Bihar Politics : नीतीश कुमार के एनडीए में जाने के लिए कांग्रेस और लालू प्रसाद जिम्मेदार!

जी-20 शिखर सम्मेलन में ही नीतीश कुमार ने विकल्प कर लिया था तैयार  

चरण सिंह राजपूत 

यह कांग्रेस लालू प्रसाद समेत इंडिया गठबंधन के दूसरे सहयोगी दलों की गफलत का ही नतीजा है नीतीश कुमार आज की तारीख में एनडीए का हिस्सा हैं। जो नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन के सूत्रधार थे वे अब विपक्ष के खिलाफ आग उगल रहे हैं। इंडिया गठबंधन के नेताओं को समझ लेना चाहिए था कि जब  जी 20 शिखर सम्मेलन में विपक्ष की ओर से कोई मुख्यमंत्री नहीं गया तो नीतीश कुमार क्यों गये थे ? जब विपक्ष के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर मुखर थे तो नीतीश कुमार प्रधानमंत्री से गलबहियां कर रहे थे। नीतीश कुमार तो बहाना ढूंढ रहे थे विकल्प तो वह प्रधानमंत्री से मिलकर जी-20  शिखर सम्मेलन में तैयार कर आये। ऐसे ही नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन का नाम भारत गठबंधन रखने को कहा था। इसके पीछे बीजेपी की रणनीति थी। अब विपक्ष के नेता नीतीश कुमार के कितना भी भला बुरा कह लें पर नीतीश कुमार को एनडीए में सरकने का मौका इंडिया गठबंधन के नेताओं ने उन्हें दे दिया।  यह भी कह सकते हैं कि कांग्रेस और लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को मजबूर दिया। जब प्रधानमंत्री मोदी की रैली की तारीख दो बार टाली गई तो क्या लालू प्रसाद और कांग्रेस की समझ में नहीं आई थी ?

इसे कहते हैं रणनीति कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इंडिया गठबंधन के सूत्रधार को ही कांग्रेस और लालू प्रसाद के चंगुल से छीन लिया। इसे कहते हैं ढुलमुल रवैया कि कांग्रेस ने बना बनाया खेल खुद अपने हाथों से ही बिगाड़ दिया। जी हां जहां इंडिया गठबंधन के नेता राहुल गांधी, लालू प्रसाद, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार, उद्धव ठाकरे टिकटों का बंटवारा ही नहीं कर पा रहे थे वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनडीए में शामिल होकर अपनी सरकार बना ली। ऐसे में प्रश्न उठता है कि मर जाएंगे पर बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे कहने वाले नीतीश कुमार को आखिरकार बीजेपी से हाथ क्यों मिलाना पड़ा? क्या यह सत्तालोलुपता है या फिर इंडिया गठबंधन में सम्मान न मिलने की टीस ?

दरअसल इंडिया गठबंधन में कांग्रेस का रवैया मनमानी पूर्ण रहा। चाहे पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हों या इंडिया गठबंधन में अध्यक्ष पद। या फिर टिकटों का बंटवारा, हर मामले में कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों को खास तवज्जो नहीं दी। जहां गठबंधन का अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बना दिया गया वहीं कांग्रेस बिहार में 40 में से 10 उत्तर प्रदेश में 80 में 25, पश्चिमी बंगाल में 42 में से 10, दिल्ली में 10 में 5 और पंजाब में 13 में आठ सीटें मांग रही थी। बिहार में अब नीतीश कुमार के एनडीए में जाने के बाद तो और अधिक सीटें मांगेगी। ऐसे ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने किसी क्षेत्रीय दल को कोई सीट नहीं दी। यहां तक कि मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी मात्र 6 सीटें मांग रही थी। सीटें देना तो दूर की बात उल्टे कमलनाथ ने यह भी कह दिया कि ये अखिलेश वखिलेश कौन होता है। ऐसेे ही जब कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को प्राथमिकता के आधार पर टिकटों का बंटवारा करवाना चाहिए था वहीं वह भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकल गये। चले थे भारत जोड़ने कि इंडिया गठबंधन को भी न जोड़ सके।

भले ही नीतीश कुमार के एनडीए में जाने के बाद उनको पलटूराम, अवसरवादी, आयाराम और गयाराम न जाने किन किन नामों की उपाधि दी जा रही हो। लोग उनके मर जाएंगे पर बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे वाले बयान का हवाला दे रहे हों।  भले ही सिद्धांतों और उसूलों की राजनीति के हिसाब से नीतीश कुमार ने गलत किया है। पर क्या कांग्रेस और लालू प्रसाद ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया है? जब नीतीश कुमार ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, टीएमसी चीफ ममता बनर्जी, कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, झामुमो मुखिया हेमंत सोरेन, डीएमके मुखिया एम.के. स्टालिन, शिवसेना उद्धव गुट के नेता उद्धव ठाकरे समेत विपक्ष के लगभग सभी नेताओं के पास जाकर उन्हें मनाया। इंडिया गठबंधन की नींव रखी तो क्या उन्हें इंडिया गठबंधन का संयोजक नहीं बनाया जाना चाहिए था ?
जब नीतीश कुमार ने खुद तेजस्वी यादव को अगला मुख्यमंत्री मान लिया था तो लालू प्रसाद को उनका सम्मान नहीं करना चाहिए था ? जब नीतीश कुमार लंबे समय से टिकटों के बंटवारे पर जोर दे रहे थे तो फिर लालू प्रसाद समय क्यों खींच रहे थे ? नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन का संयोजक बनवाकर ही तो तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनवाया जा सकता था। नीतीश कुमार को लगने लगा कि कहीं उनकी स्थिति धोबी का कुत्ता घर का घाट का न वाली हो जाए।  यही वजह रही कि जो विकल्प उन्होंने जी-20 शिखर सम्मेलन में तैयार किया था उसी विकल्प को अपना लिया।
दरअसल 19 दिसम्बर को जब दिल्ली के अशोका होटल में इंडिया गठबंधन की मीटिंग हुई तो नीतीश कुमार को उम्मीद थी कि लालू प्रसाद यादव उन्हें गठबंधन की संयोजक बनवा देंगे। वहां जाकर जब उन्होंने देखा कि मीटिंग में अध्यक्ष पद के लिए टीएमसी चीफ ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ा दिया और आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने उनका समर्थन भी कर दिया। उस समय नीतीश कुमार यह मानकर चल रहे थे कि लालू प्रसाद यादव मल्लिकार्जुन की जगह उनके नाम पैरवी करेंगे पर लालू प्रसाद चुप रहे। नीतीश कुमार नाराज होकर पटना चले गये। नीतीश कुमार की नाराजगी के बीच उन्हें मनाने की कोशिश नहीं की गई उल्टे लालू प्रसाद यादव टिकट बंटवारे में देरी करने लगे। जब पत्रकार ने लालू प्रसाद से सीटों के बंटवारे पर पूछा तो उन्होंने टका सा जवाब दिया कि सीटों का बंटवारा हो रहा है समय तो लगेगा ही।

