यूजीसी एक्ट से एससी एसटी-ओबीसी वर्ग के छात्रों का सामान्य वर्ग के छात्रों से बढ़ेगा टकराव तो आरक्षण से हो रहा प्रतिभा का दमन
मुस्लिमों को गैर बीजेपी दल तो सवर्ण को बीजेपी समझती है अपना बंधुआ वोटबैंक
चरण सिंह
दिल्ली जंतर मंतर पर यूजीसी एक्ट और आरक्षण के खिलाफ सवर्ण समाज के आंदोलन ने फिर से आरक्षण का मुद्दा उभार दिया है। पहले तो यूजीसी एक्ट के बारे में समझने की जरूरत है। यदि यूजीसी नियम सुधार में मात्र एससी एसटी ही होता तो कुछ हद तक माना जा सकता था कि सरकार उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव कम करने का प्रयास कर रही है पर इन नियम सुधार में एससी एसटी के साथ ही ओबीसी को भी रखना विशुद्ध रूप से वोटबैंक की राजनीति है। बीजेपी की समझ में आ गया है कि राम मंदिर निर्माण के बाद अब मुस्लिमों के खिलाफ नफरत पैदा कर ज्यादा दिनों तक हिन्दू वोटबैंक को एकजुट कर प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
एससी एसटी और ओबीसी के बिना ज्यादा दिनों तक सत्ता प्राप्त नहीं की जा सकती है। जैसे गैर बीजेपी दल मुस्लिमों को अपना बंधुआ वोटबैंक समझते हैं ऐसे ही बीजेपी भी सवर्ण को अपना बंधुआ वोट बैंक समझती है। इसलिए यूजीसी के नियम में सुधार एससी एसटी और ओबीसी वोटबैंक पर डोरे डालने का प्रयास है। बीजेपी जानती है सवर्ण उससे कितना भी नाराज होगा पर वह वोट उसे ही देगा। नहीं तो क्या आज की तारीख में उच्च शिक्षण संस्थानों में गुर्जर, जाट और यादव समाज का उत्पीड़न राजपूत, ब्राह्मण और वैसी समाज के छात्र कर सकते हैं ? नहीं न। जहां तक आरक्षण की बात है तो लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने आरक्षण की ताकत को देख लिया है। यह विपक्ष द्वारा आरक्षण खत्म करने और संविधान बदलने की छोड़ा गया शिगूफा ही था था कि बीजेपी 240 सीटों पर सिमट कर रह गई।
यूपी में समाजवादी पार्टी 37 सीटों जीतने में सफल रही। कांग्रेस की सीटें 44 से बढ़कर 99 हो गई। यही वजह है कि पीएम मोदी ने खुद और अपने मंत्रियों से आरक्षण की पैरवी करानी शुरू कर दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तो किसी माई के लाल की हिम्मत आरक्षण खत्म करने की हिम्मत न होने की बात कर रहे हैं। हिंदुत्व की पैरवी करने वाली बीजेपी ने यूजीसी एक्ट के माध्यम से हिन्दुओं को ही आपस में लड़ाने की व्यवस्था कर दी है। नहीं तो यूजीसी से मुस्लिमों का कोई लेना देना नहीं।
जहां तक आरक्षण की बात है तो निश्चित रूप से आज़ादी के समय कमजोर वर्गों लिए आरक्षण की जरूरत थी। खुद बाबा साहब ने आरक्षण की व्यवस्था 10 साल ही रखने की वकालत की थी। उनका मानना था कि आरक्षण को कमजोर वर्गों के लिए बैसाखी नहीं बनना देना है पर बाद में आरक्षण वोटबैंक की राजनीति में बदल गया। मेरा मानना है कि यदि सरकार को लगता है किसी वर्ग को आरक्षण दिया जाए तो उसे सरकारी खर्चे से योग्य बनाया जाए पर जहां पद पर बैठने की बात हो तो पद के हिसाब से योग्यता का मापदंड एक ही होना चाहिए। यदि आरक्षण जरूरी ही है तो फिर आर्थिक आधार पर किया जाए। इस व्यवस्था से एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के गरीब बच्चों को तो आरक्षण का लाभ मिलेगा ही साथ ही सामान्य वर्ग के गरीब बच्चे भी लाभान्वित होंगे।

