दलित प्रश्न पर ‌सोशलिस्ट सोच एवं संघर्ष!

प्रोफेसर राजकुमार जैन

 

हिंदुस्तान के सोशलिस्टों के प्रेरणा स्रोत महात्मा गांधी, आचार्य नरेंद्रदेव, जयप्रकाश नारायण, युसूफ मेहर अली, डॉ राममनोहर लोहिया, मधु लिमए, राजनारायण‌ इत्यादि रहे हैं। सोशलिस्टों ने ‌ जाति के आधार पर‌ होने वाले ‌ जुल्म ‌ ज्यादती, गैर बराबरी के खिलाफ ‌ लगातार संघर्ष किए हैं। इसी के तहत सोशलिस्ट पार्टी ने‌ विशेष अवसर के सिद्धांत‌ को तरजीह दी है। इसी विमर्श पर प्रस्तुत है,एक रपट।

 

 डॉ. अंबेडकर का सोशलिस्टों से तालमेल!

 

आजकल मुल्क की सियासत में बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर को लेकर रस्साकशी जारी है, तथा हर पार्टी, नेता, समूह, संगठन अपने को डॉक्टर अंबेडकर का सबसे बड़ा पैरोंकार सिद्ध करने पर जोर आजमाइश कर रहे हैं। परंतु डॉक्टर अंबेडकर सोशलिस्टों कोअपने सबसे नजदीक मानकर उनके साथ चुनावी समझौता कर चुनाव लड़े, तथा बाद में सोशलिस्टों के समर्थन से वे राज्यसभा में भी चुने गए। आजादी के बाद 1952 में भारत के प्रथम लोकसभा चुनाव मैं कांग्रेस के विरुद्ध संयुक्त रूप से लड़ने के लिए महाराष्ट्र किसान मजदूर दल और शेड्यूल कास्ट फेडरेशन इन दो दलों के नेताओं ने महाराष्ट्र में एक संयुक्त मोर्चा बनाने के बारे में कुछ महीनो से विचार विमर्श शुरू किया। डॉ अंबेडकर को दिल्ली में इसकी सूचना दी गई।1951 के प्रथम सप्ताह में नई दिल्ली में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की कार्यकारिणी समिति की बैठक में चुनाव के संबंध में विचार विमर्श हुआ शेड्यूल कास्ट फेडरेशन ने निर्णय लिया कि वे कांग्रेस, हिंदू महासभा या कम्युनिस्टों के साथ बिल्कुल सहयोग नहीं करेंगे, परंतु सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल होगा। 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में मुंबई नॉर्थ सेंट्रल संसदीय क्षेत्र से शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की ओर से डॉक्टर अंबेडकर तथा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता संयुक्त उम्मीदवार बने। 1952 के चुनाव में संवैधानिक रूप से व्यवस्था थी कि एक लोकसभा क्षेत्र से दो प्रतिनिधियों का चुनाव होता था, जिसमें एक पद सुरक्षित तथा दूसरा पद अनारक्षित था। एक ही बैलट पेपर पर दो नाम लिखे होते थे। 