स्कूल-कॉलेजों में खेल को अनिवार्य विषय बनाने की मांग की सुप्रीम कोर्ट ने सराहना की है। याचिका में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह 22 सितंबर को मामले पर विस्तृत सुनवाई करेगा। यह याचिका कनिष्क पांडे नाम के याचिकाकर्ता ने 2021 में दाखिल की थी। याचिका में खेल और फिजिकल एजुकेशन को अनुच्छेद 21ए (शिक्षा का अधिकार) के तहत मौलिक अधिकार का दर्जा देने की मांग की गई है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर अपनी सहायता के लिए वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है।
खेल को पाठ्यक्रम में शामिल की मांग
गुरुवार, 20 अगस्त को मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने इस मांग को सराहनीय और बेहद जरूरी बताया. जस्टिस नाथ ने कहा, “इस डिजिटल दौर में बच्चे खेलों से दूर होते जा रहे हैं। वह मोबाइल पर ज़्यादा समय बिता रहे हैं. खेल को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास के लिए अहम हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में ही मामले में केंद्र और राज्य सरकारों, NCERT और UGC से जवाब मांगा था. एमिकस क्यूरी शंकरनारायण ने कोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में खेल को शिक्षा व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बनाने की मांग का समर्थन किया है। रिपोर्ट में स्कूलों में रोजाना करीब डेढ़ घंटे का समय खेल गतिविधियों के लिए निर्धारित करने का सुझाव दिया गया है।
खेलों के लिए बजट आवंटन में कमी
गुरुवार को याचिकाकर्ता की तरफ वकील राजीव कुमार दुबे पेश हुए. उन्होंने कहा कि कहा कि स्कूल से लेकर कॉलेज तक छात्रों को खेलों से जोड़ना जरूरी है. भारत में स्कूल जाने वाले बच्चों में सिर्फ करीब 0.09 प्रतिशत ही खेलों में हिस्सा लेते हैं. राज्यों ने खेलों के लिए बेहद कम बजट रखा है. स्कूलों में खेल से जुड़ी सुविधाओं की कमी है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में भारत के कमजोर प्रदर्शन की वजहों में से एक है।






