अस्पताल से जिन्दा कैसे लौटे

“बीमारी से बड़ी बन चुकी है इलाज की लूट”

 

आज अस्पताल जीवनदान से ज़्यादा भय और लूट का केंद्र बन गए हैं। नॉर्मल केस को वेंटिलेटर तक पहुँचाना, अनावश्यक टेस्ट कराना और दवा कंपनियों से कमीशन लेना आम हो गया है। मरीज और परिजन मानसिक, आर्थिक और शारीरिक कष्ट झेलते हैं। डॉक्टरों की छवि भगवान से कसाई जैसी होती जा रही है। समाधान यही है कि सरकारी अस्पतालों को मज़बूत किया जाए, मेडिकल शिक्षा में सुधार हो और गलत इलाज पर कठोर कानून बने। इंसानियत और सेवा की भावना लौटे, तभी अस्पताल फिर से विश्वास का प्रतीक बन पाएंगे।

डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’

अस्पताल का नाम सुनते ही मन में उम्मीद जगती है। लगता है कि यहाँ पहुँचने के बाद जीवन सुरक्षित हो जाएगा, बीमारी दूर होगी और पीड़ा का अंत होगा। लेकिन जब यही अस्पताल भय, चिंता और शोषण का केंद्र बन जाए, तो सवाल उठता है कि आखिर मरीज और परिजनों के लिए अस्पताल जाना वरदान है या अभिशाप?

मेरे साथ घटित यह अनुभव केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज का दर्द है। एक नन्ही सी जान, जो केवल थोड़ी देखभाल और सच्चे उपचार से स्वस्थ हो सकती थी, उसे डॉक्टरों ने लालच और व्यावसायिक मानसिकता के चलते वेंटिलेटर तक पहुँचा दिया। नॉर्मल केस को भी वेंटिलेटर पर डाल दिया गया, क्योंकि कमरे का एक दिन का किराया बढ़ाना ज़रूरी समझा गया। इसने हमें मानसिक रूप से तोड़ दिया, आर्थिक रूप से निचोड़ दिया और शारीरिक रूप से थका दिया। उस समय ऐसा लगा मानो सांसें गले में अटकी हों और भगवान भी कहीं दूर खड़े केवल तमाशा देख रहे हों।

हमारे समाज में डॉक्टरों को “भगवान” का दर्जा दिया जाता रहा है। लोग विश्वास करते थे कि डॉक्टर जीवनदाता है। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। आज का डॉक्टर अक्सर पैसों का सौदागर लगता है। कई बार ऐसा लगता है कि डॉक्टर इलाज से पहले फीस, दवा कंपनी और मुनाफ़े का हिसाब लगाता है। डॉक्टर और कसाई में फर्क यही था कि कसाई को देखकर हमें पता होता है कि वह काटेगा, लेकिन डॉक्टर के पास जाते समय यह भरोसा होता था कि वह जीवन देगा। जब वही भरोसा टूटता है तो पीड़ा असहनीय हो जाती है।

आज अस्पतालों की दुनिया एक “मेडिकल माफ़िया” की तरह काम करती है। दवाइयाँ कई गुना दामों पर बेची जाती हैं। अनावश्यक टेस्ट कराए जाते हैं ताकि बिल मोटा हो। मामूली बुखार या संक्रमण को गंभीर बीमारी बनाकर मरीज को भर्ती किया जाता है। और अगर भर्ती हो गया तो आईसीयू और वेंटिलेटर तक का रास्ता दिखाना आम बात हो गई है। दवा कंपनियाँ, अस्पताल मालिक और डॉक्टरों का यह त्रिकोणीय गठजोड़ मरीज की मजबूरी का सबसे बड़ा सौदागर बन गया है। दवा वही लिखी जाती है जिस पर सबसे बड़ा कमीशन मिलता है। मरीज की जेब खाली होना डॉक्टर की सफलता बन गया है।

भारत जैसे देश में जहाँ लाखों लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं, वहाँ अस्पताल के बिल परिवार को सड़क पर ला सकते हैं। लोग मकान, गहने, ज़मीन तक बेच देते हैं ताकि प्रियजन का इलाज हो सके। लेकिन जब इतनी क़ीमत चुकाने के बाद भी अस्पताल से शव ही घर आए, तो उस परिवार की मानसिक पीड़ा की कल्पना करना मुश्किल है। आज इलाज से ज़्यादा महंगा वह डर है जो हर परिवार को अस्पताल की ओर कदम बढ़ाते समय घेर लेता है। लोग यह प्रार्थना करते हैं कि वे अस्पताल से “जिन्दा” लौट आएँ, वरना लुटकर लौटना लगभग तय है।

यह केवल अस्पताल या डॉक्टर का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे समाज की नैतिकता का संकट है। जब शिक्षा को व्यवसाय बना दिया गया, तो डॉक्टर फैक्टरी से निकलने लगे। मेडिकल शिक्षा में भारी खर्च होता है, और वही खर्च बाद में मरीजों से वसूला जाता है। इस चक्र ने सेवा की भावना को कुचल दिया है। डॉक्टरों को याद रखना चाहिए कि उनका पेशा सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज सेवा का संकल्प है। यदि यह संकल्प टूट गया, तो समाज में विश्वास और संबंध दोनों ही खत्म हो जाएंगे।

इस भयावह स्थिति से निकलने के लिए केवल शिकायत करना पर्याप्त नहीं है। कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना जरूरी है ताकि आम आदमी महंगे निजी अस्पतालों का शिकार न बने। दवाइयों और टेस्ट पर सख्त नियंत्रण हो ताकि अनावश्यक बोझ मरीज पर न डाला जा सके। मेडिकल शिक्षा में सुधार जरूरी है जिससे केवल पैसा कमाने वाले नहीं, बल्कि सेवा भाव रखने वाले युवा डॉक्टर तैयार हों। हर गलत इलाज, अनावश्यक भर्ती और लापरवाही पर कठोर दंड देने वाले कानून बनाए जाएँ। साथ ही मरीजों और परिवारों को उनके अधिकारों और विकल्पों की जानकारी देने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।

सच है कि आज हालात भयावह हैं। डॉक्टरों की छवि कसाई जैसी हो गई है। लेकिन फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी हजारों ऐसे डॉक्टर हैं जो सेवा को धर्म मानते हैं और ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हैं। हमें उन डॉक्टरों को सम्मान देना होगा और बाकी व्यवस्था को बदलने के लिए आवाज़ उठानी होगी।

अस्पताल जाना किसी सौदेबाज़ी का हिस्सा नहीं होना चाहिए। मरीज और उसके परिवार की पीड़ा को पैसा कमाने का साधन बनाना सबसे बड़ा पाप है। डॉक्टर तभी फिर से भगवान कहलाएंगे जब वे सेवा और मानवता को अपने पेशे का आधार बनाएँगे। जब तक व्यवस्था में पारदर्शिता और इंसानियत नहीं लौटती, तब तक हर परिवार यही सवाल पूछता रहेगा

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