डॉ. सुनीलम
जेन ज़ी के जंतर मंतर आंदोलन के परिणामस्वरुप शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग देश भर में जोर पकड़ रही है। जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन जारी है।
देश और दुनिया में जेन ज़ी के आंदोलन पर चर्चा, बहस और शोध जारी है। कॉकरोच जनता पार्टी के नेता कह रहे हैं कि उन्होंने संयुक्त किसान मोर्चा के आंदोलन की प्रेरणा से आंदोलन चलाया तथा जीत हासिल की है।
मोदी जी की नज़र में एवं जन आंदोलन के शोधकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि आज मुलताई के किसानों ने संघर्ष का जो मॉडल 1998 में खड़ा किया था, उसको याद करने की जरूरत है। जो लगातार परिष्कृत होता हुआ पुनः दिल्ली दस्तक दे चुका है। इस दृष्टिकोण से मैं मुलताई किसान आंदोलन के कुछ तथ्य और निष्कर्ष पाठकों से सांझा कर रहा हूं।
बैतूल जिले की मुलताई तहसील में लगातार तीन वर्ष फसलें खराब होने के चलते किसानों में 1997 में आक्रोश चरम पर था। सरकार, विपक्षी दल, तत्कालीन सक्रिय संगठन कोई भी किसानों की मुआवजे की मांग पर सुनवाई करने को तैयार नहीं था।
तब 5 हजार किसानों ने मुलताई तहसील परिसर में 25 दिसंबर 1997 को नष्ट हुई फसलों का 5 हजार की दर से मुआवजा, फसल बीमा, कर्ज माफी, बिजली बिल माफी हेतु किसान संघर्ष समिति का गठन किया। मुलताई तहसील में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। पुलिस प्रशासन ने व्यवधान पैदा करने की नाकाम कोशिश की जिसकी प्रतिक्रिया स्वरुप 75,000 किसानों ने मुलताई से बैतूल तक 50 किलोमीटर की ऐतिहासिक रैली निकाली। सरकार ने हाथ खड़े कर दिए।
जिलाधीश ने 5 हजार की जगह 400 रुपए एकड़ मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा ,जिसे किसानों ने अस्वीकार कर दिया। शांतिपूर्ण तरीके से चल रहे किसान आंदोलन में बैतूल से मुलताई लौटते समय पुलिस ने अनावश्यक व्यवधान पैदा कर कुछ किसान नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलनकारी महिला किसानों ने 12 जनवरी 1998 को तहसील के घेराव का ऐलान किया तथा मैंने ताप्ती किनारे अनिश्चितकालीन अनशन करने की घोषणा की परंतु पुलिस ने षडयंत्रपूर्वक गोली चालन किया, जिसमें 24 किसान शहीद हुए, 150 किसानों को गोली लगी, सरकार ने 250 किसानों पर 67 मुकदमें थोपकर मुझे जेल में डाल दिया। किसान आंदोलन पर गोली चालन के खिलाफ पूरे देश में स्वत: स्फूर्त प्रदर्शन हुए। देश के लगभग सभी प्रमुख किसान संगठन, मानव अधिकार संगठन, जन संगठन,पार्टियों के नेता , किसानों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने मुलताई आए लेकिन किसान संगठनों का कोई संगठित राष्ट्रीय मंच न होने के कारण किसानों के नरसंहार के खिलाफ कोई सतत मजबूत आंदोलन खड़ा नहीं हो सका। तत्कालीन विपक्षी दल भाजपा द्वारा औपचारिक विरोध किया और चुनावी लाभ लेने के लिए शहीद किसानों की लाशों की फोटो बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार में इस्तेमाल की । कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने मुकदमें खत्म करने, शहीद स्तंभ बनाने , मुआवजा देने जैसे कई वायदे किए लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया। किसानों के खिलाफ दमन चलता रहा लेकिन किसानों ने हर 12 तारीख को किसान पंचायत जारी रखी। (अब तक 343 किसान पंचायतें हो चुकी है)। आश्चर्यजनक तौर पर गोलीचालन के बाद भी 2003 में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन 2008 में कांग्रेस का सफाया हो गया। 2017 में कर्ज माफी के मुद्दे पर फिर कांग्रेस की सरकार बनी।
भाजपा 2008 के बाद से 17 साल से मध्य प्रदेश में राज कर रही है।
भाजपा ने सत्ता में आने के बाद रायसेन की बाड़ी बरेली और मंदसौर में गोली चालन कराया। मंदसौर में पुलिस गोली चालन में 6 किसान शहीद हुए, तब देशभर के किसान संगठनों ने अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का गठन कर आंदोलन चलाया जिसके परिणामस्वरूप सरकार को शहीद किसानों के परिजनों को एक- एक करोड़ रुपए मुआवजा राशि देनी पड़ी । किसानों के खिलाफ 100 से ज्यादा एफआईआर दर्ज हुई लेकिन किसान आंदोलन के दबाव के चलते सरकार को सभी एफआईआर रद्द करनी पड़ी। एक भी किसान लम्बे समय तक जेल में बंद नही रहा।
