वह इंसान नहीं फरिश्ता था!

प्रोफेसर राजकुमार जैन ‌

 

जो कौम अपने रहबरों को भुला देती है, उसका भी देर सवेर सूर्य अस्त होने लगता है। ‌ हिंदुस्तान की जंगे आजादी में बादशाह खान के बाद कोई ऐसा किरदार नहीं दिखता जिसने हिंदुस्तान की आजादी के लिए पहले 15 साल बरतानिया हुकूमत की जेल में तथा बंटी हुई आज़ादी‌ (हिंदुस्तान -पाकिस्तान) बनने के बाद‌ पाकिस्तान की मुस्लिम लीग हुकूमत की जेल में भी 15 साल और गुजारे हो। गांधी की संगत और तालीम से ‌ वह कौम‌ जो खून का बदला खून से,‌ तथा जिसके कंधे पर लटकी हुई बंदूक ही जिसकी शान होती थी, ‌उसने खून खराबे की नीति को छोड़कर‌ अहिंसा का पाठ पढ़ लिया था। जिसके कारण उन लोगों को कितनी तकलीफ उठानी पड़ी थी उसकी एक मिसाल ही उस ‌ हृदय विदारक हालात को‌ बयां करती है। बादशाह खान के बेटे वली खान ने अपने संस्मरण में लिखा है कि ‌छह साल की जेल के बाद मैं अपने घर पर बैठा हुआ था,‌ मेरे वालिद दरबदर थे, ‌ वालिदा थी ही नहीं ‌ ऐसे में एक लड़की मेरे घर आई और मेरे हाथ में एक लिखित कागज थमा ‌ कर चली गई,‌ जिसको ‌ हमारे खुदाई खिदमतगार संगठन‌ के कार्यकर्ता ने भेजा था, उसमें‌ लिखा था की मुस्लिम लीगी सरेआम मोहल्लो में नंगे होकर ‌ हिंदुस्तान मुर्दाबाद नारे लगाते हुए गुंडागर्दी कर रहे हैं। इसी बीच कुछ मुस्लिम लीगी मेरे घर में‌ दाखिल होकर ‌मेरी पर्दानशीन बेटियों घरवाली के सामने नंगे‌ होकर गंदी हरकतें करने लगे। खत में आगे लिखा, अगर मैंने ‌ बा‌च्चा खान के साथ कसम ना उठाई होती तो मेरी बंदूक की आखिरी गोली तक उसके ‌ ट्रिगर से मेरी अंगूली उठती ही नहीं। परंतु ‌ खुदाई खिदमतगार होने के साथ-साथ में
पठान भी हूं, मैं इसे कैसे बर्दाश्त कर ँसकता हूं इसलिए इस जलालत‌, ‌शर्मिंदगी के कारण मेरे पास खुदकुशी करने के सिवाय और कोई दूसरा रास्ता बचा ही नहीं।
अब्दुल गफ्फार खान जिनको‌ अदब और प्यार से बादशाह खान, सरहदी गांधी, बाच्चा ख़ान के नाम से भी पुकारा जाता है, उनकी याद में आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा हर साल बादशाह ख़ान के नाम से कौम की खिदमत में अपने को खपाने वाली किसी शख्सियत को सम्मानित किया जाता है। इस साल का नवें बादशाह खान पुरस्कार, सुश्री सुधा वर्गीज जिन्होंने बिहार की सबसे निचले पाए की शोषित, दलित मुसहर जाति के‌ हक्कूको को लड़कर हासिल करने तथा उनके लड़के लड़कियों के उज्जवल भविष्य के लिए तालीम के बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, उनको प्रदान किया गया।
इस अवसर पर अध्यक्षता करते हुए‌ मेरे उद्बोधन की रिपोर्ट भी संलग्न है।

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