मायावती और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) वाकई 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति बना रही हैं, जिसमें मुस्लिम वोटरों पर विशेष फोकस है। यह प्रयास समाजवादी पार्टी (एसपी) की ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति का जवाब देने के लिए किया जा रहा है।
मुख्य रणनीति के बिंदु:
स्लिम वोटरों पर बढ़ता जोर: बीएसपी ने पार्टी संगठन में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। लखनऊ की आठ विधानसभा सीटों पर दो-दो कोऑर्डिनेटर नियुक्त किए गए, जिनमें से लगभग 50% मुस्लिम हैं। हर सीट पर कम से कम एक मुस्लिम कोऑर्डिनेटर है। इसके अलावा, हर जिले में ‘मुस्लिम ब्रदरहुड कमेटियां’ गठित करने के निर्देश दिए गए हैं, जो सितंबर 2024 से शुरू हुए। पार्टी मुस्लिम बुद्धिजीवियों, मौलवियों और विद्वानों से संपर्क बढ़ा रही है। राज्य प्रमुख विश्वनाथ पाल के अनुसार, मुस्लिम सदस्यता में उछाल आया है और एसपी-बीजेपी से कई मुस्लिम नेता बीएसपी में शामिल हो रहे हैं, खासकर बरेली और श्रावस्ती जैसे जिलों में।
राष्ट्रीय कार्यकारी बैठक 19 अक्टूबर लखनऊ में हुई, इस बैठक में 2027 चुनावों की रूपरेखा तय की गई। बीएसपी का लक्ष्य दलित वोट (20%) को मजबूत रखते हुए अतिशय पिछड़ी जातियों से 10% और ब्राह्मण, मुस्लिम व राजपूत से 5% वोट हासिल करना है। अकाश आनंद को यूपी में आक्रामक कैंपेनिंग का जिम्मा दिया गया। जनवरी 2026 तक सभी बूथ और ब्रदरहुड कमेटियां गठित करनी हैं, और मायावती जन्मदिन (15 जनवरी) के बाद बूथ स्तर पर निरीक्षण करेंगी।
गठबंधन से दूरी: 9 अक्टूबर को कांशीराम स्मृति दिवस पर लखनऊ में हुई रैली में मायावती ने साफ कहा कि बीएसपी 2027 में अकेले लड़ेगी। उन्होंने एसपी, बीजेपी और कांग्रेस पर निशाना साधा, लेकिन गठबंधनों को नुकसानदायक बताया।
पृष्ठभूमि और चुनौतियां:
बीएसपी की परंपरागत ‘दलित-मुस्लिम’ गठजोड़ वाली रणनीति 2017 और 2022 में कमजोर पड़ी, जहां मुस्लिम वोट एसपी की ओर चले गए। अब मायावती इसे पुनर्जीवित करने के साथ-साथ ओबीसी और अन्य समुदायों को जोड़ रही हैं। हालांकि, मार्च 2025 की एक रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि ‘एमबीसी+दलित’ फोकस ज्यादा फायदेमंद हो सकता है, लेकिन हालिया कदम मुस्लिम आउटरीच पर केंद्रित हैं।
आज (28 अक्टूबर 2025) ही मायावती ने एक विवादास्पद बयान (‘मुस्लिम लड़की लाओ, नौकरी पाओ’) की निंदा की, जो मुस्लिम समुदाय के प्रति उनकी संवेदनशीलता दिखाता है। यह रणनीति बीएसपी को फिर से मजबूत बनाने का प्रयास है, लेकिन सफलता चुनावी मैदान पर ही सिद्ध होगी।








