भारत में जनजातियों की पहचान के मानदंड और उसका धर्म से संबंध

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष 

हाल में 24 मई को आरएसएस द्वारा दिल्ली में जनजाति सांस्कृतिक समागम आयोजित किया गया था। इसमें आदिवासी समाज में विभाजन करने और ईसाई धर्म परिवर्तित आदिवासियों को जनजाति की सूची से बाहर करने की मांग उठाई गई है। इसके माध्यम से यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई है कि यदि कोई आदिवासी धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन जाता है तो वह आदिवासियों को जनजाति के रूप में मिलने वाले आरक्षण तथा अन्य लाभों से वंचित हो जाना चाहिए। इस संबंध में संवैधानिक स्थिति यह है कि जनजाति की श्रेणी के लोगों के लिए धर्म कोई मापदंड नहीं है। उनकी पहचान के लिए अलग मापदंड हैं जिसके बारे में इस लेख में विस्तार से चर्चा की गई है ताकि आरएसएस द्वारा धर्म के आधार पर आदिवासियों में विभाजन तथा टकराव की कोशिश को पूरी तरह से समझ जा सके।

भारत की जनजातीय समुदाय भारतीय समाज के सबसे विविधतापूर्ण और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण वर्गों में से एक हैं। भारतीय संविधान में इन्हें आधिकारिक रूप से “अनुसूचित जनजाति” (Scheduled Tribes — STs) कहा गया है। इन समुदायों की अपनी विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषायी और ऐतिहासिक पहचान है। भारत में सात सौ से अधिक जनजातीय समुदाय पाए जाते हैं, जो मुख्यतः मध्य भारत, उत्तर-पूर्व, हिमालयी क्षेत्रों तथा दक्षिण भारत के कुछ भागों में निवास करते हैं। जनजातियों की पहचान किन आधारों पर की जाती है तथा क्या धर्म का इससे कोई संबंध है—यह प्रश्न लंबे समय से अकादमिक, संवैधानिक और राजनीतिक विमर्श का विषय रहा है।

भारत में जनजातियों की पहचान मुख्यतः धर्म के आधार पर नहीं की जाती। इसके बजाय यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, जातीय, भौगोलिक तथा सामाजिक-आर्थिक कारकों पर आधारित होती है। जनजातीय पहचान को एक ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक श्रेणी के रूप में समझा जाता है, जिसकी अपनी विशिष्ट जीवन-पद्धति और ऐतिहासिक वंचना का अनुभव रहा है। धर्म कुछ संदर्भों में जनजातीय संस्कृति को प्रभावित कर सकता है, परंतु अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त करने का संवैधानिक आधार धर्म नहीं है।

जनजातीय पहचान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जनजातीय समुदायों की पहचान की प्रक्रिया औपनिवेशिक काल में प्रारंभ हुई। ब्रिटिश प्रशासकों और मानवशास्त्रियों ने कुछ समुदायों को “ट्राइब” या “जनजाति” के रूप में वर्गीकृत किया, क्योंकि वे भौगोलिक रूप से अपेक्षाकृत पृथक थे, उनकी सामाजिक संरचना जाति-आधारित हिंदू समाज से भिन्न थी, तथा उनकी अपनी विशिष्ट परंपराएँ और जीवन-शैली थीं। औपनिवेशिक नृवंशविज्ञान में जनजातियों को प्रायः “आदिम” या “पिछड़ा” कहा गया, जो उस समय प्रचलित नस्लीय और विकासवादी सिद्धांतों का प्रभाव था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि जनजातीय समुदाय ऐतिहासिक उपेक्षा, शोषण, विस्थापन तथा शिक्षा और आर्थिक अवसरों से वंचित रहे हैं। इसलिए उन्हें विशेष संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया और “अनुसूचित जनजाति” की श्रेणी में शामिल किया गया।

हालाँकि संविधान में “जनजाति” की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई। इसके बजाय संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वे राज्य सरकारों से परामर्श करके किन समुदायों को अनुसूचित जनजाति घोषित किया जाए।

