रचनात्मक कार्य : पूर्ण स्वराज्य की अहिंसक राह

रमेश चंद शर्मा

‘सत्य ही ईश्वर है’, ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’, ‘सेवक की प्रार्थना’, ‘एकादश व्रत’ और ‘अचूक ताबीज का मंत्र’ देने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने रचनात्मक कार्यों को विशेष महत्व दिया। गांधी विचार और जीवनशैली में रचनात्मक कार्यों का अपना स्थान है। व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति/सृष्टि के लिए इनकी उपयोगिता और सार्थकता है।
रचनात्मक कार्य की महत्ता पर विचार करते हुए बापू ने स्पष्ट कहा था कि “रचनात्मक कार्य ही पूर्ण स्वराज्य या मुकम्मल आजादी को हासिल करने का सच्चा और अहिंसक रास्ता है। उसकी पूरी-पूरी सिद्धि ही संपूर्ण स्वतंत्रता है।” उनके अनुसार, “सत्य और अहिंसात्मक साधनों द्वारा पूर्ण स्वराज्य की यानी पूरी-पूरी आजादी की रचना है।”
इस दृष्टि में स्वराज्य केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने का नाम नहीं है। वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता और भागीदारी से निर्मित होने वाली व्यवस्था है। रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के हर तबके, वर्ग और व्यक्ति, यहां तक कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंचकर स्वराज्य का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। लोगों का सहयोग और सहकार प्राप्त कर उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है।
बापू के अपने शब्दों में, “राष्ट्र के प्रत्येक घटक की और उसमें भी उसके गरीब-से-गरीब व्यक्ति की स्वतंत्रता की सिद्धि।” यही स्वराज्य की मूल कसौटी है। इसके लिए केवल राजनीतिक संघर्ष पर्याप्त नहीं था। गांधी ने कहा, “स्वराज्य की स्थापना के लिए जिस अहिंसक पुरुषार्थ की जरूरत है, उसके लिए यह जरूरी है कि रचनात्मक कार्यक्रम का अमल समझ-बूझकर किया जाय।”
सविनय कानून-भंग और सत्याग्रह, चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक, रचनात्मक कार्यों के सहायक हैं। वे समाज में अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति पैदा करते हैं और रचनात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने का अवसर देते हैं। गांधी ने कहा था, “सविनय कानून-भंग या सत्याग्रह, फिर वह सामूहिक हो या व्यक्तिगत, रचनात्मक कार्य का सहायक है, और वह सशस्त्र विद्रोह का स्थान भलीभांति ले सकता है।”
इसलिए गांधी के यहां संघर्ष और निर्माण अलग-अलग प्रक्रियाएं नहीं हैं। सत्याग्रह अन्याय का प्रतिरोध करता है, जबकि रचनात्मक कार्य उस समाज के निर्माण की कोशिश करता है जिसमें अन्याय और हिंसा के लिए जगह कम होती जाए। गांधी ने इसी संदर्भ में कहा, “सत्याग्रह में तालीम का अर्थ है, रचनात्मक कार्यक्रम या तामीरी काम।”
रचनात्मक कार्य हिंसा, द्वेष, अलगाव, शोषण, बेरोजगारी और सामाजिक रिक्तता का विकल्प प्रस्तुत करता है। समाज को स्वावलंबी, सक्रिय, उत्पादक और सुदृढ़ बनाने के साथ-साथ उसे जोड़ने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में समता, सक्रियता, कुशलता, समझदारी, साझापन, जागरूकता, निर्भयता, शिक्षा और संगठन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
रचनात्मक कार्यों का एक महत्वपूर्ण पक्ष समाज के प्रत्येक घटक से संपर्क और संवाद स्थापित करना है। इसके माध्यम से लोगों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू होता है। किसी समाज में प्रवेश का यह ऐसा रास्ता है, जहां सेवा और संवाद एक-दूसरे से जुड़ते हैं। लोगों की वास्तविक समस्याओं को समझने और उन्हें समाधान की प्रक्रिया में सहभागी बनाने का अवसर मिलता है।
गांधी ने रचनात्मक कार्यक्रम की सूची में कौमी एकता, अस्पृश्यता-निवारण, शराबबंदी, खादी, ग्रामोद्योग, गांव की सफाई, नई या बुनियादी तालीम, बड़ों की तालीम, स्त्रियां, आरोग्य के नियमों की शिक्षा, प्रांतीय भाषाएं, राष्ट्रभाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी और विद्यार्थी सहित 18 विषयों को रखा। पशु सुधार (गौ रक्षा), सविनय कानून-भंग और कांग्रेस को भी ‘रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थान’ में शामिल किया गया है।
इस सूची को देखने से गांधी की सामाजिक दृष्टि की व्यापकता समझ में आती है। उनके लिए राष्ट्र केवल राजनीतिक संस्था नहीं था। उसमें किसान, मजदूर, आदिवासी, स्त्री, विद्यार्थी, गरीब, बीमार और समाज के वे लोग भी शामिल थे, जिन्हें मुख्यधारा अक्सर पीछे छोड़ देती है। इसीलिए रचनात्मक कार्यक्रम का लक्ष्य समाज के किसी एक हिस्से का सुधार नहीं, बल्कि समग्र सामाजिक परिवर्तन था।
