मखाना को गुड़ के साथ वैल्यू एडिशन कर किसानों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने का प्रयास : कुलपति

गन्ना के उत्पादन को बढ़ाना वैज्ञानिकों के लिए बहुत बड़ी चुनौती 

 

समस्तीपुर पूसा डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विवि पूसा स्थित ईंख अनुसंधान संस्थान के परिसर में संस्थान का स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। इस अवसर पर संस्थान के सभागार में एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया जिसका उद्घाटन विवि के कुलपति डॉ. पीएस पांडेय सहित आगत अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर मौजूद वैज्ञानिकों व कर्मचारियों एवं छात्र छात्राएं को संबोधित करते हुए कुलपति ने कहा कि कोई भी क्षेत्र में मनुष्य के लिए कर्म ही पूजा हैं। इसे अध्यात्मिक रूप से सर्वोपरी माना गया है। कृषि वैज्ञानिक कृषि के क्षेत्रों के प्रसार, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान में कर्मठता के बदौलत किसानों के लिए एक नया इतिहास रच सकते हैं।

 

उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों में देश के बड़े-बड़े कृषि वैज्ञानिकों को बुलाकर यहां के वैज्ञानिक और उनके द्वारा किये जा रहे अनुसंधान पर गहन चिंतन मंथन करने की जरूरत हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थान के स्थापना दिवस समारोह में वहां के छात्र-छात्राओं की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि गन्ना का मीठा होना शांति का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वर्ष पर गौर करें तो इस वर्ष देश भर में 400 मिलियन टन गन्ने का उत्पादन हुआ हैं। बिहार में गन्ना उत्पादन के आंकड़ों पर नजर डाले तो वर्ष 1970 से अभी तक में गन्ने के उत्पादन में साढे तीन गुना की बढ़ोतरी हुई हैं। उन्होंने कहा कि गन्ने की खेती पूर्व में 2015 हेक्टेयर के क्षेत्रफल में की जाती थी जो अब बढ़कर 4000 हेक्टेयर से अधिक के क्षेत्रफल में की जा रही है। बिहार में 68 टन प्रति हेक्टेयर गन्ने का उत्पादन है। उन्होंने कहा कि गन्ना के उत्पादन को बढ़ाना वैज्ञानिकों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। पूरे देश में साल 1970 में केवल 216 चीनी मिल ही थे जिसकी संख्या साल 2020 में बढ़कर 400 से अधिक हो गई। उन्होंने कहा कि हमारे पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में गन्ना के अलावे किसान दूसरी खेती करना ही नहीं चाहते हैं। जब किसानों का रुझान गन्ने की खेती की ओर है तो फिर बिहार के किसान गन्ना की खेती से क्यों नहीं लाभान्वित हो पा रहे हैं। यह महत्वपूर्ण विषय है। इस पर वैज्ञानिकों को जोर शोर से कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पुसा के लिए शुगर केन संस्थान एक बहुत बड़ा विरासत है। वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे इस विरासत को बेहतर ढंग से संभालने का दायित्व युवा पीढ़ी से जुड़े वैज्ञानिकों को भी दें। उन्होंने कहा कि मखाना को गुड़ के साथ वैल्यू एडिशन कर किसानों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे नए नए टेक्नोलॉजी को विकसित करने के उपरांत उसे किसानों के खेत तक पहुँचाने का काम करें। उन्होंने कहा कि विकसित भारत 2047 में विवि के ईंख अनुसंधान संस्थान पूसा की बड़ी भूमिका होगी। गन्ना वैज्ञानिकों को इस पर तीव्र गति से कार्य करने की जरूरत हैं। स्वागत भाषण करते हुए गन्ना अनुसंधान के हेड डॉ. ए के सिंह ने स्थापना दिवस पर संस्थान से जुड़ी दर्जनों उप्लब्दियों को गिनाया। समारोह को टीसीए ढोली के अधिष्ठाता डॉ. पीपी सिंह ने भी संबोधित किया। मंच संचालन संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. सुनीता कुमारी मीणा एवं धन्यवाद ज्ञापन वैज्ञानिक डॉ. बलवंत कुमार ने किया। मौके पर कुलसचिव डॉ. मृत्युंजय कुमार, अधिष्ठाता डॉ. अंबरीश कुमार, डॉ. पी पी श्रीवास्तव, डॉ. मयंक राय, डीएलडब्ल्यू डॉ. रमन त्रिवेदी, डॉ. अनुपम अमिताभ, डॉ. एसके ठाकुर, डॉ. डीके राय, डॉ. एस एन सिंह, राजदेव राय, संतोष पांडे आदि मौजूद थे।

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