समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया यदि जीवित होते तो …

(जयंती पर विशेष)         

डॉ. सुनीलम 

डॉ. लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910  को अकबरपुर ,उत्तरप्रदेश में हुआ था। पढ़ाई के दौरान वे अपने पिता हीरालाल जैन जी के माध्यम से गांधी जी के नेतृत्व में चल रहे आज़ादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। उन्होंने जर्मनी में पढ़ाई पूरी की फिर भारत मे लौट कर आज़ादी के आंदोलन में कूद गए। 1942 से शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत रहकर आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान किया। अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाने के बाद उन्हें लाहौर के उसी काल कोठरी में रखा गया जहां शहीदे आज़म भगत को फांसी के पहले रखा गया था। देश को जब आज़ादी मिलने वाली थी तब अंग्रेजों ने सभी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों को रिहा कर दिया।लेकिन जे पी और लोहिया की रिहाई गांधी जी के हस्तक्षेप के बाद हुई। जहां से वे गोवा स्वास्थ्य लाभ के लिए गए परंतु वहाँ जाकर पुर्तग़ालीयों के 450 साल के शासन को उन्होंने चुनौती दी और गोवा को आज़ाद कराने में महत्वपूर्ण योगदान किया ।
डॉ लोहिया अपना जन्म दिवस  नहीं मनाते थे क्योंकि इसी दिन देश के भगत सिंह, जैसे क्रांति वीर की शहादत हुई थी । डॉ लोहिया ने हिटलर के उदय और पतन को बहुत नजदीक से देखा और समझा था। रूसी क्रांति से प्रभावित होने के बावजूद उन्होंने सर्वहारा की क्रांति के तानाशाही के नाम पर स्टालिन के द्वारा की गई हत्याओं को चुनौती दी थी। अंग्रेजों को 1942 में और बाद में नेपाल की राजशाही को भूमिगत रह कर  चुनौती देने के बावजूद उन्होंने सत्य और अहिंसा से समाज के बदलाव का रास्ता चुना था। वे खुद को मठी या सरकारी गांधीवादी कहे जाने के खिलाफ थे ,खुद को  कुजात गांधी कहते थे। डॉ लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद, पिछड़ा पावे सौ में साठ, चौखंबा राज (पंचायती राज) और महिलाओं की भागीदारी को लेकर जो विचार सोशलिस्ट पार्टी के माध्यम से देश के सामने रखे थे देश ने उन्हें बाद में स्वीकार किया।
डॉ लोहिया ने सप्तक्रांति की न केवल जरूरत बतलाई थी।बल्कि समाज मे चल रही 7 नाइंसाफियों को खत्म करने के लिए आजीवन संघर्ष भी किया था । वे कहते थे देश और दुनिया मे आर्थिक गैर बराबरी ,जाति, लिंग ,रंग के आधार पर भेदभाव ,हिंसा से कब्जा करने और निजता को समाप्त करने की प्रवृति  सात अन्याय हैं ,जिन्हें देश और दुनिया मे समाप्त करने की जरूरत है।
डॉ लोहिया को  गैर कांग्रेसवाद के जनक के तौर पर देखा जाता है ।
यह उनकी महाबली एवम देश मे राजनीतिक एकाधिकार खत्म करने की रणनीति का हिस्सा था। अब वह चक्र पूरा हो चुका है।
बहुत सारे बुद्धिजीवी डॉ लोहिया को 1967 में यानि 55 वर्ष पहले हुई मौत के बावजूद उन्हें दोष देते हैं।तमाम विकृतियों के लिए दोष देते हैं।
इस संबंध में मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि डॉ लोहिया ने कभी भी सांप्रदायिक शक्तियों के साथ कोई वैचारिक समझौता नहीं किया। उन्होंने जिस उद्देश्य से गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था, उस उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए आज गैर भाजपा वाद की रणनीति पर अमल करना आवश्यक है ताकि भाजपा की तानाशाही, निरंकुशता और साम्प्रदायिकता पर रोक लगाई जा सके।
डॉ लोहिया ने भारत के विभाजन का विरोध किया था । 15 अगस्त को देश को जब आज़ादी मिली  तब वे भारत में सांप्रदायिक दंगे रोकने के लिए गांधीजी के साथ नोआखली और दिल्ली में  रहकर अपनी जान जोखिम में डाल रहे थे।
