पूर्वी चंपारण की ऐतिहासिक धनौती नदी अब सूखी

 किसानों की जीवनरेखा रही नदी अब गुमनामी के कगार पर

मोतिहारी / राजन द्विवेदी।

पूर्वी चंपारण की ऐतिहासिक धनौती नदी, जो कभी हजारों किसानों की सिंचाई की जीवनरेखा थी, आज लगभग सूख चुकी है। नदी की यह हालत न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि इस क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक संरचना के लिए भी गंभीर संकट का संकेत है।
यह नदी पश्चिम चंपारण के बाल्मीकि नगर से निकलकर पूर्वी चंपारण होते हुए बागमती नदी में मिलती थी। रास्ते में यह कई गांवों के खेतों को सींचती और मछुआरों की आजीविका का साधन थी। लेकिन अब इसकी धारा सूख चुकी है और किनारे वीरान पड़े हैं। नदी के सूखने के साथ ही इसके पाट पर अवैध कब्जों का दौर शुरू हो गया है। लोग घरों, दुकानों और खेतों का निर्माण कर रहे हैं, जिससे नदी की प्राकृतिक धारा और जैवविविधता को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
धनौती नदी से सटे कई गांवों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह इस नदी पर निर्भर थी। किसान इसकी मदद से धान, गेहूं, सब्जियां उगाते थे। अब सिंचाई का संकट, भूमिगत जलस्तर में गिरावट और आजिविका के साधनों की कमी ने इन गांवों में विस्थापन की स्थिति खड़ी कर दी है।

 

सरकार से हस्तक्षेप की मांग

 

स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से अपील की है कि धनौती नदी के पुनर्जीवन के लिए ठोस योजना बनाई जाए। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि ‘सरकार नदी को अतिक्रमण मुक्त करे और इसमें फिर से जलधारा बहाने की कोशिश करे, नहीं तो आने वाली पीढ़ियां इसे सिर्फ किस्सों में जानेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो यह इलाका भारी सामाजिक-आर्थिक संकट में घिर सकता है। सरकार से अपेक्षा है कि वह दीर्घकालिक नीति बनाए, जिससे धनौती नदी की पहचान और उपयोगिता फिर लौट सके।

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