नैतिक पतन के दौर में दल बदल कानून बना क्रूर मजाक
लोकतंत्र बचाने चुनाव प्रणाली में बुनियादी सुधार और चुनाव आयोग पर अंकुश की जरूरत
रीवा। समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों का बिना इस्तीफा दिए दल बदल जनता के साथ विश्वासघात है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता से हटते ही उस पार्टी के सांसदों और विधायकों में जिस तरह भगदड़ मची, वहां दल बदल कानून नैतिक रूप से प्रभावशाली होने के बजाय एक क्रूर मजाक बन गया। यह कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है।
इसे सन 1985 में 52 वें संविधान संशोधन के माध्यम से राजीव गांधी सरकार द्वारा कानूनी स्वरूप दिया गया था। यह एक ऐसा वैधानिक प्रावधान है, जो सांसदों और विधायकों को व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक अवसरवाद के लिए अपनी पार्टी बदलने से रोकता है। यह कानून राजनीतिक अस्थिरता को रोकने और दलीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया लेकिन दो तिहाई सदस्यों के द्वारा अलग समूह बनाकर खेला करने से इसका भारी दुरुपयोग देखने को मिल रहा है।
लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने बताया कि स्वतंत्रता के बाद मार्च 1948 के नासिक सम्मेलन में सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से अलग होने का निर्णय लिया। कांग्रेस से अलग होने के बाद समाजवादी चिंतक नेता आचार्य नरेंद्र देव ने नैतिकता के आधार पर संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) विधानसभा सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भारतीय राजनीति में नैतिक मूल्यों को ताकत दी थी लेकिन कालांतर में यह स्थिति बनी कि दल बदल रोकने के लिए कानून बनाना पड़ा। फिर भी दल बदल नहीं रुका उसका स्वरूप बदल गया।
राजनीतिक दलों में नैतिक मूल्यों की गिरावट के चलते दल बदल कानून का बहुत दुरुपयोग हो रहा है। यहां बड़ी मछली छोटी मछली को खाने को बेताब है। सत्तारुढ़ दल संसद और विधानसभा में अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए साम दाम दंड भेद का सहारा लेकर दल बदल को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। जनता जिन्हें विपक्ष में बैठने के लिए चुनती है वहां शातिर लोग अपनी पार्टी के अंदर बड़ा समूह बनाकर बगावत कर सत्ता के गलियारे में जाने के लिए मौजूदा दल बदल कानून में ही अपना रास्ता बना लेते हैं। यदि किसी दल के दो तिहाई से अधिक सदस्य किसी अन्य दल में विलय करते हैं तो उन पर दल बदल कानून लागू नहीं होता है।
श्री खरे ने कहा कि जिस समय यह कानून बनाया गया था तब किसी को मालूम नहीं था कि नैतिक पतन इतना अधिक हो जाएगा। इधर देखने को मिल रहा है कि तूलमूल कांग्रेस के लोकसभा के 28 सांसदों में से बगावत करने वाले करीब 20 सांसदों ने फिलहाल एक पंजीकृत राजनीतिक दल नेशनल सिटीजन पार्टी ऑफ़ इंडिया (NCPI) में राजनीतिक शरण लने की कोशिश की है। हो सकता है कि भविष्य में इस दल का भाजपा में विलय हो जाए या फ़िर यह एनडीए के घटक दल के रूप में अपनी भूमिका निभाए। दो तिहाई से अधिक संख्या में तूलमूल कांग्रेस से बगावत करने वाले इन सांसदों पर दल बदल कानून के अंतर्गत कोई वैधानिक कार्रवाई की स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है।
इस घटना चक्र के चलते नेशनल सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया भी अचानक चर्चा में है। एक गुमनाम पार्टी को एकाएक बड़ी पहचान मिल गई है। तूलमूल कांग्रेस के ये बागी सांसद अब नेशनल सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया के सांसद कहलाएंगे। तकनीकी तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि नेशनल सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया में जाने के कारण बागी सांसदों ने अब तूलमूल कांग्रेस पर अपना वर्चस्व बनाने का अधिकार खो दिया है। लोकतंत्र सेनानी श्री खरे ने कहा कि दल बदल कानून का जिस तरह दुरुपयोग हो रहा है, वह कानून की मूल भावना और देश के संसदीय लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है।

