राजनीति में आए दिन ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जो पुरानी राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे रहे हैं। एक तरफ सांसद अपनी पार्टियां छोड़कर बीजेपी का दामन थाम रहे हैं, तो दूसरी तरफ राज्यसभा चुनावों में बीजेपी को जीत पर जीत मिल रही है। झारखंड में तो ऐसा हुआ कि सत्ताधारी INDIA गठबंधन के पास बहुमत होने के बावजूद बीजेपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज कर ली। बिहार में तो बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA ने सभी पांचों सीटों पर कब्जा जमा लिया। आखिर बीजेपी के पास ऐसा क्या है जो नेताओं को अपनी ओर खींच रहा है।
झारखंड: जहां गणित भी बीजेपी के आगे हार गया
झारखंड की बात करें तो यहां राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हुआ। आंकड़ों के हिसाब से INDIA गठबंधन की स्थिति काफी मजबूत थी. 81 सदस्यीय विधानसभा में INDIA गठबंधन के 56 विधायक थे. इसमें JMM के 34, कांग्रेस के 16, RJD के 4 और CPI(ML) के 2 विधायक शामिल थे. वहीं बीजेपी के पास सिर्फ 21 विधायक थे और AJSU पार्टी का एक विधायक।
राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए 28 वोट चाहिए थे। बीजेपी के पास खुद के 24 वोट थे, यानी वो 4 वोट कम थे. लेकिन हुआ यह कि बीजेपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को 28 वोट मिल गए। यानी कम से कम 4 विधायकों ने अपने गठबंधन के खिलाफ वोट किया। कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को सिर्फ 19 वोट मिले. JMM के बैद्यनाथ राम को 31 वोट मिले और तीन वोट अवैध घोषित किए गए।
यह नतीजा कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के.एन. त्रिपाठी ने तो साफ कहा कि वह पिछले एक साल से पार्टी को बता रहे थे कि JMM गठबंधन के प्रति ईमानदार नहीं है। कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू ने संकेत दिया कि RJD और CPI(ML) के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की।
यह जीत सिर्फ गणित की नहीं, बल्कि गठबंधन की मजबूती की परख भी है। INDIA गठबंधन के पास बहुमत था, फिर भी वह दूसरी सीट नहीं जीत पाया. इसका मतलब साफ है कि गठबंधन में दरारें हैं और बीजेपी उन दरारों का फायदा उठाना जानती है।
बिहार: NDA का क्लीन स्वीप, विपक्ष के विधायक रहे गायब
बिहार में NDA ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की. राज्यसभा की पांचों सीटों पर NDA के उम्मीदवार जीत गए. जीतने वालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (JD-U), बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, रामनाथ ठाकुर (JD-U), उपेंद्र कुशवाहा (RLM) और शिवेश कुमार (बीजेपी) शामिल थे।
RJD और कांग्रेस के चार विधायकों ने वोटिंग से ही परहेज कर लिया. तीन कांग्रेस विधायक सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा, मनोज बिस्वास और मनोहर प्रसाद सिंह और RJD के फैसल रहमान वोटिंग से नदारद रहे. इस वजह से महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह को हार का सामना करना पड़ा. पांचवीं सीट पर अमरेंद्र धारी सिंह को पहली पसंद के ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन विपक्ष के पास जरूरी वोट नहीं जुटा पाने की वजह से वह हार गए.
बिहार बीजेपी अध्यक्ष संजय सरावगी ने इसे NDA की बड़ी जीत बताया और कहा कि इससे विपक्ष की ‘खंडित’ स्थिति साफ हो गई है.
