Delhi News : एमसीडी की मिलीभगत से फल फूल रहा मौत का धधा!

दिल्ली में एमसीडी वाले बिजली विभाग वाले पानी विभाग वाले और दिल्ली पुलिस आकर खड़ी हो जाती है जब कोई ग़रीब मज़दूर मध्यवर्गीय आदमी अपना छोटा-सा आशियाना बनाता है या कोई कंस्ट्रक्शन का काम करता है। ये सारे के सारे विभाग मोटी रकम लेकर जाते हैं। पतली गलियों में तीन फुट छज्जे बाहर निकले हुए हैं पांच मंजिला इमारत हैं। आसमान नज़र नहीं आता धूप हवा नहीं आती। पंद्रह साल पहले सरकार ने पचपन फुट ऊंचा मकान का हाइट रहे इजाज़त दी थी। बस क्या था बिल्डर इतने पैदा हो गये दो फ्लोर रखते हैं तीन फ्लोर मकान मालिक को देते हैं। तेजी से पंद्रह साल में दिल्ली की समस्त कॉलोनी में पांच मंजिला मकान बने आधे से ज्यादा बिल्डर ने बनाए हैं। खड़े होकर देखो तो ठीक है नहीं तो ये अलूल जलूल बनाते हैं मेटेरियल सस्ता लगाते हैं। एक एनजीओ में मैं टीचिंग करती थी उसके क़रीब एक मकान बिल्डर बना रहा था, मकान मालिक देखता नहीं था। मैं और मेरे स्टूडेंट कलीग देखते रोज़ पुरे पांच मंजिला इमारत की चिनाई मिट्टी के गारे से की। ऊपर से पलस्तर टाइल लगा दी तेजी से यह काम किया। सोचें दिल्ली में यह धांधली इस दौर में गांव में भी अब कोई मिट्टी की चिनाई नहीं करता।

कैसे भी मकान बनें सब पैसे खा कर पास कर देते हैं। बेरोजगारी इतनी है, जैसे ही किसी के पास कहीं से पैसा आता है वो इमारत बनाकर किराए पर चढ़ा देता है। दिल्ली की बड़ी आबादी किराए पर गुज़र बशर कर रही है। छोटे आदमी फिर भी थोड़ा ठीक हैं क्योंकि वो ख़ुद उसी घर में रहते हैं जिसमें किराएदार हैं। ज़ालिम तो बड़े लेवेल के बिल्डर और राजनैतिक पार्टी के साथ रहने वाले कारोबारी हैं पीजी मालिक हैं। पैसे खिला खिला कर कुछ भी पास होता रहता है। आने वाले सालों में और बुरे हालात होने वाले हैं जो अभी पिछले दस बारह साल में इमारतें बनी हैं वे जब जर्जर होंगी तो क्या होगा। अवैध निर्माण का ठप्पा लगाकर सिर्फ ग़रीब के मकान पर बुलडोजर चलेगा। अमीर दलाल बिल्डर का कुछ नहीं बिगड़ेगा। लगातार ग़रीब के घरों पर बुलडोजर चल रहा है कहीं अवैध निर्माण के नाम पर और कहीं फोरी न्याय के नाम पर।

ऐसा नहीं है सिर्फ भाजपा शासन में इस तरह की धांधली हो रही है। काफी पहले से हो रही है। दूसरा दल सत्ता में आता है तब भी होगी। पैसे खिलाने और अवैध निर्माण को वैध किया जाता है और आगे भी किया जाता रहेगा। पूरा ग्रुप है इसमें मिला हुआ खाने खिलाने का कारोबार है। जिसमें बिजली पानी एमसीडी पुलिस विभाग सब हैं। सिर्फ दिल्ली में नहीं बाक़ी महानगरों में भी कमोबेश यही स्थिति है। इस व्यवस्था को पूंजीवादी व्यवस्था का घिनौना चेहरा कह सकते हैं। इस व्यवस्था में ग़रीब मज़दूर युवा छात्र की कोई हैसियत नहीं,उसकी जान की कोई क़ीमत नहीं। ऐसे ही मरते रहेंगे।

ज़ाहिर है सबसे पिछड़े राज्यों में बिहार आता है वहां मल्टीनैशनल कंपनी नहीं,अच्छे स्कूल हॉस्पिटल नहीं हैं। प्लायन सबसे ज्यादा बिहार से हो रहा है महानगरों में। आज से नहीं बहुत पहले से। दिल्ली मुंबई कोलकाता चेन्नई बेंगलोर पंजाब राजस्थान गुजरात में बिहार के ही मज़दूर हैं सब्ज़ी फल वाले रिक्शा चालक हैं। और छात्रों की भी बड़ी संख्या वहीं की है। साउथ कैंपस के हादसे में भी बिहार के छात्र होंगे। और इतना बुरा हाल होते हुए भी बिहारवासी भाजपा मोदी के अंधभक्त हैं। वो खुलेआम बकवास करता फिर रहा था स्वतंत्रत भारद्वाज वो भी दरभंगा का ही है। गिने-चुने कॉलेज यूनिवर्सिटी के मुट्ठी भर छात्र युवा मज़दूर आंदोलन करते हैं शिक्षा रोजगार के लिए। बाक़ी के कांवड़ यात्रा में हुड़दंग मचाने के लिए उन्मादी भीड़ के लिए अंधभक्ति के लिए जोंबी बना दिए गए हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के नज़दीक सत्यनिकेतन में भी बिल्डिंग ढह गई उसमें मरने वाले ग़रीब मज़दूर परिवार के छात्र युवा ही थे। देश का भविष्य थे। माता-पिता पर क्या गुज़रती होगी। कैसे संपने देखे होंगे। मरने वाले ज्यादातर छात्र फर्स्ट इयर के थे अभी अभी आंखों में ख़ाब सजाकर दिल्ली में आए थे।

मेहजबीं

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