रोहतास सिंह चौहान
भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी हैं या डोनाल्ड ट्रम्प? डोनाल्ड ट्रम्प कैसे तय कर सकते हैं कि भारत कहाँ से तेल ख़रीदेगा? पहले दबाव बनाकर भारत का ईरान से तेल व्यापार बंद कराया और अब रूस से तेल ख़रीदने पर पाबंदी लगाई जा रही है; और इससे बुरी बात ये है कि भारत सरकार अमेरिका की हर माँग चुपचाप मान ले रही है।
हिन्दू एकता की दुहाई देकर मोदी सरकार सत्ता के शीर्ष पर बैठी थी लेकिन आज देश में ugc काला कानून सवर्णों पर थोप कर हिन्दू को हिन्दू से लड़ाकर क्या सिद्ध करना चाहते हैं,
लेकिन इससे भी ज़्यादा बुरी बात ये है कि ईरान और रूस दोनों भारत के अच्छे मित्र और कठिन समय के साथी रहे हैं. इनसे व्यापार बंद होने का मतलब है भारत का और कमजोर हो जाना।
ये USSR यानी आज का रूस ही था जिसने पाकिस्तान से युद्ध के समय खुलकर भारत का साथ दिया था. उस दौर में अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा था। लेकिन USSR यानी रूस की मदद से ही हम अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब दे पाये थे…और आज भारत की सरकार अमेरिका के कहने पर रूस से तेल ख़रीदना बंद कर रही है…कुछ समझ पा रहे हैं आप?
क्या ये साधारण बात सरकार नहीं समझ रही कि अमेरिका भारत को अलग-थलग कर देना चाहता है? फिर भी भारत की सरकार अमेरिका की हर माँग क्यों मान ले रही है? आख़िर क्या मजबूरी है? ये वही अमेरिका है जिसने हिंदुस्तानियों को जंजीरों में बांधकर बेइज्जत किया और वापस भेजा। इसी अमेरिका ने हम पर भारी भरकम टैरिफ़ लगाये…
…और आज जब पूरी भाजपा ट्रेड डील को मोदी जी का मास्टरस्ट्रोक बता रही है; सच्चाई ये है कि 2014 में लगने वाला 2.5% टैरिफ़ आज टैरिफ़ में कटौती के बाद भी 18% हो गया है. ये अमेरिकी टैरिफ़ है या भारत की महंगाई??
भारत किससे व्यापार करेगा, किससे तेल ख़रीदेगा, किससे हथियार ख़रीदेगा, अपने प्रोडक्ट किसे बेचेगा, ये सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत तय कर सकता है…कोई और नहीं…और अगर भारत ये ख़ुद तय नहीं कर रहा है तो मेरा यकीन कीजिए, भारत की बागडोर ग़लत हाथों में है.
गुलाम भारत में ब्रिटेन, मैनचेस्टर के कपड़ों को बढ़ावा देने के लिए भारत के कपड़ों पर भारी-भरकम टैक्स लगाया गया था जिसने भारतीय बुनकरों की कमर तोड़ दी थी। ढाका का मलमल उद्योग पूरी दुनिया के मलमल का बेताज बादशाह हुआ करता था, वहाँ के बुनकरों के अँगूठे कटवा दिए गए, लेकिन लंदन के कपड़ों को भारत में लगभग बिना टैक्स के भेजा गया, इन विदेशी कपड़ों ने भारत के कपड़ा उद्योग को तहस-नहस कर दिया था और भारतीय उत्पादक, निर्यातक, कारीगर और मजदूर बर्बाद हो गए थे। तब भारत का शासन ब्रिटेन के ही कर्मचारी चला रहे थे, तो ऐसा होना स्वाभाविक था…लेकिन आज के भारत की क्या मजबूरी है?
भारतीयों के ख़िलाफ़ रची गई इस साजिश को नाकाम करने के लिए ही महात्मा गांधी को विदेशी कपड़ों जी होली जलानी पड़ी थी और स्वदेशी अपनाओ का नारा देना पड़ा था। अगर हमने अपने इतिहास से कुछ भी सीखा होता तो आज अमेरिका ब्रिटेन की तरह भारत के व्यापारिक फैसले नहीं ले रहा होता. लेकिन हमारा दुर्भाग्य देखिए कि हमने अपने इतिहास से गांधी और नेहरू जी की आलोचना के अलावा और कुछ भी नहीं सीखा।
क्या आज के भाजपा नेता और केंद्र सरकार में मंत्री बने बैठे लोग, जो सिर्फ और सिर्फ़ विदेशी गाड़ियाँ, चश्मे, कपड़े, और हर एक चीज विदेशी ही इस्तेमाल करते हैं, क्या वो इस देश को अमेरिकी दादागिरी से निजात दिलवा पाएंगे? सच ये है कि उनमें ऐसा करने की न इच्छा है, न क्षमता। देश की सरकार अमेरिका के आगे बेबस और लाचार दिख रही है; जिसे नकारा नहीं जा सकता…लेकिन हर बार की तरह इस बार भी देश की बर्बादी की और बढ़े इस बड़े कदम को भी अंधभक्त मास्टरस्ट्रोक बतायेंगे। गोदी मीडिया ज़्यादा टैक्स देने के फ़ायदे बताएगा, अपने देश के उत्पादों के एक्सपोर्ट न होने की वजहें बताएगा और इस देश की लुटी-पिटी जनता के सिर पर इसका ठीकरा फोड़ दिया जाएगा। देश में शायद ही कुछ ऐसा बचा है जो खतरे में नहीं है और अब इस देश का भविष्य असली देशभक्तों के हाथों में है।
देशभक्तों की पहचान अब और ज़्यादा आसान हो गई है
इस वक्त जो लोग भी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं कि भारत के फ़ैसले अमेरिकी दबाव में क्यों हो रहे हैं? वो देशभक्त हैं ? देशद्रोहियों और दलालों को पहचानना भी अब पहले से आसान हो गया है. सरकार से सवाल पूछने वालों के ख़िलाफ़ बोलने वाले ही इस देश और लोकतंत्र के गद्दार हैं. इन्हें पहचान लीजिए।






