आज़ादी की इस दूसरी लड़ाई में आंदोलित युवाओं के पीछे खड़ा होना पड़ेगा देश को!
सत्ता की राजनीति छोड़ संघर्ष की राजनीति करनी पड़ेगी विपक्ष को
सत्ता के पीछे भागने वाले नहीं बल्कि समस्याओं के पीछे भागने वाले नेताओं को करना होगा समर्थन
चरण सिंह
देश में अब सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई की जरूरत है। इक्का दुक्का नेताओं को छोड़ दिया जाए तो किसी नेता को देश और समाज नहीं बल्कि सत्ता की चिंता है। सभी दल वोटबैंक के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। देश और समाज तो बस इनके दिखावे में रह गई है। जिधर वोटबैंक दिखाई देने लगता है सब दल उधर ही फोकस करने लगते हैं। अब सबको लगने लगा है कि जेन जी सत्ता दिलाने और हटाने में सक्षम हैं तो सभी दलों को जेन जी दिखाई देने लगते हैं। किसी को एससी एसटी, किसी को ओबीसी तो किसी को सामान्य वर्ग का वोट चाहिए। किसान, मजदूर, युवा जैसे इन दलों की डिक्शनरी से खत्म ही होता जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का ही यही हाल है।
जो लोग अभी तक मोदी भक्ति से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। बीजेपी के पैरोकार हैं। वे ठंडे दिमाग से मंथन करें कि इन लोगों ने आख़िरकार देश को कहां लाकर छोड़ दिया है ? शिक्षा, चिकित्सा, रेलवे, रक्षा यहां तक अब इसरो भी लगभग निजी हाथों में दे दिया है। मोदी की राजनीति स्पष्ट है। उन्होंने दो शीर्षस्थ उद्योगपति साध रखे हैं। देश के संसाधन इन दोनों उद्योगपतियों मुकेश अंबानी और गौतम अडानी को लुटाए जा रहे हैं। बदले में ये दोनों पूंजीपति मोदी सरकार के लिए ढाल का काम कर रहे हैं। जो मोदी हर मंच से जय श्रीराम का नारा लगाते थे। अयोध्या में चुनाव हारने के बाद वह जय जगन्नाथ बोलने लगे। राम मंदिर में चंदा चोरी पर मौन साध गए। मतलब इन्हें किसी से कोई मतलब नहीं बस सत्ता चाहिए। मोदी वैसे तो देश के प्रधानमंत्री हैं पर वह अपने को बीजेपी का प्रचार मंत्री हैं। भारत के प्रधानमंत्री के कुर्ते पर किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह क्यों ?
जनता को कैसे बनाया मूर्ख जाए। इस काम में मोदी को महारत हासिल है। हालांकि अब काफी लोगों की आंखें खुल चुकी हैं। खुलकर गलत नीतियों का विरोध कर रहे हैं। देश का 80 प्रतिशत मीडिया अडानी और अंबानी के कब्जे में है। मतलब 80 प्रतिशत मीडिया मोदी सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है। इस मीडिया को हम गोदी मीडिया बोलते हैं। जो देश का सबसे अधिक नुकसान कर रहा है। जमीनी हकीकत को दबाकर सरकार की महिमामंडन करने में लगा है।
गोदी मीडिया में काम वाले तथाकथित पत्रकारों में मैं भांड से ज्यादा नहीं मानता हूं। ये लोग देश और जनता के लिए काम न कर सरकार की ढाल बन रहे हैं। क्योंकि लोगों को जानकारी मीडिया के माध्यम से मिलती है और धारणा भी मीडिया से बनती है। इसलिए जमीनी हकीकत को दबाना गलती नहीं बल्कि अपराध है। इन लोगों का काम बस पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह चालीसा पढ़ना रह गया है। जरा सोचिए। पीएम मोदी ने 2014 में चुनाव जीतने के पहले प्रतिवर्ष दो करोड़ रोजगार देने की बात की थी। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का दावा कर रहे थे। 100 स्मार्ट सिटी और 100 स्मार्ट विलेज बनाने की बात की थी। दागी मुक्त संसद करने की बात की थी। क्या हुआ ढाक के तीन पात।
विदेश से सारा काला धन वापस लाने की बात की जा रही थी। इस काले धन से ही तो प्रत्येक भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए आने की बात की गई थी। कुछ हुआ क्या ? दिन भर झूठ बोलना है और ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स पुलिस के माध्यम से लोगों को डराना, धमकाना और मनमानी करना है। यही राजनीति रह गई है मोदी और अमित शाह की। अंग्रेजी हुकूमत की तरह डंडे के दम पर राज किया जा रहा है। जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है।
इसमें दो राय नहीं कि आम आदमी अब सरकार को ललकार रहा है। अपना हक़ मांग रहा है। स्वाभिमानी और देशभक्त लोग सवाल पूछ रहे हैं पर यदि राहुल गांधी को छोड़ दिया जाए तो एक भी पार्टी विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही है। सबको सत्ता दे दो और ये भी बीजेपी की तरह सरकारी संसाधनों का दोहन करें। जनता के लिए लड़ने का माद्दा बहुत कम नेताओं में बचा है।
शिक्षा सुधार को लेकर दिल्ली जंतर मंतर पर हुए युवाओं के आंदोलन ने देश को एक नई दिशा दी है। अब युवा और छोटे छोटे बच्चे हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं। राजनीति बदल रही है। युवाओं के सामने बीजेपी की आईटी सेल भी कुछ नहीं कर पा रही है। राजनीतिक पार्टियां भले ही विपक्ष की भूमिका न निभा पा रही हों पर देश के जागरूक लोग विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। ये जागरूक लोग विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं।
आज़ादी की दूसरी लड़ाई छिड़ चुकी है। इस लड़ाई में जो टिकेगा वही देश की बागडोर संभालेगा। जाति धर्म की राजनीति अब ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगी। सीजेपी की बारे में कोई कुछ भी बोलता फिरे पर वह सीजेपी ही है जिसने देश में एक जागरूकता का माहौल बनाया है। दिल्ली जंतर मंतर पर हुए युवाओं के आंदोलन ने लोगों के अंदर का डर निकाला है। आवाज दी है। राजनीतिक दल तो अब भी जमीनी लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं। जमीनी मुद्दों पर संघर्ष करने को तैयार नहीं। सब जातीय आंकड़ों के आधार पर सत्ता हथियाना और कायम रहना चाहते हैं। इस समय यदि जमीनी लड़ाई न लगी गई तो देश के हालात बड़े भयावह हो जाएंगे। देश समाज के लिए मोदी और अमित शाह का सत्ता से बेदखल करना बहुत जरूरी हो गया है। सत्ता पर सत्ता के लालची लोग नहीं बल्कि देश और समाज की चिंता करने बैठें।






