चरण सिंह
भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने दावा किया है कि भारतीय टीवी न्यूज़ इंडस्ट्री में आर्थिक संकट और विज्ञापनों के केंद्रीकरण के कारण 2029 तक सिर्फ तीन बड़े न्यूज़ चैनल/ग्रुप ही बच पाएंगे। उनका इशारा आज तक, News18 नेटवर्क और NDTV की ओर था। उनका कहना है कि बाकी चैनलों Republic, Zee News, ABP, India TV आदि की कहानी खत्म हो सकती है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ये सभी चैनल सरकार के सामने घुटने टेक देंगे ? जिस तरह से आज तक के साथ ही रिपब्लिक भारत और एबीपी ने स्टैंड लिया है। उसके आधार पर कहा जा सकता है कि देश में यूट्यूब चैनलों के साथ ही मेन स्ट्रीम चैनल भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। देखने की बात यह है कि जो चैनल बंद होंगे उनके पत्रकार क्या सरकार की महिमामंडन करेंगे ? उनमें से अधिकतर अपना यूट्यूब चैनल खोलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे। ऐसे में भले ही कितने चैनल बंदी की कगार पर पहुंच जाएं कितने बंद हो जाएं पर सरकार की घेराबंदी भी जबरदस्त तरीके से होगी। जिस तरह से अरावली पहाड़ियों के बचाव में राजस्थान और हरियाणा के लोग सड़कों पर उतरे। जिस तरह से उन्नाव रेप कांड के दोषी कुलदीप सेंगर की सजा निलंबित कर उसको जमानत देने के मामले के साथ ही उत्तराखंड में पहाड़ों को बचाने के लिए लोग आगे आएं और अंकिता भंडारी मामले में बवाल मचा, ऐसे में कहा जा सकता है कि लोग अब सरकार से डर नहीं रहे हैं। वे बीजेपी की मंशा समझ रहे हैं। भले ही राजनीतिक दल आगे न आएं पर जनता अब विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली है। इसमें दो राय नहीं कि केंद्र के साथ ही राज्यों में चल रही बीजेपी की सरकारें भी गोदी मीडिया के बल पर ही टिकी हैं। यह गोदी मीडिया ही है जो बीजेपी के समर्थकों में जोश भरकर रखता है। विपक्ष को और कमजोर करता है। सरकार के पक्ष में खबर चलाकर सरकार की छवि अच्छी बनाए रखता रहा है। जब मीडिया सरकार के खिलाफ खुलकर सामने आएगा तो रेट के ढेर पर खड़ी हुई बीजेपी की स्थिति तूफान में उड़ते रेट के ढेर जैसी हो सकती है। दरअसल कांग्रेस को छोड़ दें तो पूरे का पूरा विपक्ष सरकार के दबाव में है। विपक्ष जनहित में कोई बड़ा संदेश नहीं दे पाया है। मोदी सरकार को 12 साल होने जा रहे हैं पर विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए एक भी आंदोलन जनहित में नहीं किया है। क्षेत्रीय दलों का रवैया तो यह हो जाता है कि जैसे केंद्र में बीजेपी की नहीं बल्कि कांग्रेस की सरकार है। क्षेत्रीय दल इतनी आलोचना बीजेपी की भी नहीं करते जितनी कांग्रेस की करने लगते हैं। देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ का दूसरा कार्यकाल चल रहा है पर समाजवादी पार्टी की ओर से एक भी बड़ा आंदोलन सरकार के खिलाफ नहीं हुआ। सपा के दिग्गज नेता रहे आजम खान का राजनीतिक करियर बीजेपी ने खत्म कर दिया पर सपा ने एक भी बड़ा आंदोलन आजम खान के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ नहीं किया। सपा मुखिया अखिलेश यादव को जहां उत्तर प्रदेश में रहकर सरकार के खिलाफ मोर्चा संभालना चाहिए था वहीं वह सांसद बनकर केंद्र की राजनीति कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अपने चाचा शिवपाल यादव को भी खुलकर राजनीति नहीं करने दे रहे हैं।बिहार में लालू प्रसाद और उनके बेटे तेजस्वी यादव की स्थिति बिहार में देख ही ली। या तो आरजेडी को चुनाव नहीं लड़ना चाहिए था यदि चुनाव लड़े तो हार स्वीकार कर विधानसभा के सत्र को गंभीरता से लेना चाहिए था। तेजस्वी यादव विधान सत्र के समय परिवार के साथ घूमने निकल गए। यदि चुनाव में धांधली हुई तो फिर आरजेडी सड़कों पर क्यों नहीं उतरी ? विपक्ष के अधिकतर दल जातीय आंकड़ों के आधार पर राजनीति कर रहे हैं। जमीनी सघर्ष ये दल भूल गए हैं। बिल्ली के भाग से छींका टूटने के इन्तजार कर रहे हैं। दरअसल दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के साथ ही दूसरे अन्य राज्यों में भी विपक्ष की स्थिति जातीय आंकड़ों पर टिकी है। वजह कोई भी हो पर कांग्रेस के अलावा कोई भी दल सरकार के खिलाफ खुलकर सड़कों पर नहीं उतर पा रहा है। ऐसे में उभरते राजनीतिक और सामाजिक दल बदलाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इन राजनीतिक समीकरणों में 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में छोटे छोटे दलों को सफलता मिल सकती है। हां 2029 के लोकसभा चुनाव सोशल मीडिया के साथ ही मीडिया भी बहुत बड़ा योगदान अदा करने जा रहा है।