सिर्फ ये दो राज्य नहीं, पूरे देश में बीजेपी का दबदबा
सिर्फ झारखंड और बिहार ही नहीं, बल्कि 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी ने 13 सीटें जीतीं और उसके सहयोगियों ने 7 सीटें हासिल कीं .ओडिशा में बीजेपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने भी जीत दर्ज की. कुल मिलाकर NDA को 21 सीटें मिलीं।
यानी बीजेपी अब राज्यसभा में बहुमत के करीब पहुंचती जा रही है। \खबरों के मुताबिक, बीजेपी को राज्यसभा में बहुमत के लिए सिर्फ 9 और सीटों की जरूरत है. यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 13 राज्यसभा सांसदों पर बीजेपी की नजर है. तीन TMC सांसद पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं।
आखिर बीजेपी के पास ऐसी कौन सी जादुई छड़ी है?
यह सवाल हर बार उठता है जब कोई बड़ा नेता अपनी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल होता है. इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं कि इसका जवाब सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई परतों में छिपा है।
संगठनात्मक मशीन: बीजेपी आज सिर्फ ‘मोदी मैजिक’ से नहीं चलती. बीजेपी की संगठनात्मक मशीन अब इतनी ताकतवर हो चुकी है कि वह मोदी के बाद के युग में भी चुनावी राजनीति पर दबदबा बनाए रख सकती है। पार्टी ने बूथ-स्तरीय प्रबंधन का ऐसा किला खड़ा किया है, जिसे कोई गिरा नहीं सकता। 2026 के पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनावों में बीजेपी की शानदार जीत इस बात का सबूत है कि पार्टी की ताकत सिर्फ नेताओं में नहीं, बल्कि उसके कार्यकर्ताओं और संगठनात्मक ढांचे में है. अमित शाह की रणनीतिक सोच और बूथ-स्तरीय कार्यकर्ताओं की मेहनत ने बीजेपी को एक ऐसा चुनावी तंत्र दिया है, जो विपक्षी दलों के पास नहीं है।
राजनीतिक चमक: बीजेपी का ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा और ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का मंत्र कई नेताओं की आंखों में चमक ला देता है. लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि बीजेपी ने खुद को एक सच्ची राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पेश किया है. बीजेपी ने पिछले एक दशक में एक कैडर-आधारित संगठन से भारत की सबसे ताकतवर राजनीतिक ताकत का रूप ले लिया है. पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों में बीजेपी का विस्तार मुमकिन हो पाया क्योंकि लोकल नेता अपने समर्थन आधार के साथ पार्टी में शामिल हुए.
सत्ता और संसाधनों का खेल: फ्रंटलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी क्षेत्रीय दलों में सेंध लगाकर और उनके सांसदों को अपने साथ लाकर अपनी विधायी ताकत बढ़ा रही है. विपक्षी नेता इस प्रक्रिया को ‘खरीद-फरोख्त’ और ‘धमकी’ का नाम देते हैं. झारखंड के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेसी नेता राजेश ठाकुर ने आरोप लगाया कि ‘देशभर में विधायकों को 15 करोड़ रुपये के ऑफर दिए जा रहे हैं.’ चाहे यह आरोप सही हो या गलत, लेकिन यह साफ है कि बीजेपी के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है।
विपक्ष की कमजोरी: INDIA गठबंधन के भीतर आपसी सहमति नहीं है. झारखंड में जहां INDIA गठबंधन के पास 56 विधायक थे, वहीं NDA के पास सिर्फ 24. फिर भी NDA उम्मीदवार की जीत हुई. कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू ने RJD और CPI(ML) पर विश्वासघात का आरोप लगाया. वहीं, RJD ने X के ऑफिशियल अकाउंट से पोस्ट करते हुए कांग्रेस को चेताया. RJD ने कहा, ‘कांग्रेस अपने ही विधायकों का समर्थन लेने में नाकाम रही.’ यानी गठबंधन में दरारें हैं और बीजेपी उन दरारों का फायदा उठाना जानती है. NDA राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रहा है, जिसकी वजह है TMC में विद्रोह, विपक्ष में दरारें और INDIA गठबंधन का कमजोर होना।
रणनीति बनाने में माहिर: बीजेपी सिर्फ नेताओं को लेती ही नहीं, बल्कि उनका इस्तेमाल भी समझदारी से करती है. असम का उदाहरण लें कि कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई चुनाव तो जीत गए, लेकिन मंत्री नहीं बनाए गए. असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी का संदेश साफ है, ‘पार्टी में आने का दरवाजा खुला है, लेकिन मंत्री पद की गारंटी नहीं.’ यानी बीजेपी नए आए नेताओं को तुरंत सब कुछ नहीं देती, बल्कि उन्हें संगठन में घुलने-मिलने का समय देती है।
क्या यह सिर्फ बीजेपी ‘जादू’ है?
