Independence Day : क्या आजादी की कीमत को समझ रहा है देश ?

Independence Day : बेमानी है देश और समाज के लिए काम किये बिना देशभक्ति की बात करना

चरण सिंह राजपूत
Independence Day : देश स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। केंद्र सरकार ने हर घर तिरंगा अभियान चलाया हुआ है। 1947 से हर साल देश स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाता आ रहा है। जगह-जगह देशभक्ति के कार्यक्रम होते हैं। लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री ध्वजारोहण करते हैं। हर सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान करती है। पर क्या आजादी के 75 साल बाद भी देश आजादी की कीमत को समझने को तैयार है? राजनीतिक दल तो सत्ता में ही उलझे हुए हैं पर जनता भी देश की आजादी में दिये गये बलिदान और कुर्बानी को भूलती जा रही है। जिस आजाद देश में हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उस आजादी के महत्व को समझने को तैयार नहीं।

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चाहे 1947 की बात हो, अगस्त क्रांति की हो भारत छोड़ो आंदोलन की हो या फिर अंग्रेजों के खिलाफ देश के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली बगावत की। हर आंदोलन में बड़े स्तर पर कुर्बानी दी गई है। Freedom Struggle of 1857 की बात करें तो इस क्रांति के बारे में कहा जाता है कि यदि ग्वालियर, पटौदी और रामपुर रियासत ने अंग्रेजी हुकूमत के साथ मिलकर इस स्वतंत्रता संग्राम को नहीं कुचलती तो देश तभी आजाद हो गया होता। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों बहादुर शाह जफर की अगुआई में लालकिले पर कब्जा कर लिया था।

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इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन Revolutionaries ने देश की आजादी में सब कुछ न्यौछावर कर दिया उनके परिजन फटेहाल में हैं और जो लोग अंग्रेजों के लिए मुखबिरी कर रहे थे, उनके साथ थे वे आज मजे मार रहे हंै। दरअसल आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले लोगों की संपत्ति को छीनकर अंग्रेजों ने अपने चाटुकारों और मुखबिरों को दे दी थी। यही वजह रही कि देश के आजाद होने के बाद अधिकतर संपत्ति अंग्रेजों के चाटुकारों और उनके लिए मुखबिरी करने वालों पर ही बची है।

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देश के लिए लड़न वाले लोगों के परिजन को आर्थिक रूप से टूट गये थे। आजादी की लड़ाई में इतने बड़े स्तर पर भारतीयों पर अत्याचार हुए थे कि पेड़ों पर ही क्रांतिकारियों को फांसी दे दी जाती थी। बुलंदशहर में काला आम पर कई क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। हालांकि दादरी रियासत के Rao Umrao Singh ने अंग्रेजों से हल तक जुतवा दिया था पर बाद में अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी। मंगल पांडेय को फांसी देने से आक्रोशित होकर अंग्रेजों पर फायरिंग करने वाले धनसिंह कोतवाल के गांव के चारों ओर भोर में ही अंग्रेजों ने तोप लगा दी थी।

बताया जाता है कि सुबह अंधेरे में शौच जाते समय एक गांव के लगभग 350 लोगों को अंग्रेजों ने तोपों से भून दिया था। ये छोटे-छोटे उदाहरण हैं देश में Sardar Bhagat Singh, Rajguru, Sukhdev, Khudiram Ghosh and Subhas Chandra Bose जैसे न जाने कितने क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम गये थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या भारत माता की जय बोल देने या फिर तिरंगो हाथ में लेकर राष्ट्रभक्त बना जा सकता है। दरअसल देशभक्ति आदमी के व्यवहार, रहन-सहन और आचरण में होनी चाहिए। यदि आप देश और समाज के किसी काम नहीं आ रहे है तो आप कितने देशभक्ति के नारे लगाते घूमे। कितने तिरंगे लेकर चलें आपको देशभक्त नहीं कहा जा सकता है। आज़ादी की लड़ाई तब फीकी पड़ जब अंग्रेजों की फूट ने देश का बंटवारा करा दिया। भारत को पाकिस्तान और भारत दो देशों में बांट दिया गया।

भगत सिंह ने कहा था कि जब तक किसान की थाली में Nutritious Food नहीं होगा तब तक देश में खुशहाली नहीं आ सकती है। ऐसे ही महात्मा गांधी ने कहा था कि जब तक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ देश के अंतिम व्यक्ति तक नहीं मिलता तब तक यह आजादी अधूरी है। क्या देश किसान की थाली में पौष्टिक आहार है ? क्या देश के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ मिल रहा है ? ऐसा लग रहा है कि जैसे देश में सभी योजनाएं संपन्न व्यक्तियों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हों। किसान और मजदूर तो आज की तारीख में दम तोड़का दिखाई दे रहा है।

हम बड़े जोश खरोश के Independence Day साथ मना रहे हैं पर हमें यह बात भी ध्यान देने की जरूरत है कि देश ने नये कृषि कानूनों को वापस कराने के लिए 13 महीने तक दिल्ली बार्डर पर किसानों को गर्मी, सर्दी और बरसात झेलते हुए देखा है। कोरोना काल में भले ही आम आदमी की आर्थिक स्थिति चरमरा गई हो पर अडानी और अंबानी की लगातार बढ़ी है। हम कितने भी आजाद होने के दावे करते फिर रहे हों पर यह भी जमीनी हकीकत हैै कि पाठ्यपुस्तकों में भगत सिंह को आज भी Revolutionary Terrorist पढ़ाया जा रहा है।

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