क्या है मामला?
दरअसल अशोक चौधरी ने आरएसएस से जोड़ने की टिप्पणी तब की कि जब विपक्ष, खासकर RJD नेता तेजस्वी यादव ने NDA नेताओं के दामादों को सरकारी आयोगों में नियुक्त करने पर सवाल उठाए। तेजस्वी ने इसे “जमाई आयोग” करार दिया। चौधरी ने सफाई में RSS कोटे का जिक्र किया, जिससे विवाद बढ़ा।
क्या RSS का दखल वाकई है?
संकेत: चौधरी का बयान, भले ही सफाई के लिए हो, यह दर्शाता है कि RSS का प्रभाव NDA के भीतर कुछ नियुक्तियों में हो सकता है। सायण कुणाल के पिता किशोर कुणाल का RSS से जुड़ाव रहा है, जिसे चौधरी ने आधार बनाया।
नीतीश की स्थिति: नीतीश NDA के सहयोगी हैं, और BJP-RSS के साथ गठबंधन में उनकी सरकार चल रही है। ऐसे में कुछ फैसलों में RSS की सलाह या प्रभाव स्वाभाविक हो सकता है, खासकर धार्मिक या सांस्कृतिक मामलों में।
विपक्ष का दावा: RJD और प्रशांत किशोर जैसे नेता नीतीश की स्वायत्तता पर सवाल उठाते हैं। किशोर ने दावा किया कि नीतीश “शारीरिक और मानसिक रूप से निर्णय लेने की स्थिति में नहीं,” जिससे उनके आसपास के लोग, संभवतः RSS-BJP, प्रभाव डाल रहे हैं।
JDU का बचाव: JDU प्रवक्ता नीरज कुमार ने नीतीश को “ग्लोबल लीडर” बताकर इन आरोपों को खारिज किया। चौधरी ने भी बाद में नीतीश को अपना “अभिभावक” बताया, जिससे उनके बयान को गलतफहमी करार देने की कोशिश हुई।
नीतीश और RSS का रिश्ता गठबंधन की मजबूरी और ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ा है। हालांकि, यह कहना कि नीतीश के सभी फैसले RSS के इशारे पर हैं, अतिशयोक्ति हो सकती है, क्योंकि नीतीश की राजनीतिक रणनीति उनकी स्वायत्त छवि पर टिकी है।
बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और यह मुद्दा विपक्ष के लिए नीतीश को घेरने का हथियार बन सकता है।








