसे मेरे ब्लॉग में पढ़ सकता है।
वस्तुतः इण्डिया गेट की दीवारों पर हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम प्रदर्शित किया जाना चाहिए था। मैंने 2008 में ही लिखा था कि हमारे ‘स्वतंत्र भारत’ के लिए इससे बड़े गौरव की क्या बात होती- यदि इस पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खां, राजेन्द्र लाहिड़ी, मदन लाल धींगरा, खुदी राम बोस तथा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से सम्बन्धित रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, मंगल पाण्डे, नाना फडणवीस, गॉस खान आदि समस्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम अंकित होता। यह हमारी अस्मिता, राष्ट्रीयता और देश-प्रेम का तकाजा भी है। तब इण्डिया गेट पहुँच कर, इसे देखकर तथा विदेशियों को इण्डिया गेट दिखाकर उन्हें इस सम्बन्ध मे बताने मे प्रत्येक भारतीय को गर्व होता। तभी हम अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की इस ऐतिहासिक कविता को सही अर्थों मे सम्मानपूर्वक स्थापित कर सकते हैं :-
“शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।“
1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के द्वारा इण्डिया गेट पर ‘अमर जवान ज्योति की शुरुआत करके अज्ञात शहीदों की स्मृतियों को श्रद्धांजलि देने का सराहनीय प्रयास किया गया था पर पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल की कविता को सार्थकता प्रदान करने के लिए इण्डिया गेट के निकट निर्मित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (नेशनल वार मेमोरियल) इण्डिया गेट अब बेहतर और उपयुक्त विकल्प सिद्ध हो हो रहा है, क्योंकि भारत के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन 1857 से लेकर 1947 तक के समस्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों व शहीदों के नामों का इसमें उल्लेख किया गया है। इस प्रकार वस्तुतः अब यह वास्तविक ‘इण्डिया गेट’ कहा जा सकता है पर अच्छा होता यदि आज़ादी के इस ‘अमृत महोत्सव’ समारोह वर्ष और ‘राष्ट्र रत्न’ नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयन्ती के ऐतिहासिक शुभ अवसर पर इण्डिया गेट का नाम बदल कर कोई नया नाम रखा जाता। यहाँ पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा लगाये जाने की प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी की घोषणा सराहनीय कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि कभी न कभी ‘इण्डिया गेट’ का नाम भी बदलेगा। साथ ही राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (नेशनल वार मेमोरियल) पर उन वीर जवानों के नाम भी अंकित किये जाने चाहिए जो लगातार देश की रक्षा के लिए और आतंकी घटनाओं से निपटने में अपने प्राणोत्सर्ग करते रहते हैं। यह और भी अच्छा होगा कि हर राज्य की राजधानी में ऐसे स्मारकों का निर्माण हो और उनमें राज्य की नागरिक पुलिस से लेकर सभी सुरक्षा जवानों के नाम हर साल एक निश्चित अवधि में जोड़े जाते रहें क्योंकि आज़ादी को बचाये रखने का सतत संघर्ष और अपने नागरिकों की रक्षा-सुरक्षा एक नियमित कर्त्तव्य है। (लेखक उत्तर प्रदेश में गृह विभाग में सचिव सहित अनेक वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं।)

(यह लेखक निजी विचार हैं)

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