रासायनिक रंगों की बढ़ती खपत के कारण पलाश के फूल खोने लगे अपनी पहचान

होली के रंग ही नहीं, औषधी भी हैं टेसू के फूल, इस तरह बढायेंगे किसानों की आमदनी   

 

सुभाष चंद्र कुमार

समस्तीपुर पूसा जैविक उत्पादों की सूची में पलाश के बीज, फूल, पत्ते, छाल, जड़ और लकड़ी के अलावा पलाश का आयुर्वेदिक चूर्ण और तेल भी काफी अच्छे दामों पर बिकते हैं.
पलाश फूल की खेती: आधुनिक दौर में रासायनिक रंगों की बढ़ती खपत के कारण टेसू यानी पलाश के फूल अपनी पहचान खोने लगे हैं. एक समय वो भी था, जब होली के रंगों की शान सिर्फ टेसू के फूल से जमती थी, लेकिन कभी हजारों एकड़ में पैदा होने वाले पलाश के फूल आज सिर्फ कुछ ही इलाकों तक सिमट कर रहे हैं, इसलिये किसान चाहें तो विलुप्त होती इस प्रजाति को अपनी आमदनी का जरिया बना सकते हैं. बता दें कि कई कंपनियां कांट्रेक्ट देकर पलाश के फूलों की खेती करवाती हैं. इसके अलावा देश-दुनिया में जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच पलाश के फूल की खेती फायदे का सौदा साबित हो सकती है.

पलाश के फूल 

पलाश के फूल को परसा, ढाक, टेसू, किशक, सुपका, ब्रह्मवृक्ष और फ्लेम ऑफ फोरेस्ट आदि नामों से भी जानते हैं, जो चित्रकूट, मानिकपुर, बाँदा, महोबा और मध्य प्रदेश से जुड़े बुंदेलखंड में पाया जाता है. ये उत्तरप्रदेश का राजकीय फूल है, जो अपने रंग और औषधीय गुणों के साथ लाख या लाह की खेती के लिये मशहूर हैं. इस फूल में कोई खूशबू नहीं होती, लेकिन इसकी गोंद, पत्ता, पुष्प, जड़ समेत पेड़ का हर हिस्सा काफी फायदेमंद होता है.

 

इन राज्यों में करें पलाश की खेती

 

दुनियाभर में जैविक रंगों के लिये मशहूर इन फूलों की खेती झारखंड के अलावा दक्षिण भारत में भी हो रही है. इसके लिये पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और मध्य प्रदेश से सटे बुंदेलखंडी इलाके सबसे उपयुक्त रहते हैं. किसान चाहें तो प्रति एकड़ खेत में 50 हजार रुपये की लागत से पलाश की बागवानी कर सकते हैं, उसके बाद अगले 40 सालों तक ये पेड़ जैविक उत्पादों की मिसाल पेश करेंगे.
जैविक उत्पादों की सूची में पलाश के बीज, फूल, पत्ते, छाल, जड़ और लकड़ी के अलावा पलाश का आयुर्वेदिक चूर्ण और तेल भी काफी अच्छे दामों पर बिकते हैं.
बता दें कि पुराने समय से ही लाख की खेती में भी पलाश का पेड़ काफी मददगार साबित होता है. पलाश की पौधों को किसी प्रमाणित नर्सरी से भी खरीद सकते हैं. पलाश की खेती के लिये जमीन को जैविक विधि से तैयार करके रोपाई के समय दो पौधों के बीच 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिये.
इसकी व्यावसायिक खेती करने के लिये रोपाई के बाद पौधों की सिंचाई, अच्छी देखभाल और बाकी प्रबंधन कार्यों में सावधानी बरतनी होती है.
इसके बाद अगले चार सालों में पलाश के पेड़ का विकास हो जाता है. इस दौरान बागवानी फसलों की खेती करके खाली स्थान में भी अच्छा मुनाफा ले सकते हैं.

 

कहां बेचें पलाश के उत्पाद

 

पलाश के पेड़ से समय-समय पर फूल, गोंद, पत्ता और जड़ों का उत्पादन मिलता रहता है, जिनकी ऑनलाइन बाजार में काफी मांग रहती है, इसलिये किसान चाहें तो खुद का जीएसटी नंबर लेकर ऑनलाइन मार्केटिंग भी कर सकते हैं. इसके अलावा दिल्ली, जयपुर, मुंबई, देहरादून, कोलकाता, बैंगलोर, चंडीगढ़, रांची, लखनऊ, गाज़ियाबाद, भोपाल, नेपाल की मंडियों में संपर्क करके भी पलाश के उत्पादों को बेचकर अच्छा पैसा कमा सकते हैं. वहीं देश स्तर के जानेमाने कृषि वैज्ञानिकों को मानें तो पलाश की खेती किसान चाहें तो छोटे स्तर पर पलाश के पेड़ लगाकर भी 40 साल तक अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. साथ में विभिन्न मौसम अनुकूल सब्जियों की अंतवर्तीय खेती करके अतिरिक्त आमदनी का इंतजाम भी हो जायेगा. एक एकड़ में पलाश के 3200 पौधे लगा सकते हैं, जो 3 से 4 साल में फूल देने काबिल हो जाते हैं.

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