हरियाणा की राजनीति में जातिगत समीकरण हमेशा से ही निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं, जहां जाट (लगभग 25-27% आबादी), OBC (30-32%) और दलित (21%) वोट बैंक सरकार बनाने-गिराने का आधार बने रहते हैं। 2024 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार (37 सीटें) ने पार्टी को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया, जहां जाट-केंद्रित रणनीति के कारण गैर-जाट वोट (खासकर OBC और दलित) भाजपा की ओर खिसक गए। लेकिन सितंबर 2025 में एक बड़ा बदलाव आया है: पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को विधानसभा दल का नेता चुने जाने के साथ-साथ, पार्टी ने OBC नेता राव नरेंद्र सिंह को प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) का अध्यक्ष नियुक्त किया। यह कदम दो दशक बाद कांग्रेस की रणनीति में स्पष्ट मोड़ है, जहां पहले जाट-दलित गठजोड़ पर जोर था, अब जाट-OBC पर फोकस हो गया है।
पृष्ठभूमि: 2024 की हार से सबक
जाट-केंद्रित रणनीति की असफलता: 2024 चुनावों में कांग्रेस ने 35 जाट उम्मीदवार उतारे, जो राज्य की 90 सीटों में सबसे ज्यादा थे। भूपेंद्र हुड्डा के नेतृत्व में पार्टी ने जाट-दलित समीकरण पर दांव लगाया, लेकिन इससे OBC और गैर-जाट वोट भाजपा के पक्ष में एकजुट हो गए। भाजपा ने OBC (24 टिकट) और गैर-जाट चेहरों (जैसे CM नायब सिंह सैनी) पर फोकस कर 48 सीटें जीतीं। विशेषज्ञों के मुताबिक, “जाटशाही” का डर OBC-दलित वोटरों में फैला, जिससे कांग्रेस का वोट शेयर 43.67% रह गया।
दलितों का अलगाव: दलित नेता कुमारी सैलजा को किनारे करने से दलित वोट बंट गए। INLD-BSP और JJP-अजाद समाज पार्टी जैसे गठबंधन ने दलित वोटों को चूरा लिया।
भाजपा की सफल सोशल इंजीनियरिंग: भाजपा ने “बिना परची, बिना खर्ची नौकरी” जैसे नारों से OBC को साधा और क्रीमी लेयर की सीमा बढ़ाकर जातिगत जनगणना के मुद्दे को कमजोर किया।
दो दशक बाद बदलाव: जाट-OBC पर नया फोकस
राव नरेंद्र सिंह की नियुक्ति: 29 सितंबर 2025 को हुड्डा को CLP नेता चुने जाने के साथ राव नरेंद्र सिंह (OBC, अहीर समुदाय) को PCC अध्यक्ष बनाया गया। यह 20 साल बाद OBC को पार्टी का प्रमुख पद मिला है—पिछले दो दशक में PCC अध्यक्ष ज्यादातर SC (दलित) नेता रहे। इसका मकसद दक्षिण हरियाणा (अहीरवाल बेल्ट) में भाजपा का वर्चस्व तोड़ना है, जहां OBC वोटर मजबूत हैं।
रणनीति का आधार: पार्टी ने माना कि जाट वोट बैंक (जिस पर हुड्डा का कंट्रोल है) से संतुष्टि के बावजूद विस्तार के लिए OBC जरूरी है। यह भाजपा की “गैर-जाट” रणनीति का जवाब है। विशेषज्ञ कहते हैं, “कांग्रेस अब जाट+ फॉर्मूला अपनाएगी, जहां जाट को बनाए रखते हुए OBC को शामिल किया जाएगा।” इससे 2029 चुनावों में भाजपा के OBC-कंसॉलिडेशन को चुनौती मिलेगी।
संगठनात्मक बदलाव: अगस्त 2025 में 32 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में OBC, ब्राह्मण, पंजाबी और दलितों को प्राथमिकता दी गई। यह 2014 के बाद पहला बड़ा रीशफल है, जो जाट-केंद्रित छवि को तोड़ने का प्रयास है।
संभावित प्रभाव: 2029 चुनावों पर नजर
पहलूपहले की रणनीति (जाट-दलित)नई रणनीति (जाट-OBC)संभावित लाभ/चुनौतीमुख्य वोट बैंकजाट (25%) + दलित (21%) = ~46%जाट (25%) + OBC (30%) = ~55%OBC विस्तार से भाजपा का दक्षिणी आधार कमजोर, लेकिन दलित असंतोष बढ़ सकता है।नेतृत्वहुड्डा (जाट) + सैलजा (दलित)हुड्डा (जाट) + राव नरेंद्र (OBC)OBC चेहरा दक्षिण हरियाणा में अपील, लेकिन आंतरिक कलह (सैलजा गुट) का खतरा।चुनावी प्रदर्शन2024: 37 सीटें (जाट क्षेत्रों में मजबूत)2025-29: OBC बेल्ट पर फोकसयदि सफल, तो 50+ सीटें संभव; अन्यथा, क्षेत्रीय दलों (JJP, INLD) से सेंध।भाजपा का जवाबOBC-CM सैनी पर निर्भरसंभावित SC/OBC गठजोड़ मजबूत”जाटशाही” का नैरेटिव फिर चलेगा।
यह बदलाव कांग्रेस को “जाट पार्टी” की छवि से बाहर निकाल सकता है, लेकिन सफलता के लिए जमीनी स्तर पर OBC आउटरीच और दलितों को वापस लाना जरूरी होगा। हरियाणा की राजनीति अब और जटिल हो गई है—क्या यह रणनीति 2029 में सत्ता वापसी का रास्ता बनेगी, या भाजपा फिर गैर-जाट एकीकरण से बाजी मार लेगी? समय बताएगा।