उन्होंने राम कृष्ण शिव के भारतीय मानस पर जबरदस्त छाप को लेकर सांस्कृतिक व्याख्या की। नदियां साफ करने का आव्हान किया लेकिन कभी भी उन्होंने ना तो मूर्ति पूजा की, ना ही अंधविश्वासों को स्वीकार किया।
डॉ लोहिया भी बाबा साहब अंबेडकर की तरह जाति व्यवस्था की गहरी समझ रखते थे। उन्होंने जाति व्यवस्था को समूल नष्ट करने के लिए जाति तोड़ो अभियान चलाया। बाबा साहेब ने जाति उन्मूलन कार्यक्रम चलाया। महिलाओं सहित पिछड़ों को उनका हक दिलाने के उद्देश्य से डॉ लोहिया ने आंदोलन चलाया।
डॉ लोहिया का यह चर्चित नारा है ।पिछड़ा पावे सौ में साथ ।
डॉक्टर लोहिया के चेलों ने ही मंडल कमीशन लागू कराया था।
डॉ लोहिया जिस चौखंबा राज (पंचायती राज) में विकेंद्रीकृत व्यवस्था की कल्पना करते थे उस दिशा में भी काफी काम हुआ है। महिलाओं को भागीदारी देने की दिशा में कर्नाटक से लेकर बिहार तक काफी काम किया है।
डॉ लोहिया अगर होते तो वे ना केवल देश के भीतर गैर बराबरी, आर्थिक बराबरी और कंपनियों के द्वारा गरीबों की लूट के खिलाफ लड़ते रहते बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देशों के बीच गैर बराबरी और अमरीका और यूरोप द्वारा अन्य देशों के शोषण और कॉरपोरेट लूट के खिलाफ संघर्ष कर रहे होते । वे देश और दुनियाभर में रूस द्वारा यूक्रेन पर किये गए हमले को भ्रूण हत्या की उसी तरह संज्ञा देते जैसा उन्होंने तिब्बत को चीन द्वारा हथियाये जाने के बाद किया था।
डॉ लोहिया ने अमेरिका जाकर रंगभेद के खिलाफ में संघर्ष किया था तथा जब उन्हें रंगीन चमड़ी होने के कारण कैफिटेरिया में घुसने से रोक दिया था तब उन्होंने सत्याग्रह कर गिरफ्तारी भी दी थी। डॉ लोहिया द्वारा समर्थित रंगभेद विरोधी आंदोलन की अमेरिका में ताकत अब फिर दिखलाई पड़ी है, जब गोरे पुलिसकर्मी द्वारा अश्वेत जार्ज फ्लायड की गर्दन दबाने से हुई मौत ने ट्रंप जैसे तानाशाह को धूल चटा दी।
डॉ लोहिया अगर होते तो वे भीमा कोरेगांव और दिल्ली दंगों के नाम पर फंसाए गए मानवाधिकार वादियों के लिए संघर्ष कर रहे होते, कश्मीर में जब 1 साल लॉकडाउन कर तीन मुख्यमंत्रियों को नजरबंद कर दिया, तब उसका विरोध करते ।कश्मीर फाइल्स की चर्चा कर बतलाते की किस तरह कश्मीरियों की छवि को बर्बाद किया जा रहा है और कश्मीरियों को आतंकवादी साबित करने की कोशिश की जा रही है।
डॉ लोहिया होते तो वे भारत मे संविधानिक सिद्धान्तों को लागू कराने के लिए चलाए जा रहे हर अहिंसक आंदोलन का समर्थन कर रहे होते।
दिल्ली के बॉर्डरों पर तथा देश भर में 380 चले किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए समाजवादियों के साथ मिलकर सरकार की नाइंसाफियों के खिलाफ
सिविल नाफरमानी की ताकतवर मुहिम चला रहे होते। केंद्र सरकार के एक करोड़ आदिवासियों के उजाड़ने के षड्यंत्र, तीन करोड़ राशन कार्ड धारियों  को राशन से वंचित करने के खिलाफ संघर्ष कर रहे होते।
ई वी एम के खिलाफ आन्दोलन खड़ा कर रहे होते। महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ सड़कों को गरमा रहे होते।
कानून वापस लिए जाने के बाद भा ज पा को सजा देने की मुहिम चला रहे होते। उत्तरप्रदेश में समाजवादियों की हार हो जाने के बाद उन्हें निराशा के कर्तव्य समझा रहे होते।
सभी पाठकों को याद रखना चाहिए कि जब डॉ लोहिया की मौत 12 अक्टूबर 1967 को हुई ,तब उनके पास कोई सम्पत्ति नहीं थी।बैंक एकाउंट भी खाली था। वे कहते थे मेरी सबसे बड़ी पूंजी यह है कि भारत का गरीब यह मानता है कि मैं उनका आदमी हूँ।
डॉ लोहिया नहीं है लेकिन उनके विचार हमारे मार्गदर्शन के लिए मौजूद है। हमें डॉ लोहिया के सपनों का भारत बनाने के लिए देश के हर प्रगतिशील नागरिक को संभव प्रयास करना चाहिए ताकि समतावादी और समृद्ध भारत का निर्माण किया जा सके।

(लेखक पूर्व विधायक और किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष हैं)

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