नीतीश कुमार के मन में यह बात घर कर गई कि उन्हें कांग्रेस कुछ देना नहीं चाहती। लालू प्रसाद यादव भी उन पर दबाव बनाकर उनसे ज्यादा सीटें लेना चाहते हैं। ऐसे में नीतीश कुमार ने एनडीए में जाना ही मुनासिब समझा। नीतीश कुमार ने जो किया वह तो सामने है। पर लालू प्रसाद के परिवार के साथ जो होने वाला है वह पर्दे के पीछे है। जिस तरह से ईडी लैंड फॉर जॉब के मामले में लालू प्रसाद यादव के परिवार पर आक्रामक हुई है। 29 जनवरी को लालू प्रसाद की ईडी के सामने पेशी और 30 को तेजस्वी यादव की पेशी। मतलब लालू प्रसाद के परिवार पर जेल जाने का खतरा मंडरा रहा है

ऐसे ही नीतीश कुमार ने मुख्य पद की शपथ लेते ही कांग्रेस और लालू प्रसाद पर हमला बोला है। नीतीश कुमार ने कहा है कि कांग्रेस गठबंधन को हाईजैक करना चाहती थी। लालू प्रसाद सीटों के बंटवारे में देरी कर रहे थे। जदयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने तो और बड़ा आरोप लगाया है कि लालू प्रसाद और तेजस्वी प्रसाद शिक्षक भर्ती में भी लोगों की जमीन लिखवानी शुरू कर दिये थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अब बिहार की राजनीति में क्या होना वाला है। भले ही तेजस्वी यादव इसी साल जदयू के खत्म होने की बात कर रहे हों पर नीतीश कुमार और बीजेपी मिलकर चाहेंगे कि राजद को ही खत्म कर दिया जाए। ऐसे में कहा जा सकता है कि यदि लालू प्रसाद और तेजस्वी दोनों जेल चले गये गये समझो राजद का वजूद पर खतरा है। बिहार में कांग्रेस के टूटने की भी आशंका है। मतलब बिहार में बीजेपी ने अब 40 में से 40 सीटों को जीतने की रणनीति बना ली है। यदि इंडिया गठबंधन का यही रवैया रहा तो देश में भी बीजेपी 400 का आंकड़ा पार कर जाए।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या नीतीश कुमार को एनडीए में जाने से नहीं रोका जा सकता था ? हर किसी का जवाब यही होगा कि बिल्कुल रोका जा सकता था। इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदार कांग्रेस हैं तो दूसरे लालू प्रसाद हैं। जब दिल्ली की बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव ममता बनर्जी ने किया कांग्रेस और लालू प्रसाद को नीतीश कुमार के नाम कर पैरवी करनी चाहिएथा। या फिर जब मल्लिकार्जुन खड़गे को इंडिया गठबंधन का अध्यक्ष बनाया गया तो कांग्रेस को  नीतीश कुमार के विपक्ष को एकजुट करने की सराहना करनी चाहिए थी। अध्यक्ष नीतीश कुमार को बनवाना चाहिए था।

कांग्रेस नेताओं का कहना चाहिए था कि नीतीश कुमार के प्रयास से ही इंडिया गठबंधन स्वरूप ले पाया है। इसलिए अध्यक्ष पद पर नीतीश कुमार का ही अधिकार है। या फिर जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दस बारह दिन पहले ही नीतीश कुमार के एनडीए में जाने की खबर होने की बात कर रहे हैं तो फिर कांग्रेस ने उन्हें मनाने का प्रयास क्यों नहीं किया ? या फिर जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने जा रहे थे तो इंडिया गठबंधन के नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, लालू प्रसाद, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार समेत दूसरे नेता उनसे मिलने पटना क्यों नहीं गये ? इन नेताओं को नीतीश कुमार के आवास पर जाकर धरना दे देना चाहिए था। कहना चाहिए था कि नीतीश कुमार के बिना इंडिया गठबंधन का स्वरूप नहीं बनेगा। जब राहुल गांधी जीतन राम मांझी को फोन कर सकते हैं तो फिर नीतीश कुमार को उन्होंने क्यों नहीं मनाया ?

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