क्या लोकतंत्र शासकों के हुक्म का नाम है या लोगों के अधिकारों का?

संजय के. झा

 

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: एस आर दारापुरी)
आइए एक गड्ढा खोदें; इतना बड़ा गड्ढा जिसमें उस घिसी-पिटी बात को दफ़नाया जा सके – ‘जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए’। लोकतंत्र, या यूं कहें कि लोकतंत्र की जननी, अब शासकों के हुक्म और पुलिस की ताकत के दम पर फल-फूल रही है। लोकतंत्र अब शासन के सिद्धांतों की आत्मा नहीं, बल्कि तानाशाही को जायज़ ठहराने का मुखौटा बन गया है। लोकतंत्र का इस्तेमाल विदेश दौरों पर प्रधानमंत्री की डींगें मारने के लिए किया जाता है, न कि राजधानी की सड़कों पर संवैधानिक अधिकारों का जश्न मनाने के लिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 8,400 करोड़ रुपये का विमान, 12 करोड़ रुपये की कार और ऐसी सुरक्षा व्यवस्था चाहिए जिस पर रोज़ाना 1.6 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। लेकिन आम नागरिक अपनी पसंद के मेट्रो स्टेशन पर नहीं उतर सकते! जंतर-मंतर के आस-पास के सभी मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि पुलिस के आला अधिकारियों को डर है कि प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ ‘सम्राट’ की चमकती छवि पर दाग लगा देगी। जंतर-मंतर, जो देश की राजधानी में विरोध-प्रदर्शन के लिए तय एकमात्र जगह है, उसे कई परतों वाली बैरिकेडिंग लगाकर पहुंच से बाहर कर दिया गया है। हाथ में प्लेकार्ड लेकर आने वाले हर छोटे बच्चे या बच्ची पर झपटने के लिए सौ पुलिसकर्मी तैयार रहते हैं। उन्हें कुछ ही मिनटों में इंतज़ार कर रही बस में भर दिया जाता है, मानो पुलिस किसी भी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को मिटाने के जुनून में डूबी हो। एयर-कंडीशनर वाले कमरों में बैठे ‘सम्राट’ के घबराए हुए चाटुकारों को देश में कहीं भी असहमति का कोई निशान नहीं दिखना चाहिए।

2 अक्टूबर, महात्मा गांधी की जयंती, ने प्रदर्शनकारियों में आज़ादी और ऊर्जा का एक नया जोश भर दिया। सिविल सोसाइटी ने इस गांधी जयंती पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया था। उन्होंने जंतर-मंतर पर – जो विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह मानी जाती है – प्रदर्शन की अनुमति के लिए दिल्ली पुलिस से बार-बार गुहार लगाई। यह पूरी तरह से जायज़ मांग थी। लेकिन पुलिस नियमों की किताब नहीं, बल्कि ‘सम्राट’ का हुक्म मानती है।

उसने जंतर-मंतर के चारों ओर एक अभेद्य किला बना दिया और छात्रों, कार्यकर्ताओं और राजनेताओं को इंतज़ार कर रही सैकड़ों बसों में भर दिया। सांसद और प्रोफेसर मनोज झा हैरान रह गए जब उन्हें एक खाली बस में डाल दिया गया और वह बस तुरंत चल पड़ी; उन्हें वहां अपनी मौजूदगी की वजह बताने के लिए कुछ मिनट भी नहीं दिए गए। एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव का भी यही हाल हुआ। निडर स्टूडेंट लीडर नेहा बोरा को काबू करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी, क्योंकि वह बार-बार उसी जगह लौट आती थीं।

