सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की खूब चर्चा हो रही है। अमेरिका के बोस्टन शहर से अभिजीत दिपके द्वारा शुरू की गई यह वर्चुअल पार्टी अपने मजाकिया और सरकार-विरोधी तेवरों से इंस्टाग्राम पर बीजेपी से भी आगे निकल गई। हालांकि, भारत में इसका मुख्य एक्स अकाउंट बंद होने के बाद अब इसे नए हैंडल से चलाया जा रहा है। इस अनोखे नाम के बाद लोगों के जेहन में यह सवाल तैरने लगा है कि क्या भारत में पहले भी जानवरों के नाम या उनके प्रतीकों पर पार्टियां बनी हैं? देश के चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो ड्रैगन या कॉकरोच से बहुत पहले भारत में शेर, गाय और हाथी जैसे जीवों ने राजनीति की दशा और दिशा तय की है। .
भारतीय राजनीति में जीवों के प्रतीकों का इतिहास बेहद पुराना और प्रभावशाली रहा है। देश की मुख्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों ने जानवरों के सिंबल पर चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल की है। इसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण मायावती की ‘बहुजन समाज पार्टी’ (BSP) है, जिसका आधिकारिक चुनाव चिह्न हाथी है। राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रतीक ने एक बड़े वोट बैंक को एकजुट करने का काम किया। इसके अलावा पूर्वोत्तर के राज्य असम में ‘असम गण परिषद’ (AGP) भी एक प्रमुख क्षेत्रीय दल है, जो चुनाव आयोग द्वारा आवंटित इसी हाथी निशान के साथ वर्षों से चुनावी मैदान में अपनी मजबूत किस्मत आजमा रहा है।
चुनावी मैदान में दहाड़ने वाला शेर
हाथी के अलावा देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़े संगठनों ने भी हिंसक और शक्तिशाली जीवों को अपने दल की पहचान बनाया। महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित की गई पार्टी ‘ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इस ऐतिहासिक राजनीतिक दल का आधिकारिक चुनाव चिह्न ‘शेर’ है। यह प्रतीक पार्टी की आक्रामक और निडर विचारधारा को दर्शाता है। आज भी यह पार्टी इसी सिंबल के साथ चुनावी मैदान में उतरती है और भारतीय निर्वाचन आयोग के पुराने नियमों के तहत इसे इस हिंसक पशु के निशान को इस्तेमाल करने की पूरी कानूनी छूट मिली हुई है।
कांग्रेस का बैलों वाला सफर
आजाद भारत के शुरुआती दौर में देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ का जुड़ाव भी सीधे तौर पर कृषि और पशुधन से रहा था। अपने शुरुआती दौर के चुनावों में कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिह्न ‘दो बैल’ हुआ करता था, जो उस समय के ग्रामीण और किसान भारत का प्रतिनिधित्व करता था। समय के साथ पार्टी के भीतर कई बदलाव आए और अंदरूनी कलह भी देखने को मिली। जब कांग्रेस में बड़ा विभाजन हुआ, तो इंदिरा गांधी वाले गुट को चुनाव आयोग की तरफ से ‘गाय और बछड़ा’ का नया प्रतीक आवंटित किया गया था, जिसने उस दौर की राजनीति में भावनात्मक रूप से बड़ा असर डाला था।
दक्षिण की राजनीति में मुर्गे पर दांव
जानवरों और पक्षियों से जुड़े चुनाव चिह्नों का यह सिलसिला सिर्फ उत्तर या पूर्वोत्तर भारत तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि दक्षिण भारत की क्षेत्रीय राजनीति में भी इसका दिलचस्प नजारा देखने को मिला था। तमिलनाडु की बेहद प्रभावशाली और बड़ी पार्टी ‘अन्नाद्रमुक’ (AIADMK) ने अतीत के चुनावों में अपने दल के लिए ‘मुर्गा’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल किया था। हालांकि, बाद के वर्षों में राजनीतिक समीकरणों और चुनाव आयोग की नई व्यवस्थाओं के चलते इस प्रतीक को बदल दिया गया. इसके बाद पार्टी ने नए सिंबल के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाया, जिससे यह साफ होता है कि अतीत में आयोग प्रतीकों को लेकर काफी लचीला था।
पशु क्रूरता के खिलाफ आयोग का कड़ा डंडा
अब सवाल उठता है कि क्या भविष्य में किसी नई पार्टी को कॉकरोच या किसी अन्य जीव का निशान मिल सकता है? तो इसका सीधा जवाब है कि चुनाव आयोग ने अब नए दलों के लिए इस पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। दरअसल, चुनावी रैलियों और प्रचार के दौरान राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा असली जानवरों को धूप में घुमाने और उनके साथ क्रूरता करने के कई मामले सामने आए थे. पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की भारी शिकायत के बाद, भारत निर्वाचन आयोग ने जीवों के दुरुपयोग को रोकने के लिए नया नियम लागू किया। इसके तहत अब किसी भी नए दल को किसी जानवर या पक्षी का चुनाव चिह्न आवंटित नहीं किया जाता है।
पुराने दलों को मिली विशेष कानूनी सुरक्षा
चुनाव आयोग का यह प्रतिबंध केवल नए पंजीकरण कराने वाले राजनीतिक दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों पर ही लागू होता है। जिन पुरानी और स्थापित पार्टियों को दशकों पहले चुनाव आयोग की तरफ से हाथी या शेर जैसे जीवों के निशान आधिकारिक तौर पर आवंटित किए जा चुके हैं, उन्हें इस नए नियम से पूरी तरह बाहर रखा गया है। बहुजन समाज पार्टी और फॉरवर्ड ब्लॉक जैसी पार्टियां आज भी बिना किसी कानूनी अड़चन के अपने पुराने जीव प्रतीकों का खुलकर इस्तेमाल कर सकती हैं. इसलिए, इंटरनेट पर भले ही कॉकरोच पार्टी का नाम ट्रेंड कर रहा हो, लेकिन असल लोकतंत्र में अब किसी नए जीव की एंट्री नामुमकिन है।

