ब्रसेल्स में यूरोपियन यूनियन के पॉलिसी-मेकर्स को एड्रेस करते हुए UNFCCC के एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी साइमन स्टील ने कहा कि ईरान कॉन्फ्लिक्ट ने दिखा दिया है कि जियो-पॉलिटिकल टेंशन का सीधा असर आम लोगों की एनर्जी बिल्स पर पड़ता है. सिर्फ दो हफ्तों में यूरोप में गैस प्राइसेज़ करीब 50% तक बढ़ गई हैं, जिससे घरों और इंडस्ट्री दोनों पर प्रेशर बढ़ गया है।
स्टील के मुताबिक, जब देश अपनी एनर्जी नीड्स के लिए इम्पोर्ट्स पर डिपेंड हो जाते हैं, तो वे ग्लोबल पॉलिटिकल शॉक्स के “मरसी” पर आ जाते हैं। यूरोप की सिचुएशन खासतौर पर सेंसिटिव है, क्योंकि यहां ऑयल और गैस का बड़ा हिस्सा बाहर से आता है। इसका मतलब है कि इंटरनेशनल कॉन्फ्लिक्ट का असर सीधे लोकल इकोनॉमी पर दिखने लगता है।
एनर्जी प्राइस स्पाइक को कंट्रोल करने के लिए हो रहा काम
एनर्जी प्राइस स्पाइक को कंट्रोल करने के लिए यूरोपियन लीडर्स अब इमरजेंसी स्टेप्स पर काम कर रहे हैं, ताकि 2022 जैसा क्राइसिस दोबारा न हो। उस वक्त रूस ने गैस सप्लाई कम कर दी थी, जिससे प्राइसेज़ रिकॉर्ड लेवल तक पहुंच गई थीं। अब कुछ देश शॉर्ट-टर्म रिलीफ के लिए क्लाइमेट पॉलिसीज़ में ढील देने की मांग कर रहे हैं।
इस पर UN क्लाइमेट चीफ ने सख्त रिएक्शन देते हुए कहा कि क्लाइमेट गोल्स को वीक करना “पूरी तरह मिसगाइडेड” कदम होगा। उनका कहना है कि विंड और सोलर जैसे रिन्यूएबल सोर्सेज लॉन्ग-टर्म में एनर्जी को सस्ता, स्टेबल और सिक्योर बना सकते हैं. साथ ही क्लीन-टेक सेक्टर में नई जॉब्स भी क्रिएट होंगी।
क्यों बार-बार दुनिया को एनर्जी क्राइसिस का करना पड़ सकता है सामना?
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर फॉसिल फ्यूल इम्पोर्ट्स पर डिपेंडेंस जारी रही, तो यूरोप और दुनिया बार-बार एनर्जी क्राइसिस का सामना करती रहेगी। इसके उलट रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ तेज शिफ्ट देशों को जियो-पॉलिटिकल अनसर्टेनिटी से काफी हद तक फ्री कर सकती है, क्योंकि सूरज की रोशनी और हवा किसी पॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट पर डिपेंड नहीं करती।
ईरान वॉर से पैदा हुआ यह एनर्जी शॉक अब ग्लोबल डिबेट को नए मोड़ पर ले गया है, जहां फोकस सिर्फ क्लाइमेट चेंज नहीं, बल्कि फ्यूचर इकोनॉमिक सिक्योरिटी और एनर्जी इंडिपेंडेंस पर भी शिफ्ट हो रहा है।