केरल और झारखंड जैसी दूर-दराज की जगहों से आए युवा लड़के-लड़कियों को अपनी बात कहने के लिए एक मिनट भी नहीं दिया गया। क्यों? क्या वे लोकतंत्र की परिभाषा में बताए गए “लोग” नहीं हैं? क्या सिर्फ़ प्रधानमंत्री को ही आज़ादी मिली है? ऐसी बेतुकी फ़ैसले लेने की आज़ादी, जैसे अहमदाबाद में अमेरिकी राष्ट्रपति को “नमस्ते ट्रंप शो” के लिए बुलाना और आधी रात को नोटबंदी का ऐलान करके 100 करोड़ से ज़्यादा भारतीयों की ज़िंदगी अस्त-व्यस्त कर देना? कोविड के दौरान ट्रेनें और बसें बंद करके ऐसा भयानक मानवीय संकट पैदा करने वाले फ़ैसले लेने की आज़ादी, जिसमें लाखों लोगों को अपने घर पहुँचने के लिए सैकड़ों मील पैदल चलना पड़ा? नागरिकों को वह आज़ादी नहीं दी जाती; क्या वे अपने अधिकार छीने जाने, ठगे जाने, लूटे जाने और परेशान किए जाने पर अपना गुस्सा भी ज़ाहिर नहीं कर सकते? शायर मुनव्वर राना ने लिखा था: एक आँसू भी हुकूमत के लिए खतरा है/ तुमने देखा नहीं आँखों का समंदर होना…?

प्रधानमंत्री और मंत्री इस देश के मालिक नहीं हैं। जंतर-मंतर अमित शाह का निजी लॉन नहीं है। उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे नागरिकों के साथ ऐसे बर्ताव करें जैसे वे बेवकूफ प्रजा हों जिन्हें गुमराह किया जा सके, जिनके साथ बुरा बर्ताव किया जा सके, जिन्हें परेशान किया जा सके, ज़लील किया जा सके, धमकाया जा सके और मामूली वजहों से जेल में डाला जा सके। मोदी ने खुद को सेवक और चौकीदार कहा, लेकिन बर्ताव एक बेरहम सम्राट जैसा किया। क्या उन्हें इस बात का एहसास है कि वोट चुराने और वोटर लिस्ट से गैर-कानूनी तरीके से 13 करोड़ नाम हटाने के आरोपी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने के लिए ताकत का इस्तेमाल करना कितना अनैतिक है? जो शासक ताकत के दम पर अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं, वे मुगालते में जी रहे हैं।

 

मज़बूत नेता?

एक मज़बूत नेता की क्या खूबियाँ होती हैं? सच को दबाना, विरोधियों और आलोचकों को कुचलने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करना और झूठे प्रचार के ज़रिए देश को गुमराह करना? लीडरशिप के पतन को सबसे ज़्यादा कोई चीज़ दिखाती है, तो वह है जनमत से डरना। अगर कोई नेता टीवी स्टूडियो में सजे-धजे एंकरों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ से खुश होता है और सड़कों पर लोकतंत्र की आवाज़ से डरता है, तो समझो उसका राजनीतिक पतन शुरू हो गया है। मीडिया द्वारा बनाई गई झूठी छवि और सरकार की ज़बरदस्ती करने वाली ताकतों का इस्तेमाल भले ही पतन को कुछ समय के लिए टाल दे, लेकिन राजनीतिक किस्मत को फिर से नहीं संवार सकता।

मोदी इतने समझदार राजनेता हैं कि वे यह समझते हैं कि किसी बदनाम नौकरशाह को बचाने से ज़्यादा ज़रूरी उन नागरिकों की चिंताओं को दूर करना है जो सिर्फ़ निष्पक्ष चुनाव की मांग कर रहे हैं। यह मानना मुश्किल है कि RSS-BJP यह नहीं समझते कि ‘वोट चोरी’ के शक की बदबू और दाग के साथ चुनावी जीत हासिल करना कितना खतरनाक है। राजनीति का एक औसत छात्र भी मोदी को यही सलाह देगा कि वे ज्ञानेश कुमार को हटा दें और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठ रही चिंताओं को ईमानदारी से दूर करके अपनी छवि साफ़ करें।

