संघ के 100 साल : डॉ. हेडगेवार का सरसंघचालक पद से इस्तीफा और ‘भरत मिलाप’ की अनसुनी कहानी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने के इस ऐतिहासिक अवसर पर, संगठन की शुरुआती दौर की एक ऐसी घटना सामने आती है जो त्याग, राष्ट्रभक्ति और संगठनात्मक अनुशासन का प्रतीक बनी। यह कहानी 1930 के उस दौर की है जब संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के लिए सरसंघचालक के पद से इस्तीफा दे दिया, और उनकी रिहाई के बाद जो भावुक पुनर्मिलन हुआ, उसे ‘भरत मिलाप’ कहा गया। यह घटना न केवल संघ की नीतियों को आकार देने वाली थी, बल्कि स्वयंसेवकों के बीच गहरा भावनात्मक जुड़ाव भी पैदा करती है। आइए, इसकी पूरी कहानी को विस्तार से समझें।

 

पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता आंदोलन और संघ की नीति

 

 

1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में स्थापित आरएसएस के संस्थापक डॉ. हेडगेवार खुद क्रांतिकारी थे। वे अनुशीलन समिति जैसे संगठनों से जुड़े रहे, लेकिन लंबी आजादी की लड़ाई की सोच के कारण उन्होंने अलग रास्ता चुना। 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च के ऐलान ने पूरे देश को हिला दिया। संघ के स्वयंसेवक उत्साहित हो उठे, लेकिन डॉ. हेडगेवार ने स्पष्ट नीति अपनाई: संघ संगठन के रूप में किसी आंदोलन में नाम से शामिल नहीं होगा, लेकिन स्वयंसेवक व्यक्तिगत स्तर पर भाग ले सकते हैं। उन्होंने सभी शाखाओं में सर्कुलर जारी किया कि वैचारिक समर्थन तो मिलेगा, लेकिन अनुमति लेकर ही जाना। सैकड़ों स्वयंसेवकों को उन्होंने जेल जाने की छूट दी, लेकिन कुछ को चल रहे अधिकारी प्रशिक्षण शिविर (ओटीसी) के कारण रोका। डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों से पूछते, “दो साल जेल के लिए तैयार हो, तो इतना समय संघ को दो तो संगठन कितनी तेजी से बढ़ेगा?”
इस दौरान विदर्भ के प्रमुख स्वयंसेवक अप्पा जी जोशी ने भी भाग लेने की अनुमति मांगी। डॉ. हेडगेवार ने उन्हें ओटीसी के बाद बात करने को कहा और अंततः खुद आंदोलन में शामिल होने का फैसला किया। लेकिन दांडी मार्च की बजाय, उन्होंने मध्य प्रांत (अब महाराष्ट्र) के ‘जंगल सत्याग्रह’ को चुना।

 

जंगल सत्याग्रह: कानून तोड़ने का साहस

 

