भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण

 एस आर दारापुरी 

यह लेख भारत में लोकतांत्रिक शासन, संवैधानिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति का आंबेडकरवादी–संवैधानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है। लेख का तर्क है कि यद्यपि भारत औपचारिक रूप से एक संवैधानिक लोकतंत्र बना हुआ है, तथापि इसके लोकतांत्रिक सार (substance) में गंभीर क्षरण हुआ है। बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद, कार्यपालिका का केंद्रीकरण और संवैधानिक नैतिकता के क्षय ने भारतीय लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर दिया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की उस अवधारणा के आलोक में—जिसमें लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक नैतिक व्यवस्था माना गया है—यह लेख भारत को ‘लोकतांत्रिक अवनति’ (democratic backsliding) के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है।

 

1. भूमिका

 

भारतीय संविधान केवल शासन की एक रूपरेखा नहीं, बल्कि सामाजिक रूपांतरण का एक क्रांतिकारी दस्तावेज़ है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से जड़ जमाए जाति, धर्म, लिंग और वर्ग आधारित असमानताओं को समाप्त कर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था। संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बार-बार चेताया था कि यदि संविधानिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र का आधार नहीं मिला, तो वह टिकाऊ नहीं रह सकेगा।

हाल के वर्षों में भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण, संवैधानिक अधिकारों के संकुचन, धर्मनिरपेक्षता के अवसान तथा न्यायपालिका की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। यह लेख इन प्रवृत्तियों का विश्लेषण आंबेडकरवादी संवैधानिक दृष्टिकोण से करता है और यह तर्क प्रस्तुत करता है कि भारत में लोकतंत्र का पतन किसी आकस्मिक संकट का परिणाम नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक और वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

 

2. आंबेडकर की संवैधानिक लोकतंत्र की अवधारणा

 

डॉ. आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं था, बल्कि ‘सहजीवी जीवन पद्धति’ (associated mode of living) था, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे नैतिक मूल्यों पर आधारित हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल राजनीतिक लोकतंत्र—अर्थात् सार्वभौमिक मताधिकार—तब तक अर्थपूर्ण नहीं हो सकता जब तक उसके साथ सामाजिक लोकतंत्र न जुड़ा हो।

आंबेडकर की अवधारणा में संवैधानिक नैतिकता का केंद्रीय स्थान है। इसका आशय संविधान की केवल औपचारिक स्वीकृति से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों, सीमाओं और उद्देश्यों के प्रति संस्थागत तथा सामाजिक प्रतिबद्धता से है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि भारतीय समाज की जाति-आधारित संरचना लोकतंत्र के लिए मूलतः प्रतिकूल है और ऐसे समाज में बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र को आसानी से अधिनायकवाद में परिवर्तित कर सकता है।

 

3. लोकतांत्रिक शासन और कार्यपालिका का केंद्रीकरण

 

भारत में नियमित चुनावों और उच्च मतदाता भागीदारी के कारण लोकतंत्र का औपचारिक ढांचा अब भी मौजूद है। किंतु शासन की वास्तविक प्रक्रिया में कार्यपालिका का असाधारण केंद्रीकरण देखने को मिलता है। संसद की भूमिका निरंतर सीमित होती गई है—संसदीय सत्रों की संख्या में कमी, महत्वपूर्ण विधेयकों पर अपर्याप्त बहस, अध्यादेशों और धन विधेयकों का बढ़ता प्रयोग इस प्रवृत्ति को दर्शाता है।

आंबेडकर के दृष्टिकोण से यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने कार्यपालिका की निरंकुशता को स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना था, विशेषकर ऐसे समाज में जहाँ सामाजिक असमानताएँ गहरी हों। राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चयनात्मक प्रयोग ने लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता को भी कमजोर किया है।

 

4. संवैधानिक अधिकार और वास्तविक समानता का संकट

 

भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकार आज भी विधिक रूप से विद्यमान हैं, किंतु उनके वास्तविक प्रयोग पर गंभीर प्रतिबंध लगे हैं। राजद्रोह, गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम और निवारक निरोध कानूनों के बढ़ते प्रयोग ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित किया है। बिना मुकदमे के लंबी अवधि तक कारावास एक सामान्य प्रशासनिक व्यवहार बनता जा रहा है।

आंबेडकर के अनुसार मौलिक अधिकार विशेष रूप से दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समुदायों के सामाजिक सशक्तिकरण के उपकरण थे। कानून के चयनात्मक प्रयोग और अल्पसंख्यकों तथा असहमत स्वरों के प्रति कठोर रुख संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की भावना के प्रतिकूल है। यह स्थिति अधिकार-आधारित संवैधानिकता से ‘व्यवस्था और सुरक्षा’ आधारित शासन की ओर संक्रमण को दर्शाती है।

 

5. धर्मनिरपेक्षता और बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद

 

धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की आधारभूत विशेषताओं में से एक है, जिसका तात्पर्य सभी धर्मों के प्रति राज्य की समान दूरी और सम्मान से है। समकालीन भारत में यह सिद्धांत गंभीर संकट में है। राज्य की नीतियों और राजनीतिक विमर्श में बहुसंख्यक धार्मिक पहचान को विशेषाधिकार प्राप्त होता दिखाई देता है।

आंबेडकर धर्म और राजनीति के घालमेल के घोर आलोचक थे। उनका मानना था कि धार्मिक बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के लिए घातक है, क्योंकि यह अल्पसंख्यकों को समान नागरिक के बजाय अधीन प्रजा में बदल देता है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, घृणास्पद भाषणों पर चयनात्मक कार्रवाई और साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों में राज्य की निष्क्रियता धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था के क्षरण को रेखांकित करती है।

 

6. न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संरक्षण

 

आंबेडकर ने न्यायपालिका को संविधान का ‘संरक्षक’ माना था। औपचारिक रूप से भारतीय न्यायपालिका अब भी स्वतंत्र है, किंतु उसके समकालीन आचरण में गंभीर सीमाएँ दिखाई देती हैं। संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की सुनवाई में अत्यधिक विलंब, मामलों की चयनात्मक प्राथमिकता और कार्यपालिका के प्रति बढ़ती न्यायिक संकोचशीलता चिंता का विषय है।

यह स्थिति प्रत्यक्ष न्यायिक अधिग्रहण (capture) की बजाय न्यायिक निष्क्रियता या संयम के नाम पर त्याग (judicial abdication) को दर्शाती है, जिसके परिणामस्वरूप असंवैधानिक व्यवहार धीरे-धीरे सामान्यीकृत हो जाता है।

 

7. निष्कर्ष: चौराहे पर खड़ा संवैधानिक लोकतंत्र

 

यह लेख तर्क देता है कि भारत में लोकतंत्र का संकट पूर्ण अधिनायकवाद का नहीं, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र के भीतर से खोखले होने का संकट है। चुनावी प्रक्रियाएँ बनी हुई हैं, किंतु अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, संस्थागत संतुलन और न्यायिक संरक्षण जैसे लोकतंत्र के मूल तत्व कमजोर पड़ते जा रहे हैं।

आंबेडकर की यह चेतावनी आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है कि संवैधानिक नैतिकता के अभाव में लोकतंत्र केवल एक औपचारिक आवरण बनकर रह जाएगा। भारतीय गणराज्य का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सामाजिक लोकतंत्र, वास्तविक समानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित कर पाता है या नहीं।

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