इस सिस्टम की बेशर्मी भरी हर चाल इसके बुरे इरादों और असली चेहरे को बेनकाब कर देगी। RSS-BJP बिना राजनीतिक बदलाव के टिक नहीं सकते; उन्हें नए रूप-रंग की सख्त ज़रूरत है, भले ही वे अपनी गलत विचारधारा पर ही क्यों न अड़े रहें। ज़बरदस्ती की राजनीति इस सोच को और मज़बूत करेगी कि सही सवाल पूछने वाले नागरिकों को बर्दाश्त नहीं किया जाता और सिर्फ़ आँख मूँदकर वफ़ादारी दिखाने को ही राजनीतिक गुण माना जाता है। भारत उस दौर से आगे निकल चुका है और उसने राष्ट्रवाद के दिखावे और विकास के झूठे वादों के पीछे की सच्चाई को समझने की अपनी क्षमता को फिर से पा लिया है। हालाँकि राष्ट्रवाद में लोगों की भावनाओं को भड़काने की ताकत है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही आबादी की ज़िंदगी पर असर डालने की इसकी क्षमता सीमित है; वहीं विकास का लक्ष्य पहले ही 2047 तक टाल दिया गया है।

अस्तित्व बचाने के तत्काल संकट ने आम लोगों को उस राजनीतिक सम्मोहन से बाहर निकाल दिया है जिसे मोदी ने पिछले दशक में बुना था। समाज के बड़े हिस्से में अब उनके बेचे जाने वाले धर्म और नफ़रत के नशे की कोई चाहत नहीं है। संदेश साफ़ है: कुछ नया लाओ या बाज़ार से बाहर हो जाओ।

 

 

विरोध प्रदर्शन में उठी आवाज़ें

 

2 अक्टूबर को जंतर-मंतर आईं एक बुज़ुर्ग महिला अपने पति की ज़ोरदार गुज़ारिश के बावजूद वहाँ से जाने को तैयार नहीं हुईं, जबकि पति कह रहे थे, “चलो; दोपहर के खाने का समय हो गया है। हमने सब देख लिया है।” लगभग 70 साल की उस महिला ने झिड़कते हुए कहा, “अभी नहीं। नेहा बोरा को देखे बिना नहीं जा सकती।”

CPI(M-L) के संगठन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की कार्यकर्ता मुख्य आकर्षण थीं। मीडियाकर्मी भी सोच रहे थे कि वह कब आएंगी। एक सुरक्षित जगह पर पेड़ के नीचे खड़े बुज़ुर्ग जोड़े ने आने-जाने वालों से बार-बार पूछा, “नेहा कब आएंगी?” उस युवा महिला ने सुबह शाहरुख खान का एक डायलॉग इस्तेमाल किया था: “कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, मौसम बिगड़ने वाला है” – इसने पुलिसकर्मियों के मन में भी उत्सुकता पैदा कर दी थी। एक पुलिसकर्मी ने दूसरे से कहा, “वह लड़की आ जाए तो मामला खत्म हो,” यह जाने बिना कि “वह लड़की” कुछ ही घंटों में तीन बार और अगले दिन फिर आएगी। लेकिन मोदी सरकार के लिए असल चिंता की बात पुलिसकर्मियों के एक बड़े हिस्से में दमनकारी तरीकों के खिलाफ़ दबी हुई नाराज़गी है। हालांकि वे खुलकर बोलने से हिचकिचा रहे थे, लेकिन उनमें से कई ने माना कि सरकार को शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त देनी चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके परिवार वाले पुलिस के हिंसक तरीकों का समर्थन करते हैं, तो कई ने कहा, “वे ऐसा नहीं करते।” विरोध के मकसद का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा, “हम तो बस अपनी ड्यूटी कर रहे हैं।” कुछ ने तो अफ़सोस भी जताया कि सीनियर अफ़सर राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे।