केंद्र सरकार ने कोरोना काल का लाभ उठाकर जब खेती को कार्पोरेट के सुपुर्द करने की मंशा से तीन किसान विरोधी कानून लागू किए तब अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने संयुक्त किसान मोर्चे का गठन किया। 26 नवंबर 2020 के लिए संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली कूच का ऐलान किया। हरियाणा सरकार ने कांटे बिछाकर, गड्ढे खोदकर, दीवारें खड़ी कर किसानों को रोकने की असफल कोशिश की। सरकार ने दिल्ली की सीमाओं पर किसानों को रोक दिया। किसान तीनों किसान विरोधी कानून रद्द कराने, एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्जा मुक्ति की मांग को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले रहे। 26 जनवरी 2021 को सरकार ने किसान आंदोलन को बदनाम करने के उद्देश्य से लाल किले पर हिंसा प्रायोजित की लेकिन संयुक्त किसान मोर्चे के परिपक्व सामुहिक नेतृत्व के चलते उसे सफलता नही मिलीं। संयुक्त किसान मोर्चा के आंदोलन को खालिस्तानी आंदोलन बताने की कोशिश की गई। किसानों ने सोशल मीडिया के माध्यम से गोदी मीडिया का मुकाबला किया। गुरूद्वारों की लंगर व्यवस्था और किसानों की दिल्ली की बॉर्डरों पर तैयार की गई अपनी ठहरने की व्यवस्था के साथ 380 दिन तक आंदोलन चलाया। आंदोलन के दौरान 750 किसान शहीद हुए ।
पूरे कोरोना काल में जब पूरा देश कमरों में कैद था, घर के अंदर मास्क लगाए हुए था उस दौरान लाखों की संख्या में किसान बिना मास्क लगाए सड़कों पर बैठे रहे।
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक देश भर में 42 लाख मौतें हुई लेकिन दिल्ली की बॉर्डरों पर आंदोलन में एक भी किसान की कोरोना से मौत नहीं हुई। अंततः सरकार को झुकना पड़ा। प्रधानमंत्री ने तपस्या में कमी बतलाते हुए तीन किसान विरोधी कानून वापस ले लिए। 9 दिसंबर 2021 को सरकार ने लिखित आश्वासन दिया जिसके आधार पर संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन को स्थगित किया। तब से अब तक संयुक्त किसान मोर्चा एमएसपी की कानूनी गारंटी और कर्जा मुक्ति को लेकर आंदोलन चला रहा है। हाल ही में 28 जुलाई 26 को संयुक्त किसान मोर्चा ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए 10 अगस्त को जेल भरो आंदोलन ,
17 अगस्त को जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन देने तथा 26 नवंबर से देशभर में दिल्ली सहित 100 स्थानों पर पक्का मोर्चा लगाकर व्यापक आंदोलन चलाने की घोषणा की है।
पिछले 5 वर्षों में देश के किसानों और मजदूरों के बीच ऐतिहासिक एकजुटता बनीं। केंद्रीय श्रमिक संगठनों द्वारा चार लेबर कोड रद्द कराने, न्युनतम मजदूरी लागू कराने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जो भी हड़तालें या भारत बंद के कार्यक्रम हुए हैं, उनका संयुक्त किसान मोर्चा ने बढ़-चढ़कर समर्थन किया है। 29 जुलाई 26 को तालकटोरा स्टेडियम में दूसरा संयुक्त अधिवेशन हुआ जिसमें संयुक्त घोषणा पत्र भी जारी किया गया है।
इस बीच मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा 15 मई 2026 को युवा बेरोजगारों को कॉकरोच कहा गया। जिसके बाद अभिजीत दीपके ने अमरीका में मजाक मजाक में कॉकरोच जनता पार्टी के गठन की घोषणा की। जिसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कल्पना से अधिक समर्थन मिला । दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली भाजपा भी पीछे छूट गई। अभिजीत दीपके अमरीका से जब दिल्ली आए तब उन्हें गिरफ्तार करने की हिम्मत सरकार की नहीं पड़ी। जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू हुआ जिसे वामपंथी छात्र संगठन आइसा ने समर्थन किया। सोनम वांगचुक द्वारा आमरण अनशन शुरू किया गया। वामपंथी छात्र संगठनों और सोनम वांगचुक के समर्थन के चलते छात्र-छात्राओं के आंदोलन की विश्वसनीयता बनी। भाजपा और दिल्ली पुलिस ने गोदी मीडिया के समर्थन से आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की लेकिन 20 जुलाई तक पहुंचते पहुंचते जंतर-मंतर देश के छात्र-छात्राओं की आकांक्षाओं, आक्रोश और अभिव्यक्ति का केंद्र बन गया। 