अनुसूचित जनजातियों की पहचान के मानदंड

यद्यपि संविधान में कोई कठोर परिभाषा नहीं है, फिर भी प्रशासनिक परंपरा और विभिन्न समितियों की सिफारिशों के आधार पर कुछ मानदंड विकसित हुए। इनमें 1965 की लोकुर समिति (Lokur Committee) विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस समिति ने जनजातीय समुदायों की पहचान के लिए निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया:

आदिम विशेषताएँ, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक पृथकता, व्यापक समाज से सीमित संपर्क tatha सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ापन

हालाँकि आधुनिक विद्वान “आदिम” जैसे शब्दों की आलोचना करते हैं और उन्हें औपनिवेशिक तथा अपमानजनक मानते हैं। आज की समझ में सांस्कृतिक विशिष्टता, ऐतिहासिक वंचना और सामुदायिक पहचान को अधिक महत्व दिया जाता है।

वर्तमान समय में जनजातीय समुदायों की पहचान सामान्यतः निम्नलिखित आधारों पर की जाती है:

विशिष्ट जातीय और सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक रीति-रिवाज और सामाजिक प्रथाएँ, अलग भाषाएँ या बोलियाँ, जंगलों, पहाड़ों या विशेष भौगोलिक क्षेत्रों से गहरा संबंध, सामुदायिक सामाजिक संगठन तथा ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन

भारत की प्रमुख जनजातियों में गोंड जनजाति, संथाल जनजाति, भील जनजाति, मुंडा जनजाति तथा उत्तर-पूर्व की विभिन्न नागा जनजातियाँ शामिल हैं। इन सभी समुदायों की अपनी अलग भाषा, संस्कृति, मिथक, अनुष्ठान और पारंपरिक संस्थाएँ हैं।

संवैधानिक और कानूनी ढाँचा

भारतीय संविधान अनुसूचित जनजातियों को अनेक प्रकार के संरक्षण प्रदान करता है। अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों की पहचान से संबंधित है। पाँचवीं अनुसूची मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन और संरक्षण की व्यवस्था करती है, जबकि छठी अनुसूची उत्तर-पूर्व भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्तता प्रदान करती है।

इसके अतिरिक्त जनजातियों को निम्नलिखित अधिकार और सुविधाएँ प्रदान की गई हैं:

शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण, संसद और विधानसभाओं में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शोषण और भूमि हड़पने से सुरक्षा तथा  जनजातीय कल्याण हेतु विशेष विकास कार्यक्रम

संविधान जनजातीय समुदायों को ऐसे ऐतिहासिक रूप से वंचित सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों के रूप में मान्यता देता है जिन्हें विशेष संरक्षण और सकारात्मक भेदभाव की आवश्यकता है।

जनजातीय पहचान और धर्म का संबंध

भारत में अनुसूचित जनजातियों की पहचान का आधार धर्म नहीं है। कोई भी जनजातीय समुदाय अपने सदस्यों द्वारा अपनाए गए धर्म के कारण अपनी अनुसूचित जनजाति की स्थिति नहीं खोता। जनजातीय पहचान मुख्यतः वंश, जातियता, संस्कृति और ऐतिहासिक अनुभव से जुड़ी होती है, न कि किसी विशेष धर्म से।

भारत की जनजातियाँ अनेक प्रकार के धार्मिक विश्वासों का पालन करती हैं। अनेक समुदाय आज भी प्रकृति-पूजा, पूर्वज-पूजा और जीववादी (Animist) परंपराओं पर आधारित स्वदेशी धर्मों का पालन करते हैं। वहीं कुछ समुदायों ने समय के साथ हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म या इस्लाम को भी अपनाया है।

उदाहरणार्थ:

उत्तर-पूर्व भारत की अनेक जनजातियाँ ईसाई धर्म का पालन करती हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा की कई जनजातियाँ सरना तथा अन्य स्वदेशी धार्मिक परंपराओं का अनुसरण करती हैं। कुछ जनजातीय समुदायों ने हिंदू देवी-देवताओं और अनुष्ठानों को अपने सांस्कृतिक जीवन में सम्मिलित कर लिया है। कुछ छोटे समूहों ने बौद्ध धर्म या इस्लाम भी अपनाया है।