हालांकि, सबसे दिलचस्प प्रतिक्रियाएं किशोरों की तरफ़ से आईं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे दोबारा अपशब्दों का इस्तेमाल करने को तैयार हैं, तो एक छोटी बच्ची मुस्कुराई और बोली, “सरकार जैसा काम करेगी, वैसी ही भाषा निकलेगी।”

एक और किशोर ने नेताओं और ट्रोल की भाषा की ओर इशारा करते हुए कहा कि गालियां देश के लिए उतनी नुकसानदेह नहीं हैं, जितनी “शासकों की गंदी हरकतें”। एक लड़के ने गर्व से “वोट चोर-गद्दी छोड़” वाला प्लेकार्ड दिखाते हुए कहा, “हमें चोरों की कोई परवाह नहीं है। वे सम्मान के लायक नहीं हैं।” सबसे तीखी बात एक ऐसे “आंदोलनजीवी” ने कही, जिसने पिछले तीन-चार दशकों में दिल्ली में लगभग हर विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। उसने कहा, “मैं आज नहीं जाऊंगा क्योंकि अगर पुलिस हिंसा पर उतर आई, तो मैं भाग नहीं पाऊंगा।”

कांग्रेस सरकारों के समय नागरिकों के मन में ऐसा डर नहीं होता था। मौजूदा प्रधानमंत्री के उस गर्व भरे बयान को दोहराते हुए कहा जा सकता है, “ये मोदी है, मोदी; लेने के देने पड़ जाएंगे।”

संजय के. झा एक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।

साभार: thewire.in

अंग्रेजी लेख का लिंक : https://thewire.in/rights/politic-is-democracy-about-rulers-diktat-or-peoples-rights

  • Related Posts

    जाति का विनाश’: संतराम बीए, आंबेडकर और गांधी के बीच वाद-विवाद और संवाद

    सिद्धार्थ रामू संतराम बीए (14 फरवरी, 1887 –…

    Continue reading
    जंतर-मंतर-2 : लोकतंत्र की बेचैनी और युवाओं की नई करवट

    नीरज कुमार जंतर-मंतर-2 शुरू हो चुका है। ऐसा…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    अपनी दुर्दशा पर रो रहा नयाबास का सरकारी स्कूल, महीनों गायब रहती हैं शिक्षका, पानी और शौचालय का दुरुस्त व्यवस्था नहीं  

    अपनी दुर्दशा पर रो रहा नयाबास का सरकारी स्कूल, महीनों गायब रहती हैं शिक्षका, पानी और शौचालय का दुरुस्त व्यवस्था नहीं  

    जंतर-मंतर पर पुलिसवालों के नेम टैग क्यों गायब? CPI सांसद ने अमित शाह को लिखा लेटर!

    जंतर-मंतर पर पुलिसवालों के नेम टैग क्यों गायब? CPI सांसद ने अमित शाह को लिखा लेटर!

    फॉर्म 6 पर SC की टिप्पणी से बवाल, कांग्रेस और CJP बोली- ‘…तो CEC ने झूठ बोला’

    फॉर्म 6 पर SC की टिप्पणी से बवाल, कांग्रेस और CJP बोली- ‘…तो CEC ने झूठ बोला’

    क्या लोकतंत्र शासकों के हुक्म का नाम है या लोगों के अधिकारों का?

    क्या लोकतंत्र शासकों के हुक्म का नाम है या लोगों के अधिकारों का?

    Rajya Sabha : बीजेपी ने घोषित किये 8 प्रत्याशी, बनाया जातीय समीकरण! 

    Rajya Sabha : बीजेपी ने घोषित किये 8 प्रत्याशी, बनाया जातीय समीकरण! 

    SC ने नहीं दी थी फॉर्म 6 की इजाजात? प्रियंका चतुर्वेदी ने उठाए ‘ECI पर सवाल 

    SC ने नहीं दी थी फॉर्म 6 की इजाजात? प्रियंका चतुर्वेदी ने उठाए ‘ECI पर सवाल