महायुति ने खोज ली है महाविकास अघाड़ी की काट? अजित-शिंदे-बीजेपी कैसे चल रहे हैं चालहाँ, लगता है महायुति ने महाविकास अघाड़ी (एमवीए) की काट खोज ही ली है। महाराष्ट्र के हालिया नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों (21-22 दिसंबर 2025) के नतीजों ने इसे साफ बयान कर दिया है, जहाँ महायुति ने 288 में से 212 सीटें जीतकर एमवीए को बुरी तरह पटक दिया। यह जीत न सिर्फ सत्ता गठबंधन की जमीन मजबूत करती है, बल्कि आगामी महानगरपालिका चुनावों (जैसे बीएमसी, पुणे, ठाणे) में भी उनकी ब्रेकथ्रू साबित हो सकती है।
चुनावी नतीजों का गणित
महायुति की झाड़ू: कुल 212 सीटें (नगर परिषद: 178, नगर पंचायत: 34)।
बीजेपी: 117 (सबसे बड़ी ताकत, मोदी-फडणवीस लीडरशिप का फायदा)।
शिवसेना (शिंदे गुट): 45 + 8 = 53।
एनसीपी (अजित पवार गुट): 33 + 3 = 36।
एमवीए का सफाया: सिर्फ 44 सीटें।
कांग्रेस: 26 + 3 = 29।
शिवसेना (यूबीटी): 7 + 4 = 11।
एनसीपी (शरद पवार गुट): 8।
राज ठाकरे की मनसे: शून्य (एक भी सीट नहीं)।
कुल मिलाकर, महायुति ने 73% से ज्यादा कंट्रोल हासिल किया, जबकि एमवीए सिंगल डिजिट में सिमट गई। एकनाथ शिंदे ने तंज कसते हुए कहा, “एमवीए ने मिलकर जितनी सीटें पाईं, उतनी तो हमारी शिवसेना अकेले जीत गई।”
अजित-शिंदे-बीजेपी की चालाकी: ‘दुश्मनी वाली दोस्ती’
महायुति की असली काट है उनकी ‘रणनीतिक दुश्मनी’ – यानी गठबंधन के बावजूद पार्टनर आपस में अलग-अलग लड़े, लेकिन एमवीए को कमजोर करने के लिए कोऑर्डिनेटेड अटैक चलाया।
बीजेपी की मास्टरस्ट्रोक: फडणवीस ने शिंदे गुट के कुछ नेताओं को अपने टिकट पर उतारा और घेराबंदी की। नतीजा: बीजेपी नंबर-1 बनी, लेकिन सहयोगियों को भी काफी सीटें मिलीं। यह ‘ट्रिपल इंजन’ (बीजेपी-शिंदे-अजित) को बैलेंस रखता है।
शिंदे का दांव: उन्होंने जमीनी स्तर पर ‘स्ट्राइक रेट’ ऊंचा रखा (53 सीटें), खासकर विदर्भ और मराठवाड़ा में। शिंदे ने एमवीए पर हमला बोलते हुए अपनी ‘हाफ सेंचुरी’ को हाइलाइट किया, जो उद्धव गुट को सीधा झटका है।
अजित पावर का खेल: अजित पवार की एनसीपी ने 36 सीटें जीतकर शरद पवार गुट (8 सीटें) को धूल चटा दी। खासकर पश्चिम महाराष्ट्र (बारामती, दौंड) में मजबूत पकड़। अजित ने एमवीए के कुछ हिस्सों को अपने पाले में मिलाया, जिससे विपक्ष बिखर गया।
समन्वय का राज: बंद कमरों में मीटिंग्स (फडणवीस-शिंदे-अजित) से सीट-शेयरिंग तय हुई, लेकिन चुनाव में ‘फ्रेंडली फाइट’ चली। इससे गठबंधन मजबूत रहा – कोई बड़ा टकराव नहीं, बल्कि एमवीए पर फोकस। पीएम मोदी ने इसे ‘विकासनीति’ की जीत बताया।
एमवीए की हार क्यों?
एकता की कमी: एमवीए के घटक (कांग्रेस, यूबीटी, एसपी) ने कुछ जगह शिंदे या अजित का सपोर्ट किया, जिससे उनका वोट बंटा।
महायुति की चाल ने उलझाया: विपक्ष को ‘कौन किसके साथ’ समझ नहीं आया।
जमीनी कमजोरी: स्थानीय स्तर पर एमवीए का संगठन ढीला, जबकि महायुति ने डिफेक्शन और कार्यकर्ता मोबिलाइजेशन से जमीन तैयार की।
कुल मिलाकर, यह जीत महायुति को ‘अजेय’ बनाती है। अगले बीएमसी चुनाव (जनवरी 2026) में यही फॉर्मूला चलेगा? वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल एमवीए को रणनीति रिव्यू करनी पड़ेगी। क्या कहते हो?

