क्यों न चुनाव आयोग के खिलाफ हत्या में दर्ज किए जाएं बीएलओ की मौत के मामले!

चरण सिंह

क्या देश में किसी की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है ? क्या चुनाव आयोग कुछ भी करेगा ? उत्तर प्रदेश में चुनाव 2027 में है और चुनाव आयोग बीएलओ से 4 दिसंबर तक एसआईआर का काम पूरा करने के दबाव बना रहा है। चुनाव आयोग ने एल्टीमेटम दे दिया है कि समय सीमा में ही काम पूरा करना होगा। दूसरे राज्यों में भी यही हाल है। जानकारी मिल रही है कि देशभर में 25 बीएलओ की इस दबाव में मौत हो चुकी है। कितने बीएलओ अपने घर नहीं जा पा रहे हैं। कितने बीएलओ दबाव में रोते देखे जा रहे हैं। उनको तरह तरह की समस्याएं एसआईआर में आ रही हैं।ऐसे में प्रश्न उठता है कि जो काम सालों का वह महीनों में कैसे पुरा हो सकता है ? विपक्ष का रवैया भी बड़ा दिलचस्प है। उसे बीएलओ की मौत की चिंता कम है अपने वोटबैंक में से वोट कटने की चिंता ज्यादा है। मतलब विपक्ष को भी सत्ता की चिंता है। बस किसी तरह से इनको भी सत्ता मिल जाए। विपक्ष की समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब तक लोगों से जुड़े मुद्दे नहीं उठाएंगे तब तक आम आदमी को जोड़ा नहीं जा सकता है। क्या उत्तर प्रदेश में सभी जनप्रतिनिधियों के फॉर्म जमा हो चुके हैं। क्या इन लोगों के फॉर्म में सभी कुछ ठीक है ? विपक्ष को सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों के फॉर्म दिखाने की मांग की जानी चाहिए। खुद मुख्य चुनाव आयुक्त का फॉर्म देखा जाए। ऐसे में प्रश्न यह भी है कि क्या विपक्ष में बैठे सभी जनप्रतिनिधियों ने अपने फॉर्म भरकर दे दिए हैं ?आखिर बीएलओ की मौत और उनकी समस्याओं को लेकर विपक्ष मुद्दा क्यों नहीं बनाता ? क्यों नहीं सड़कों पर उतरता ? क्यों न बीएलओ की मौत का जिम्मेदार चुनाव आयोग को बताकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हत्या के केस दर्ज कराए जाएं ? पर विपक्ष यह सब कुछ नहीं करेगा। क्योंकि इससे उसकी सरकार नहीं बन रही है। विपक्ष में बैठे दल दल तो वह सब कुछ करेंगे जिससे कि उनकी सरकार बनने में मदद मिले। निश्चित रूप से सरकार में बैठे लोग मनमानी कर रहे हैं पर विपक्ष में बैठे नेता भी तो जमीनी मुद्दों पर काम नहीं कर पा गए हैं। चाहे रोजगार का मुद्दा और महंगाई का मुद्दा हो या बीएलओ की मौत का मुद्दा। इन मुद्दों पर विपक्ष कमजोर पड़ जाता है। जनहित में एकजुट नहीं होंगे। हां सत्ता से जुड़ा मुद्दा हो तो एक दूसरे के सुर में सुर जरूर मिला देंगे। हां वोटबैंक से जुड़ा मुद्दा हो या फिर पार्टी से जुड़ा हो तो ये लोग जरूर सड़कों पर उतर जाते हैं। विपक्ष के जमीनी मुद्दे न उठा पाने का फायदा ही सरकार उठा रही है।  दरअसल बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर फॉर्म भरवा रहे हैं ताकि मतदाता सूची सटीक हो सके। चुनाव आयोग ने अल्टीमेटम दे दिया है कि 4 दिसम्बर तक यह काम करवा लेना है।  BLOs पर काम का भारी दबाव है, जिससे वे घर-परिवार छोड़कर रात 3 बजे तक काम कर रहे हैं।  बीएलओ का कहना है कि पढ़े-लिखे लोग भी फॉर्म में गलतियां कर देते हैं। बीएलओ बेचारे इधर चुनाव से डांट खा रहे हैं उधर संबंधित लोग भी बीएलओ को डांट देते हैं। जानकारी मिल रही है कि बीएलओ का दिन भर घर-घर घूमना, रात में घर पर 1-2 बजे तक एंट्री करना पड़ रहा है। कुछ BLOs रात 3 बजे तक जागकर काम कर रहे हैं। घर-परिवार छोड़कर पूरी तरह ड्यूटी में लगे रहना। यह समस्या सिर्फ UP तक सीमित नहीं। पूरे देश में SIR के दौरान BLOs पर भारी बोझ है। 22 दिनों में 7 राज्यों (UP, MP, WB आदि) में 25 BLOs की मौत हो चुकी है। UP में एक BLO की शादी से ठीक पहले मौत हो गई।

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