क्रॉस-वोटिंग का खेल: झारखंड में बीजेपी ने सीधे तौर पर चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि एक निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन दिया. द वीक की रिपोर्ट के मुताबिक, NDA के पास 24 विधायक थे और जीत के लिए 28 वोट चाहिए थे, यानी वो 4 वोट कम थे. फिर भी नाथवानी को 28 वोट मिले. यानी INDIA गठबंधन के कम से कम 4 विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की. यह सिर्फ जादू नहीं, बल्कि विपक्षी गठबंधन की कमजोरी और बीजेपी की बैकरूम डील का नतीजा है.
बिना चुनाव के सीटें हासिल करना: मध्य प्रदेश में कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज हो गया क्योंकि उन्होंने अपने हलफनामे में एक लंबित कोर्ट मामले की जानकारी नहीं दी थी. इसके चलते बीजेपी के तीनों उम्मीदवार बिना चुनाव के ही जीत गए. बीजेपी को तीसरी सीट जीतने के लिए 9-11 वोटों की कमी थी, लेकिन नटराजन के नामांकन खारिज होने से वह सीट बिना क्रॉस-वोटिंग के भी बीजेपी को मिल गई. यह जादू नहीं, बल्कि कानूनी और रणनीतिक चालों का बेहतरीन इस्तेमाल है।
बड़े पैमाने पर विलय: 2026 में आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों का बीजेपी में विलय हुआ. इसमें राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल और हरभजन सिंह जैसे सांसद शामिल थे. राज्यसभा अध्यक्ष ने इस विलय को मंजूरी दे दी. इसके बाद बीजेपी की राज्यसभा में संख्या 113 हो गई. यह सिलसिला यहीं नहीं रुका और 8 आप विधायकों ने भी बीजेपी ज्वाइन कर ली. पश्चिम बंगाल में TMC के 20 सांसदों ने NDA के साथ जाने की इच्छा जताई और 58 TMC विधायकों ने अलग गुट बना लिया. ये आंकड़े बताते हैं कि यह कोई जादू नहीं, बल्कि एक सधी हुई लगातार चलने वाली राजनीतिक प्रक्रिया है।
‘वॉशिंग मशीन’ का सिद्धांत: द वायर की रिपोर्ट में इसे ‘बीजेपी की वॉशिंग मशीन’ कहा गया है, यानी ‘एक बार जो कोई बीजेपी की वॉशिंग मशीन में दाखिल होता है, वह बेदाग निकलता है. भ्रष्टाचार के सारे आरोप और मामले बस गायब हो जाते हैं.’ बीजेपी नेताओं को न सिर्फ सत्ता देती है, बल्कि उन्हें कानूनी और राजनीतिक संकटों से भी निकालती है।
कुल मिलाकर जब तक विपक्षी दल आपस में लड़ते रहेंगे, अपने विधायकों को संभाल नहीं पाएंगे और कोई वैकल्पिक राजनीतिक मॉडल पेश नहीं कर पाएंगे, तब तक बीजेपी का ‘जलवा’ बना रहेगा. यह जादू नहीं, एक मजबूत और सुनियोजित राजनीतिक व्यवस्था है, जिसे तोड़ना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा।