18 नवंबर को अंबेडकर मुंबई रहने के लिए आ गए बोरीबंदर मुंबई के स्टेशन पर शेड्यूल कास्ट फेडरेशन और सोशलिस्ट पार्टी ने उनका भव्य स्वागत किया। दूसरे दिन सर कावस जी जहांगीर ऑडिटोरियम में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन और सोशलिस्ट पार्टी की ओर से एक संयुक्त सभा हुई। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुंबई में कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में बोलते हुए सोशलिस्ट पार्टी शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की एकता को अपवित्र मानकर उसकी निंदा की। डॉक्टर अंबेडकर और अशोक मेहता दोनों हार गए। अंबेडकर को 123576 तथा अशोक मेहता को139741 वोट मिले, लगभग 25000 वोट से अंबेडकर चुनाव हार गए। चुनाव में हार जाने के बाद दिल्ली में डॉक्टर अंबेडकर ने कहा, हार के धक्के का मुझ पर कोई खास असर नहीं हुआ। उनका कहना था की कम्युनिस्ट नेता डांगे के षड्यंत्र के कारण उनकी पराजय हुई। अपनी पार्टी के एक नेता राज,घो, भंडारी को चुनाव के परिणाम के बारे में लिखते हुए उन्होंने कहा, चुनाव एक तरह का जुआ है —-फिर भी हम सफलता तक पहुंचे थे, हमें धीरज नहीं छोड़ना चाहिए,हमें हमारे लोगों की उम्मीद पस्त नहीं होने देने चाहिए। समाजवादियों पर उंगली उठाने के लिए कोई जगह नहीं है। कुछ दिनों बाद अंबेडकर और अशोक मेहता ने मुंबई में हुए लोकसभा चुनाव रद्द किया जाए इस तरह की एक याचिका चुनाव न्याय समिति के समझ पेश की, उसमें कहा गया था कि दोहरी मतदाता संघ में एक ही इच्छुक उम्मीदवार को दो वोट देने के बारे में प्रचार होने से उस चुनाव में भ्रष्टाचार हुआ इसलिए चुनाव रद्द किया जाए ।उस याचिका के खिलाफ कम्युनिस्ट उम्मीदवार एस ए डांगे तथा जीते हुए कांग्रेसी उम्मीदवार नारायण राव काजोल कर उसमें प्रतिवादी बन गए। अंबेडकर अशोक मेहता की याचिका खारिज कर दी गई।
मार्च 1952 में मुंबई विधान परिषद की ओर से 17 सीटों के लिए राज्यसभा सदस्यों का चुनाव होने वाला था, डॉ अंबेडकर राज्यसभा के उम्मीदवार थे सोशलिस्ट पार्टी तथा शेतकरी पार्टी के समर्थन से वे राज्यसभा के सदस्य लिए गए। 1954 में भंडारा महाराष्ट्र संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव था चुनाव में सुरक्षित सीट के लिए शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की ओर से डॉ आंबेडकर तथा जनरल सीट पर सोशलिस्ट अशोक मेहता दोबारा संयुक्त उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़े। चुनाव में अंबेडकर को132483 वोट मिले तथा केवल 8183 वोटो से डॉ आंबेडकर कांग्रेस उम्मीदवार भाअराव बोरकर से चुनाव हार गए, परंतु अशोक मेहता चुनाव जीत गए।