1917 में ब्रिटिश सरकार ने 1618 वर्ग मील के जंगलों को प्रतिबंधित घोषित कर दिया था, जिससे हजारों ग्रामीण चारे, लकड़ी आदि के लिए प्रभावित हुए। तिलक के अनुयायी माधवराव अणे और अप्पा जी जोशी ने सविनय अवज्ञा के तहत ‘जंगल सत्याग्रह’ शुरू किया। डॉ. हेडगेवार ने इसे समर्थन दिया और खुद जंगल जाकर घास काटने का फैसला किया।
12 जुलाई 1930 को गुरु पूर्णिमा उत्सव के दिन नागपुर में उन्होंने इस्तीफा घोषित किया। मंच से उतरते हुए कहा, “जैसे ही मैं इस मंच से उतर जाऊंगा, सरसंघचालक नहीं रहूंगा।” अपनी अनुपस्थिति में डॉ. लक्ष्मण विठ्ठल परांजपे को सरसंघचालक बनाया, जबकि बाला साहेब आप्टे और बापूराव भेडी को दैनिक कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहराया। डॉ. हेडगेवार ने स्पष्ट किया कि स्वयंसेवक स्वतंत्रता और सामाजिक आंदोलनों में भाग लेते रहेंगे, इसलिए वे भी गांधीजी के आंदोलन से जुड़ रहे हैं।
14 जुलाई 1930 को डॉ. हेडगेवार अप्पा जी जोशी और कई स्वयंसेवकों के साथ वर्धा रवाना हुए। सैकड़ों स्वयंसेवक उन्हें विदा करने पहुंचे। तय हुआ कि 21 जुलाई को जंगल कानून तोड़ा जाएगा। यवतमाल पहुंचने पर स्वयंसेवकों ने संघ की खाकी वर्दी मंगवाने को कहा, लेकिन डॉ. हेडगेवार ने रोका: “संघ संगठन के रूप में भाग नहीं ले रहा, इसलिए गणवेश में नहीं।” (आज भी संघ आपदा राहत में वर्दी पहनता है, लेकिन आंदोलनों में नहीं।)
21 जुलाई 1930 को यवतमाल से 10 किमी दूर लोहारा जंगल में 10 हजार लोगों की भीड़ जुट गई। ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारों के बीच डॉ. हेडगेवार और साथी जंगल कटाई में जुटे। पुलिस ने चेतावनी दी, लेकिन वे नहीं माने। अंततः सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। डॉ. हेडगेवार को जंगल कानून तोड़ने के लिए 9 महीने का सश्रम कारावास मिला, जबकि बाकी को 4 महीने की सजा।
गिरफ्तारी के विरोध में नागपुर, वर्धा आदि जगहों पर प्रदर्शन हुए। कई स्वयंसेवक और अधिकारी जेल पहुंचे। दिलचस्प बात यह कि ये प्रदर्शन गांधीजी के सविनय अवज्ञा से जोड़े गए, पुलिस फाइलों में संघ का नाम नहीं आया। एक प्रदर्शन सावरकर की किताबों पर प्रतिबंध के खिलाफ भी था।

 

‘भरत मिलाप’: भावुक पुनर्मिलन और धरोहर की वापसी

 

डॉ. हेडगेवार 14 फरवरी 1931 को जेल से रिहा हुए। अकोला और वर्धा में उनकी भव्य शोभायात्राएं निकलीं, जिनमें कांग्रेसी नेता भी शामिल हुए। 17 फरवरी 1931 को नागपुर के हाथीखाना मैदान में विशाल स्वागत सभा हुई। यहां डॉ. परांजपे ने सरसंघचालक पद की धरोहर वापस डॉ. हेडगेवार को सौंपी। यह दृश्य रामायण के ‘भरत मिलाप’ जैसा था—जैसे भाई भरत ने वनवास लौटे भगवान राम को सिंहासन पर बिठाया। स्वयंसेवक भावुक हो उठे, और यह घटना संघ के इतिहास में ‘भरत मिलाप’ के नाम से अमर हो गई। नरेन्द्र सहगल की किताब ‘डॉक्टर हेडगेवार, संघ और स्वतंत्रता संग्राम’ में इसका वर्णन है।

 

महत्व: संघ की नीति और विरासत

 

यह घटना संघ की मूल नीति को मजबूत करती है—संगठन नाम से आंदोलनों में नहीं, लेकिन स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से हां। राम जन्मभूमि या अन्ना आंदोलन जैसे मामलों में यही नीति दिखी। डॉ. हेडगेवार के इस्तीफे ने संघ को और मजबूत किया, क्योंकि डॉ. परांजपे के नेतृत्व में संगठन चला। आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर भी इस दौर से जुड़े। आज 100 वर्ष पूरे होने पर यह कहानी त्याग और राष्ट्रभक्ति की मिसाल बनकर उभरती है, जो बताती है कि संघ कैसे एक छोटे संगठन से विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बना।

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