बच्चों ने कई दिन तक मेहनत कर अपने खर्च से से किया रावण के पुतले का निर्माण
सभी ग्रामीणों ने शिव मंदिर पर एकत्र होकर किया रावण का पुतला दहन
बुराई पर अच्छाई के रूप में मनाया गया दशहरा, बच्चों में दिखा गजब का उत्साह
गांव के गणमान्य लोगों ने रावण का पुतला बनाने वाले बच्चों को पुरस्कृत कर की हौसला अफजाई
प्रांजल राजपूत
लच्छीरामपुर/किरतपुर/बिजनौर। जनपद बिजनौर के किरतपुर थाना अंतर्गत पड़ने वाले गांव लच्छीरामपुर में विजय दशमी पर्व बच्चों को समर्पित रहा। दरअसल इस गांव में अनोखे रूप से रावण के पुतले का दहन किया गया। बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाने वाला विजय दशमी त्यौहार को गांव के बच्चों ने ऐतिहासिक बना दिया। दरअसल इस कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि गांव के छोटे छोटे बच्चों ने रात दिन मेहनत कर रावण के पुतले का निर्माण किया। रावण के पुतले के निर्माण जो खर्च आया वह भी इन बच्चों ने आपसी सहयोग से किया।

छोटे छोटे बच्चों की मेहनत और हुनर के चलते विशालकाय रावण पुतला बना, जो देखते बन रहा था। सभी ग्रामीणों ने जब मंदिर के पास पुतले का दहन किया तो लग नहीं रहा था कि यह पुतला बच्चों ने बनाया है। ऐसा लग रहा था कि यह पुतला विशेष कारीगरों द्वारा बनाया गया है। पुतला दहन कार्यक्रम के बाद गांव के गणमान्य लोगों ने बच्चों को पुरस्कृत कर उनकी हौसला अफजाई भी की।
दरअसल दशहरा (विजयादशमी) का पर्व हमारे देश में मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत और धर्म की असत्य पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

मुख्य पौराणिक कथाएं
भगवान श्री राम की रावण पर विजय: ऐसी मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध करके माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था। रावण के दस सिर थे, इसलिए उसके अहंकार और बुराई के अंत के इस दिन को दशहरा कहा जाता है।
मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय: देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर के साथ लगातार नौ दिन और रात युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसीलिए इस दिन को विजयदशमी भी कहा जाता है।
मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय: देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर के साथ लगातार नौ दिन और रात युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसीलिए इस दिन को विजयदशमी भी कहा जाता है।

पर्व का महत्व
रावण दहन: इस दिन बुराई के प्रतीक रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले जलाए जाते हैं।
शस्त्र पूजा: इस दिन क्षत्रिय और योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते हैं।
प्रांतीय परंपराएं: भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग अंदाज में मनाया जाता है, जैसे कुल्लू का दशहरा, मैसूर का भव्य जुलूस और बंगाल की दुर्गा पूजा का समापन।
शस्त्र पूजा: इस दिन क्षत्रिय और योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते हैं।
प्रांतीय परंपराएं: भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग अंदाज में मनाया जाता है, जैसे कुल्लू का दशहरा, मैसूर का भव्य जुलूस और बंगाल की दुर्गा पूजा का समापन।







