इलाज का संघर्ष: योजिता को छिंदवाड़ा के अस्पताल में भर्ती किया गया, लेकिन हालत बिगड़ने पर नागपुर के नेल्सन हॉस्पिटल ले जाया गया। यहां 22 दिनों तक 16 बार डायलिसिस, वेंटिलेटर सपोर्ट और अनगिनत इंजेक्शन दिए गए। सुशांत ने एम्स नागपुर में एडमिशन की कोशिश की, लेकिन उन्हें वहां से मना कर दिया गया। आखिरकार, 4 अक्टूबर 2025 को योजिता इस दुनिया से चली गईं। अस्पताल का बिल 12 लाख रुपये से ज्यादा हो गया।
परिवार का दर्द: सुशांत एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं। इलाज के लिए उन्होंने भाई की एफडी तोड़ी, दोस्तों-ससुराल वालों से मदद ली, सोशल मीडिया पर क्राउडफंडिंग की और मुंबई के एक एनजीओ से एक लाख रुपये मिले। पत्नी ने बताया कि वे अपने हाथों से बेटी को यह ‘जहर’ पिला रहे थे, बिना जाने। अब सुशांत कहते हैं, “पापा, अब घर ले चलो…” यही उनकी आखिरी पुकार थी। प्रदेश सरकार ने परिवार को 4 लाख रुपये का मुआवजा दिया, लेकिन सुशांत इससे संतुष्ट नहीं। वे डॉक्टर, दवा कंपनी और सिस्टम को जिम्मेदार ठहराते हुए इंसाफ की मांग कर रहे हैं।
व्यापक संदर्भ
यह अकेली घटना नहीं है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल में जहरीली कफ सिरप से 16 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। जांच में पता चला कि सिरप में डायथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) नामक जहरीला केमिकल मिला था, जो किडनी फेलियर का कारण बनता है। यह केमिकल कारों के कूलेंट या पेंट में इस्तेमाल होता है, और दवा में मिलाने से मुनाफा बढ़ाने के लिए गैरकानूनी तरीके अपनाए जाते हैं। राजस्थान में भी इसी तरह की घटनाएं हुईं, जहां दो साल पहले ही कुछ सिरप बैन हो चुके थे। स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि 2 साल से कम उम्र के बच्चों को कफ सिरप न दें।
सुशांत अब सोशल मीडिया पर मुहिम चला रहे हैं, ताकि कोई और मासूम इस जहर का शिकार न बने। यह सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की लापरवाही की कहानी है। अगर आपके पास कोई और सवाल हो या मदद की जरूरत, तो बताएं।