सोशलिस्ट नेता राजनारायण द्वारा दलितों ‌ के सम्मान और हक के लिए ‌ किए गए संघर्ष!
कभी-कभी इतिहास के पन्नों को पढ़ने, पलटने से हताशा, निराशा कायरता से लड़ने की और कुछ करने की ताकत मिलती है। इसलिए उन बातों को दोहराते रहना चाहिए जिससे आपको प्रेरणा मिलती है। आजादी बाद के सियासी इतिहास में राजनारायण को जानना जरूरी है। केवल दो ही उदाहरणों से उनकी शख्सियत को समझा जा सकता है।
आज दलित, हरिजन आंदोलन के संघर्षों का हिमायती, पैरोंकार दिखाने में कुछ दलित तथा खासतौर से गैर दलित अपनी कलम और मुंह जबानी बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर के नाम की आड़ में हमलावर दिखावा करते हुए गांधी तक को दलित विरोधी फतवा बांट रहे हैं। निजी जीवन में ऐसे तबकों ने कितनी लड़ाई लड़ी है, खतरे उठायें हैं उसका तो वही जाने। परंतु आज हम बात कर रहे हैं गांधी के अनुयायी, डॉ राममनोहर लोहिया के शागिर्द सोशलिस्ट नेता राजनारायण की। बनारस राजघराने से ताल्लुक रखने वाले एक बड़े भूमिहार, भूमिपति जमींदार परिवार मे जन्म लेने वाले राजनारायण ने आज से 71 साल पहले 1 अक्टूबर 1955 में बनारस के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश के आंदोलन की शुरुआत करते समय कहा अगर हरिजनों को मंदिर मैं जाने से रोका जाता है तो और कोई भी नहीं जा सकेगा। मंदिर प्रवेश करते वक्त वहां के पंडे, पुजारी, पुलिस राजनारायण जी पर झपट पड़े ,राजनारायण जी की दाढ़ी को उखाड़ा गया, बुरी तरह घायल राजनारायण ने 48 दिन तक यह आंदोलन चलाया, तब जाकर कहीं दलितों का मंदिर में प्रवेश तथा पूजा का अधिकार मिल पाया। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसका समर्थन किया।सोशलिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी ने उस आंदोलन में शिरकत करने वाले नागरिकों, खास तौर से राजनारायण जी तथा समाजवादी कार्यकर्ताओं को बधाई देते हुए कहा कि जिन्होंने मार खाकर या जेल जाकर अस्पृश्यता निवारण का यह कदम उठाने के लिए सरकार को प्रेरणा दी तथा साथ ही हरिजनों से भी यह आशा व्यक्त की कि उनके के बीच के उच्च -नीच के भेदभावो को दूर करके तेजी से आगे बढ़े।
उस समय राजनारायण जी उत्तर प्रदेश विधानसभा के बहुत ही चर्चित लोकप्रिय विधायक थे परंतु इसी घटना के कारण वह अगला चुनाव हार गए।
4 दिसंबर 1952 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में उन्होंने कहां कि अभी-अभी हमारे राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद गए हुए थे। गवर्नर महोदय और गृहमंत्री महोदय के प्रयास से वहां पर 200 ब्राह्मणों को बुलवाया गया और राष्ट्रपति ने उनके चरण धोकर चरणामृत लिया और दक्षिणा देकर ब्राह्मणों को विदा किया गया क्या यह वर्ण और वर्ग विहीन समाज की रचना का द्योतक है, या यथार्थ स्थितिवाद को कायम रखने का?
5 मार्च 1954 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में राजनारायण जी ने कहा “समान प्रसव: कहां के श्लोक हैं ,इसके क्या मानी है, समान ढंग से जो किया हो समान ढंग से जो पैदा हो वह एक जाति के हैं । मानव जाति में चाह ब्राह्मण हो या हरिजन हो, एक की स्त्री हो या एक का मर्द हो तो उन दोनों से मनुष्य पैदा होगा, एक ढंग से पैदा होने की प्रणाली इस समाज में है वह एक जाति की है।” ——–जात-पात में बंटा हुआ यह जर्जर समाज जब तक पूर्ण रूप से इस विभेद को मिटाने की भावना के अंतर्गत शिक्षित नहीं किया जाता तब तक कोई काम नहीं हो सकता। मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं की हिंदुस्तान में वर्ग भेद भी है और वर्ण भेद भी है और जो सोशलिस्ट हैं वह वर्ण भेद भी मिटाने में विश्वास रखते हैं।
राजनारायण जी ने अपनी पुश्तैनी जमीन उनके खेतों के हरिजन भूमिहीन मजदूरों में बांट दी।
सोशलिस्ट पार्टी की ‌ शुरू से नीति रही है कि जो तपके‌ सामाजिक रूप से‌ पिछड़ गए हैं‌, उन्हें विशेष अवसर के सिद्धांत ‌ के तहत ‌ विशेष अवसर दिया जाए। इसके लिए सोशलिस्ट पार्टी का नारा था।
सोशलिस्टों ने बांधी गांठ,
पिछड़े पांवे सौ में साठ।
सोशलिस्ट पार्टी ने इस सिद्धांत को केवल नारे तक ही सीमित नहीं रखा व्यावहारिक रूप में ‌ भी सदैव अमली जामा पहनाया। जितनी भी सरकारें बनी उसमें 60 सेकंडे के‌ सिद्धांत को अमली जामा पहनाया।

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