इन सभी परिस्थितियों में उनकी अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक मान्यता बनी रहती है, क्योंकि इसका आधार धर्म नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है।

यह स्थिति अनुसूचित जातियों (SCs) से भिन्न है, जहाँ ऐतिहासिक रूप से कुछ संवैधानिक प्रावधानों ने धार्मिक सीमाएँ निर्धारित की थीं। अनुसूचित जनजातियों के मामले में ऐसा कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है।

जनजातीय धार्मिक पहचान पर समकालीन बहस

यद्यपि धर्म अनुसूचित जनजाति की पहचान का संवैधानिक आधार नहीं है, फिर भी जनजातीय धार्मिक पहचान समकालीन भारत में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्न बन गई है। यह बहस विशेष रूप से इस बात को लेकर है कि जनजातियों को स्वतंत्र स्वदेशी धार्मिक समुदाय माना जाए या व्यापक हिंदू समाज का हिस्सा।

इस संदर्भ में दो शब्द अक्सर चर्चा में आते हैं:

“आदिवासी” — अर्थात मूल निवासी एवं “वनवासी” — अर्थात वन में रहने वाले

अनेक जनजातीय आंदोलनों, विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि “आदिवासी” शब्द जनजातीय समुदायों की ऐतिहासिक और स्वदेशी पहचान को अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कुछ संगठन “वनवासी” शब्द का प्रयोग करते हैं और यह तर्क देते हैं कि जनजातीय समुदाय व्यापक हिंदू सभ्यता का हिस्सा हैं।

आलोचकों का मत है कि इस प्रकार की अवधारणा जनजातीय समुदायों की विशिष्ट पहचान को कमजोर कर सकती है तथा उनकी स्वदेशी धार्मिक परंपराओं को व्यापक हिंदू पहचान में समाहित कर सकती है। जबकि समर्थकों का कहना है कि इससे राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता मजबूत होती है। यह विवाद भारत में पहचान, संस्कृति, मूलनिवासिता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े व्यापक प्रश्नों को प्रतिबिंबित करता है।

समकालीन चुनौतियाँ

संवैधानिक संरक्षण के बावजूद आज जनजातीय समुदाय अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं:

खनन, बाँध और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण विस्थापन, जंगलों और पारंपरिक आजीविका का नुकसान, गरीबी तथा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच, सांस्कृतिक समरसता के दबाव और भाषाओं का क्षरण तथा राजनीतिक उपेक्षा और शोषण

साथ ही, भारत में जनजातीय आंदोलन अपने भूमि, जंगल, संस्कृति और धार्मिक पहचान के अधिकारों को लेकर अधिक मुखर होते जा रहे हैं। जनगणना में अलग जनजातीय धर्म की मान्यता तथा स्वदेशी परंपराओं के संरक्षण की माँग कई राज्यों में उभर रही है।

निष्कर्ष

भारत में जनजातियों अथवा अनुसूचित जनजातियों की पहचान मुख्यतः उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक विशिष्टता, ऐतिहासिक पृथकता, जातीय पहचान तथा सामाजिक-आर्थिक वंचना के आधार पर की जाती है। धर्म इसका निर्धारक आधार नहीं है। जनजातीय समुदाय स्वदेशी धर्मों, हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, इस्लाम या अन्य आस्थाओं का पालन कर सकते हैं, फिर भी उनकी अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक स्थिति बनी रहती है।

भारतीय संविधान जनजातीय समुदायों को ऐसे विशिष्ट सांस्कृतिक समूहों के रूप में मान्यता देता है जिन्हें संरक्षण, स्वायत्तता और सकारात्मक भेदभाव की आवश्यकता है। साथ ही, जनजातीय पहचान, धर्म और सांस्कृतिक समावेशन को लेकर चल रही बहसें समकालीन भारतीय राजनीति और समाज को निरंतर प्रभावित कर रही हैं। भारतीय लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनजातीय समुदायों की विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रखते हुए उन्हें समानता, सम्मान और विकास सुनिश्चित करे।

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