20 जुलाई को एक लाख से अधिक युवा जब जंतर -मंतर पर इकट्ठे हुए तब देश और दुनिया को ऐसा दृश्य देखने मिला जो आजादी के पहले और बाद में देखा नहीं गया था। आंदोलन में छात्रों की तुलना में छात्राओं की संख्या भी ज्यादा थी। जय भीम, जय संविधान और शहीदे आजम भगत सिंह के नारे तो लग ही रहे थे लेकिन आंदोलन की शुरुआत शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर हुई थी, वह नारा पीछे छूट गया था। अधिकतर नारे नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लगाए जा रहे थे। इस स्थिति को देखकर सरकार सकते में आ गई और घबरा गई। संसद के भीतर विपक्ष अत्यधिक आक्रामक हो गया । जंतर-मंतर के आंदोलन की आग विपक्षी सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दरवाजे तक पहुंचा दी। दिल्ली पुलिस ने छात्र-छात्राओं से संवाद करने की बजाय, लाठी चार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी गई , पैलेट गन का इस्तेमाल किया, चुन चुन कर लड़कियों को वीभत्स तरीके से पीटा गया। सैकड़ों छात्र-छात्राएं अस्पताल में भर्ती हुए। पुलिस ने आंदोलनकारियों को जंतर-मंतर से हटा दिया लेकिन कुछ ही घंटे में आंदोलनकारियों ने जंतर- मंतर पर फिर कब्जा जमा लिया।
जंतर- मंतर पर अनिश्चितकालीन धरने, सोनम वांगचुक और छात्र-छात्राओं के अनशन से ज्यादा 20 तारीख को जंतर-मंतर पर उमड़े जन सैलाब तथा 24 जुलाई को देशभर में पुलिस दमन के खिलाफ हुए आंदोलन के दबाव से तथा पंजाब के किसानों द्वारा ट्रैक्टर ट्राली से दिल्ली कूच करने की घोषणा से सरकार को झुकना पड़ा।
23 दिन के अनशन के बाद अनशनकारियों ने अनशन समाप्त कर दिया। लेकिन
धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। बिहार में पुलिस बर्बरता के खिलाफ प्रदर्शनों पर पुलिस दमन और नेताओं की गिरफ्तारी सीवान में ए के 47 के इस्तेमाल के परिणामस्वरूप व्यापक प्रतिक्रिया ने बिहार सरकार को मुकदमे रद्द करने की घोषणा की।
मैंने जिन आंदोलनों का जिक्र किया है उन सबका विश्लेषण करने से यह साफ हो जाता है कि एक मुद्दे को लेकर एक स्थान पर खुंटा गाड़कर जब सत्य ,अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से जन आंदोलन चलाया जाता है तथा जब वह आंदोलन आम लोगों को भावनात्मक स्तर पर जोड़ने में कामयाब हो जाता है, तब नतीजे निकलते हैं।
एक मुद्दा ,सामूहिक नेतृत्व , कार्यकर्ताओं की कुर्बानी की तैयारी , समाज से पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर प्राप्त आर्थिक संसाधन ,
अहिंसा से प्रतिबद्ध सतत सत्याग्रह अपना प्रचार तंत्र इस कामयाबी का आधार होते हैं।
1942, 1974, अन्ना आंदोलन, सीएए -एनआरसी के खिलाफ महिला आंदोलन, तीन किसान विरोधी कानून के खिलाफ किसानों का आंदोलन और हाल ही में जंतरमंतर में हुए छात्र-छात्राओं के आंदोलन में देखा गया है। जौहर विश्वविद्यालय के ध्वस्तीकरण
के खिलाफ विद्यार्थियों के आंदोलन को सफलता मिली है।
हर जन आंदोलन नए नेतृत्व को सामने लाता है ।अभिजीत दीपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेता के तौर पर तथा नेहा बोरा और मनीष कुमार वाम छात्र नेता के चेहरे के तौर पर अपना स्थान बनाया है ।
देश में अब गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन जारी है।
इथेनॉल के इस्तेमाल के खिलाफ आंदोलन पनप रहा है । जेन जी अल्फ़ा यानी स्कूली बच्चे भी अब मैदान में हैं।
छात्र आंदोलन ने युवाओं के बीच सरकार का डर समाप्त कर दिया है । अब संयुक्त किसान मोर्चा ने एमएसपी की कानूनी गारंटी, संपूर्ण कर्जा मुक्ति, भारत-अमरीका ट्रेड डील रद्द करने को लेकर 10 अगस्त को जेल भरो आंदोलन की घोषणा की है । जिसका समर्थन केंद्रीय श्रमिक संगठनों ने किया है।
यदि देश में लाखों किसान और मजदूर जेल भरने के लिए आगे आते हैं तथा पूरे देश भर में आम नागरिकों का डर जेल से खत्म हो जाता है तो सरकार के विभाजनकारी कारपोरेट एजेंडा पर अंकुश लगेगा, सत्ता परिवर्तन भी संभव होगा।
वर्तमान स्थिति देश में तानाशाह हुक्मरानों के बावजूद लोकतंत्र की गहरी जड़ों की द्योतक है। वर्तमान निराशा के दौर में आशा की किरण है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए मुलतापी, मंदसौर, सीएए -एनआरसी, संयुक्त किसान मोर्चा और छात्र आंदोलन प्रेरणा और ऊर्जा देते रहेंगे।
डॉ सुनीलम ✍🏻
राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान संघर्ष समिति






