जम्हूरियत बचाने का चुनाव?

राजकुमार जैन

आज से 65 साल पहले अल सुबह अंधेरे में ही, मोहल्ले के आरएसएस के स्वयंसेवक मास्टर जी को बेनागा, मौसम कैसा भी हो, दो-तीन अल्हड उम्र के लड़कों के घर पर आवाज लगाते देखता था कि शाखा का समय हो गया है। उस जमाने में हमारे मोहल्ले में खाकी निक्कर, काली टोपी पहनने वाले यह स्वयंसेवक मजाक और बेकदरी नजर से देखे जाते थे। चुनाव में तयशुदा हार के बावजूद, चुनाव के दिन जनसंघ के बूथ पर आखिर तक मुस्तैदी से खड़े रहते थे।
हालांकि जब भी इनका सियासी फंडा हिंदू मुस्लिम ही होता था। हिंदुस्तान पाकिस्तान के विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी बड़ी तादाद में उनके समर्थक बन गए। उसके बाद दिल्ली के व्यापारिक तबके में ‘खुला व्यापार’ जिसका माल सस्ता और अच्छा होगा उसका माल बिकेगा। सरकारी कंट्रोल, कोटा लाइसेंस ना हो के कारण यह वर्ग भी उनके साथ जुड़ गया।
हिंदुस्तान में पहली बार दिल्ली कॉर्पोरेशन में जनसंघ की जीत हुई। 1952 में 3.1,3 सीट, 1957 में 5.9, 4 सीट, 1962 में 6.4, 14 सीट, 1967 में 9.4 35 सीट,1971 में 7.37 22 सीट, 2004 में 282 सीट, 2014 में 300 लोकसभा सीट भाजपा ने जीती।
इस प्रकार तीन लोकसभा सदस्यों की जीत से शुरु हुआ यह सफर 2019 में 303 तक पहुंच गया।
श्री अटल बिहारी वाजपेई की उदार छवि एवं एक अनुशासित पार्टी के रूप में समाज के पढ़े-लिखे, प्रोफेशनल तबको मैं भी भाजपा की पैठ बढ़ती गई। हालांकि 1984 में पार्टी दो सीटों तक ही सिकुड़ गई थी।
नरेंद्र मोदी के आने के बाद, भाजपा का पहले वाला संगठन का ढांचा जिसमें आर एस एस के हाथ में भाजपा की नकेल थी, की जगह जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर का नया अवतार नरेन्द्रमोदी पैदा हो गया। बिल्कुल हिटलर के स्टाइल में उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरुआत करते हुए हजारों बेकसूर लोगों का कत्लेआम करवा दिया। अटल बिहारी ने सार्वजनिक रूप से कहा भी कि नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करना चाहिए था। परंतु नरेंद्र मोदी के रक्षक एलके आडवाणी बनकर खड़े हो गए। पिछले 10 सालों से हिंदुस्तान की गद्दी पर नरेंद्र मोदी ने, पार्टी को कूड़ेदान बनाकर अपनी मनमर्जी से नए-नए सूबेदार, मंत्रिमंडल में ऐसे ऐसे मंत्रियों जो तमाम उम्र भाजपा को कोसते थे,को शामिल कर लिया। सालों से शाखा में अपनी जिंदगी खपाने वालों को मक्खी की तरह बाहर निकाल कर फेंक दिया। बड़े पदों पर जेब में से नाम निकालकर मुल्क को चौंका दिया। जितने भ्रष्टाचारी जिनके खिलाफ भाजपा कार्यकर्ता चिल्ला चिल्ला कर बोलते थे, उनको उन्हीं की छाती पर लाकर बैठा दिया। हिंदुस्तान की कुर्सी पर एक ऐसा प्रधानमंत्री बैठ गया, जिसके कारनामों, भाषणों, अंटशंट बोलने और सारे हथकंडे के इस्तेमाल के बावजूद, शर्तिया हार से बौखलाए प्रधानमंत्री ने, शालीनता की सभी हदों को पार कर दिया। इन बातों का हमेशा हमेशा भाजपा के कार्यकर्ताओं को जवाब देना होगा। आज भले ही तमाम टेलीविजन चैनल, अखबारो पर शिकंजा कसकर एक तरफा प्रचार हो रहा हो, परंतु यह जमाना ऑडियो वीडियो का है, छुपाए से भी छुपेगा नहीं।
अटल बिहारी वाजपेई की उदार छवि से भाजपा इस मुकाम पर पहुंची थी। आम आवाज में आज भी जिक्र होता है कि वह वाजपेई थे जो एक वोट की हार से स्तीफा देकर चले गए। आज नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, परंतु हमारे मुल्क का सियासी इतिहास बताता है कि ऐसे निरंकुश तानाशाह, मुल्क की गंगा जमुनी तहजीब को दफन करने वाले को, जनता जरूर सबक सिखाएगी। परंतु बीजेपी के उन निष्ठावान निक्कर धारी स्वयंसेवकों को न जाने कब तक इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा।

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