हरियाणा में तबादलों का संकट-शिक्षकों की उम्मीदों पर विराम

“अप्रैल से इंतज़ार, अब तक अधर में तबादले; मॉडल स्कूल का परिणाम टला, नई नीति भी अधूरी”

हरियाणा में शिक्षकों के तबादले अप्रैल में होने थे, लेकिन आज तक प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। सरकार ने घोषणा की थी कि सबसे पहले मॉडल स्कूल का परिणाम आएगा और उसी के आधार पर तबादलों की दिशा तय होगी, परंतु महीनों बीत जाने के बावजूद यह परिणाम घोषित नहीं किया गया। अब नई तबादला नीति बनाने की बात कही जा रही है, लेकिन वह नीति भी अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है। इस देरी से शिक्षक गहरे असमंजस में हैं। हज़ारों शिक्षक अपने परिवार से दूर कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और उन्हें उम्मीद थी कि समय पर तबादलों से राहत मिलेगी। मगर सरकार के बार-बार बदलते वादों और अधूरी तैयारियों ने उनके धैर्य की परीक्षा ले ली है। अब ज़रूरत है कि सरकार तुरंत मॉडल स्कूल का परिणाम घोषित करे, नई नीति स्पष्ट करे और पारदर्शी तरीके से तबादला प्रक्रिया शुरू करे।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा की शिक्षा व्यवस्था इस समय गहरे असमंजस और ठहराव के दौर से गुजर रही है। अप्रैल से लेकर अब तक हज़ारों शिक्षक अपने तबादलों का इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन नतीजा यह है कि महीनों बाद भी कोई ठोस प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। सरकार और विभाग ने कई बार आश्वासन दिया कि जल्द ही तबादला ड्राइव चलेगी, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज तक न तो मॉडल स्कूल का परिणाम घोषित हुआ और न ही नई तबादला नीति लागू हो सकी। ऐसे में शिक्षकों के मन में असंतोष और धैर्य की सीमाएँ दोनों टूटती नज़र आ रही हैं।

हरियाणा में शिक्षकों के तबादले अप्रैल में होने थे, लेकिन अब तक शुरू नहीं हो पाए। सरकार ने पहले कहा था कि सबसे पहले मॉडल स्कूल का परिणाम घोषित किया जाएगा और फिर उसी के आधार पर तबादला ड्राइव चलाई जाएगी, मगर महीनों बीत जाने के बावजूद यह परिणाम जारी नहीं हुआ। नई तबादला नीति बनाने की बात कहकर शिक्षकों को उलझाए रखा गया है, जबकि वह नीति भी अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है। इस देरी से हज़ारों शिक्षक असमंजस और निराशा में हैं, क्योंकि कई शिक्षक कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और उन्हें समय पर स्थानांतरण से राहत की उम्मीद थी। लगातार वादों और अधूरी तैयारियों ने उनके धैर्य की परीक्षा ले ली है। अब ज़रूरी है कि सरकार तुरंत मॉडल स्कूल का परिणाम घोषित करे, नई नीति स्पष्ट करे और पूरी पारदर्शिता के साथ तबादला प्रक्रिया को आगे बढ़ाए।

तबादले किसी भी शिक्षक के लिए केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होते। यह उनके निजी जीवन, पारिवारिक परिस्थितियों और पेशेवर संतुष्टि से गहराई से जुड़े होते हैं। वर्षों से एक ही स्थान पर काम कर रहे शिक्षकों को बदलाव की उम्मीद रहती है, वहीं दूरदराज़ क्षेत्रों में तैनात शिक्षकों को अपने परिवार और बच्चों से जुड़ने की चाह होती है। जब यह उम्मीदें लगातार अधूरी रह जाती हैं, तो उसका असर उनके मनोबल और कार्यक्षमता दोनों पर पड़ता है।

अप्रैल में सरकार ने दावा किया था कि सबसे पहले मॉडल स्कूल का परिणाम घोषित किया जाएगा और उसके आधार पर तबादलों की प्रक्रिया को दिशा दी जाएगी। लेकिन यह परिणाम महीनों से लटका हुआ है। इसके साथ ही सरकार ने नई तबादला नीति बनाने की घोषणा की, ताकि प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष हो सके। यह घोषणा सुनने में आकर्षक ज़रूर थी, लेकिन जब नीति महीनों तक अधर में ही पड़ी रहे और शिक्षकों को उसका कोई स्पष्ट स्वरूप न दिखे, तो यह केवल समय खींचने का बहाना प्रतीत होता है।

इस पूरी देरी का सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है। जहाँ कुछ स्कूलों में जरूरत से ज्यादा शिक्षक मौजूद हैं, वहीं कई ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में वर्षों से पद खाली पड़े हैं। नतीजा यह है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और असमानता बढ़ रही है। मॉडल स्कूल परियोजना, जिसे शिक्षा सुधार का प्रतीक बताया गया था, उसका परिणाम ही न आना सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।

शिक्षक लगातार धैर्य बनाए हुए हैं, लेकिन अब उनकी आवाज़ें तेज़ होने लगी हैं। संघ और संगठन यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब पुरानी नीति के तहत भी प्रक्रिया पूरी हो सकती थी, तो उसे बीच में क्यों रोका गया। नई नीति का हवाला देकर महीनों तक शिक्षकों को उलझाए रखना क्या केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नहीं दर्शाता? शिक्षकों का मानना है कि सरकार को यदि सचमुच पारदर्शिता चाहिए तो नीति को सार्वजनिक करना चाहिए। यदि वह तैयार नहीं है तो पुरानी नीति के तहत प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए, ताकि कम से कम शिक्षकों को राहत मिल सके।

हरियाणा जैसे राज्य में, जहाँ शिक्षा सुधार और मॉडल स्कूलों की बातें बड़े स्तर पर की जाती रही हैं, वहाँ आज स्थिति यह है कि शिक्षकों को अपने ही भविष्य का पता नहीं। यह केवल शिक्षकों का संकट नहीं है, बल्कि छात्रों और पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है। शिक्षक असंतुष्ट और परेशान रहेंगे तो वे बच्चों को पूरी निष्ठा से कैसे पढ़ा पाएंगे?

अब जबकि सितंबर भी समाप्ति की ओर है, सरकार को और देरी नहीं करनी चाहिए। सबसे पहले मॉडल स्कूल का परिणाम घोषित करना ज़रूरी है, ताकि शिक्षकों को स्पष्टता मिल सके। इसके बाद नई नीति को सार्वजनिक करना चाहिए और यदि वह अधूरी है तो पुरानी नीति के तहत ही तबादला प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि पूरी प्रक्रिया डिजिटल और समयबद्ध तरीके से हो, ताकि किसी प्रकार का पक्षपात या अनुशंसा की गुंजाइश न रहे।

अंततः यह समझना होगा कि शिक्षक केवल सरकारी कर्मचारी नहीं बल्कि समाज की रीढ़ हैं। उन्हें महीनों तक अनिश्चितता और प्रतीक्षा में रखना उनके साथ अन्याय है और छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है। यदि सरकार सचमुच शिक्षा सुधार चाहती है, तो उसे तुरंत ठोस और पारदर्शी कदम उठाने होंगे। हरियाणा के शिक्षकों का धैर्य अब अंत की ओर है, और यह समय है कि सरकार वादों और घोषणाओं से आगे बढ़कर वास्तविक कार्रवाई करे। यही एकमात्र रास्ता है जो शिक्षकों को न्याय देगा और हरियाणा की शिक्षा व्यवस्था को संतुलन और मजबूती प्रदान करेगा।

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