रचनात्मक कार्यक्रम की एक विशेषता यह भी है कि गांधी ने इसे अंतिम या अपरिवर्तनीय सूची नहीं माना। उन्होंने इसकी प्रस्तावना में स्पष्ट किया था कि “इसमें शामिल किये गये विषय किसी खास सिलसिले से नहीं लिखे गये हैं; निश्चय ही उन्हें उनके महत्व के अनुसार स्थान नहीं मिला है।”
उन्होंने आगे कहा, “किसी खास विषय को, जो पूर्ण स्वराज्य की रचना की दृष्टि से अपना महत्व रखता है, इस कार्यक्रम में जगह नहीं मिली है, तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि वह जान-बूझकर नहीं छोड़ा गया है। वे बिना हिचकिचाये उसे मेरी सूची में शामिल कर लें और मुझे बता दें। मेरी यह सूची पूर्ण होने का दावा नहीं करती; यह तो महज मिसाल के तौर पर पेश की गयी है।”
इस कथन में गांधी के विचार की लचक और व्यावहारिकता दिखाई देती है। रचनात्मक कार्यों का चयन समय, स्थान, क्षेत्र, माहौल, वातावरण, अपनी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है। विचार-विमर्श, चिंतन-मनन और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नए कार्यों को इसमें शामिल करने की गुंजाइश बनी रहती है।
यही बात आज के संदर्भ में रचनात्मक कार्यक्रम को प्रासंगिक बनाती है। गांधी के समय जिन समस्याओं के समाधान के लिए खादी, ग्रामोद्योग, नई तालीम या गांव की सफाई जैसे कार्यक्रम सामने आए थे, आज उनके रूप बदल सकते हैं, लेकिन उनकी मूल भावना बनी रह सकती है। स्थानीय रोजगार, स्वावलंबन, श्रम की प्रतिष्ठा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समता और पर्यावरण संरक्षण जैसे सवालों को आज के रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है।
गांधी का जोर इस बात पर था कि परिवर्तन बाहर से थोपा न जाए, बल्कि समाज की अपनी भागीदारी से पैदा हो। रचनात्मक कार्य इसी भागीदारी का रास्ता खोलता है। इसमें व्यक्ति केवल किसी अभियान का दर्शक नहीं रहता, बल्कि अपने जीवन और समाज को बदलने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाता है।
आज हिंसा, द्वेष, सामाजिक अलगाव, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियां हमारे सामने हैं। ऐसे समय में रचनात्मक कार्य को केवल गांधी के समय की राजनीतिक रणनीति मानना उसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा। इसका मूल संदेश आज भी यही है कि समाज को बदलने के लिए प्रतिरोध के साथ निर्माण जरूरी है।
‘रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थान’ इस दृष्टि को समझने की महत्वपूर्ण पुस्तक है। 64 पृष्ठों की यह पुस्तक आकार में छोटी है, लेकिन गांधी के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन को समझने के लिए उपयोगी है। गांधी विचार साहित्य व्यापक स्तर पर उपलब्ध है। उसके स्वाध्याय से रचनात्मक कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं को समझा जा सकता है।
गांधी को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के नेता के रूप में देखना उनके विचार को अधूरा समझना होगा। उनका स्वराज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, समाज की समता, आर्थिक न्याय, श्रम की प्रतिष्ठा और अहिंसक सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा था। रचनात्मक कार्य इन सभी को जोड़ने वाला माध्यम था।
इसलिए आज गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम को पढ़ते हुए सबसे जरूरी सवाल यह है कि हमारे समय के रचनात्मक कार्य कौन-से हों। किन कामों से समाज में स्वावलंबन बढ़ेगा, किनसे अलगाव कम होगा, किनसे अंतिम व्यक्ति की भागीदारी सुनिश्चित होगी और किनसे हिंसा के स्थान पर सहयोग की संस्कृति विकसित होगी—इन सवालों पर विचार करना गांधी के रचनात्मक चिंतन को वर्तमान से जोड़ना है।
स्वराज्य केवल सत्ता परिवर्तन से हासिल नहीं होता। वह समाज के भीतर निरंतर रचना की प्रक्रिया से आता है। गांधी के लिए रचनात्मक कार्य इसी प्रक्रिया का आधार था। संघर्ष अन्याय के विरुद्ध रास्ता खोलता है, लेकिन निर्माण ही उस रास्ते पर स्वराज्य की वास्तविक यात्रा पूरी करता है। गांधी विचार के स्वाध्याय और रचनात्मक कार्यों के प्रयोग से इस दृष्टि को अपने समय में समझना और आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सार्थक श्रद्धांजलि हो सकती है।

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