बच्चों की मौत पर मध्य प्रदेश और केंद्र सरकार में बेशर्मी और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा
बालाघाट जिले में मर रहे आदिवासी बच्चे और मोहन यादव मना रहे प्रधानमंत्री जन्मदिन
कुछ हफ़्तों में एक ही जिले में मर गए 30 से अधिक बच्चे, 400 से अधिक अस्पतालों में भर्ती
मलेरिया, खसर, कुपोषण और संक्रमण जैसी बीमारियां बताई जा रही हैं मरने का कारण
चरण सिंह
अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा वाली कहावत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज पर सटीक बैठ रही है। सरकार के जमीनी हकीकत को छिपाने और जनता को भ्रमित करने के चक्कर में देश में अराजकता का माहौल पैदा हो गया है। जनता बेरोजगारी, महंगाई से कराह रही है और प्रधानमंत्री अपने जन्मदिन पर अरबों रुपए पानी की तरह बहा रहे हैं। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में हाल में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है। सैकड़ों बच्चे अस्पतालों में भर्ती हैं और प्रदेश मुख्यमंत्री अपने आका को खुश प्रधानमंत्री के जन्म का जश्न मना रहे हैं। मरते रहे बच्चे। राजा का जन्म दिन एक महीने तक मनाना है।

इसे बेशर्मी और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि जब खुद प्रधानमंत्री बोलते हैं कि वह 80 करोड़ लोगों को 5 किलों मुफ्त राशन दे रहे हैं। जब वह खुद खाद्य तेल बचाने की बात कर रहे हैं। जब वह देश में बड़ी आर्थिक चुनौती की बात कर रहे हैं। जब देश बड़े स्तर पर बेरोजगारी और महंगाई से जूझ रहा है तो फिर ऐसे कौन सी इमरजेंसी पड़ गई कि प्रधानमंत्री को अपने जन्म दिन पर अरबों की फिजूलखर्ची के कार्यक्रम निर्धारित कर दिए। यह राजतन्त्र तो है नहीं कि राजा जो चाहे करे कोई पूछने वाला नहीं। लोकतंत्र में हर पैसे का हिसाब देना होता है। प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर पानी की तरह बहाया जा रहा यह पैसा कहां से आया है ? यदि जनता के टैक्स का है तो फिर प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर इस तरह उड़ाने का सरकार को क्या अधिकार है ? यदि यह पैसा कोई पूंजीपति लगा रहा है तो क्यों लगा रहा है ? क्या इसका खामियाजा जनता को नहीं भुगतना पड़ेगा।
देश के जिम्मेदार तंत्र क्या इतने संवेदनहीन और सत्ता के गुलाम हो गए हैं कि उन्हें जनता की कोई पीड़ा और समस्या नहीं दिखाई दे रही है। विशेषकर मीडिया को । जब सभी अख़बार मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत, कारण और सरकार के उदासीन रवैये से से भरे होने चाहिए। जब टीवी चैनलों में बालाघाट में बच्चों की मौत और कारण पर डिबेट चलनी चाहिए। जब बच्चों की मौत, कारण, उपाय और आने वाले संकट पर पॅकेज बनने चाहिए। ऐसे में हर कोई राजनीति में उलझा हुआ है। सरकार की चाटुकारिता प्राथमिकता हो गई है। ऐसा लग रहा है जैसे सब धंधे में लगे हैं। सब सत्ता की गुलामी कर रहे हैं। इसे विडंबना ही कहा जाएगा की कुछ स्वतंत्र पत्रकार जमीनी हकीकत दिखाने का प्रयास कर रहे हैं तो उन्हें विभिन्न तरह से परेशान किया जा रहा है। जमीनी सच्चाई को जनता तक पहुंचने से रोका जा रहा है।
दरअसल मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में पिछले कुछ हफ्तों में बिरसा और बैहर विकासखंड के दूरदराज के गांव बोंदारी, कुंडेकसा और कोरका में 32 बच्चों की मौत हो चुकी है। मौत का कारण मलेरिया, खसरा (मीजल्स), कुपोषण और संक्रमण जैसी बीमारियां बताई जा रही है। गांवों में साफ पीने के पानी की कमी, खराब स्वास्थ्य सेवाएं और कुपोषण एक बड़ा संकट बना हुआ है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि प्रदेश और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रियों को क्या बस प्रधानमंत्री को ही खुश करना है या फिर कुछ जनता की भी चिंता करनी है। जब मोहन यादव को आदिवासी बच्चों की जान बचाने के प्रयास में जुटना चाहिए था तब वह प्रधानमंत्री की चाटुकारिता में आशीर्वाद के दीये जला रहे थे। बच्चों की मौत से बेखबर मोहन यादव ने उज्जैन में क्षिप्रा नदी के घाटों पर 30 लाख से अधिक दिए जलाए। मोहन यादव ने बाबा महाकाल से पीएम मोदी की लंबी उम्र की कामना तो की पर आदिवासी बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया। ऐसे ही मुख्यमंत्री ने भोपाल में भी मोदी के जन्मदिन ‘गौरव दिवस’ के रूप में मनाया।
बीजेपी सरकारों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाए गए तंत्रों को कब्जाकर जनता को मरने के लिए छोड़ दिया है। क्योंकि जमीनी हकीकत लोगों तक नहीं पहुंच रही है ऐसे में सरकार जो चाह रही है वह कर रही है। जो लोग जमीनी हकीकत दिखाने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें तरह तरह से परेशान किया जा रहा है। जब रिपोर्टिंग के दौरान कुछ स्वतंत्र पत्रकारों ने स्थानीय अस्पताल की स्थिति दिखाई। उन्होंने ज़िला प्रशासन से अस्पताल की स्थिति और बच्चों की मौत के आंकड़ों को लेकर सवाल किए तो उन्हें बालाघाट से निकलने के लिए मजबूर किया गया। जानकारी मिल रही है कि स्वतंत्र पत्रकार लोकभद्र सिंह, मोनिका सिंह, बिंदु गुर्जर और सौरभ भाटी के आदिवासी बच्चों की मौतों पर रिपोर्टिंग करने के बाद उन पर निगरानी और दबाव बनाने की कोशिश की गई। वहाँ से लौटने के बाद उनके इंस्टाग्राम अकाउंट बार-बार सस्पेंड किये गए। ‘जानकारी मिल रही है कि एक बिस्तर पर अलग-अलग बीमारी से पीड़ित तीन-चार बच्चे हैं। जिनमें कोई खसरे का, कोई मलेरिया का, कोई कुपोषण का और कोई सामान्य बुखार का मरीज़ है। इससे भी संक्रमण फ़ैल रहा है। दरअसल खसरा संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने आदि से फैलता है।

