नेपाल में तख्ता पलट …

हमारे पड़ोसी देश नेपाल में वहां की जनता ने तख्तापलट कर सत्ता में आई सरकार का तख्तापलट दिया। आमतौर पर सेनाएं वर्तमान सत्ताधारियों को सत्ता से बेदखल कर खुद सत्ता पर काबिज़ होती हैं पर गत वर्ष अपने पड़ोसी देशों श्रीलंका और बांग्लादेश में इसके उलट हुआ। छात्रों और युवाओं ने ऐसा कर डाला पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ और न ही स्वत: स्फूर्ति ही कहा जाएगा। हिंदू राजतंत्र की पुनर्स्थापना के आंदोलन को मज़बूत करने के लिए राजतंत्रवादियों ने 27 मार्च, 2025 को संयुक्त जन आंदोलन समिति नामक एकदम अलग संगठन का गठन किया। इस समिति का नेतृत्व नवराज सुबेदी को सौंपा गया।
नेपाल का इतिहास राजनीतिक अस्थिरता, राजशाही और लोकतांत्रिक आंदोलनों से पटा पड़ा है।
आधुनिक काल की शुरुआत हो या दूरसंचार क्रांति के लिए जानी जाने वाली 21वीं सदी सत्ता हासिल करने को आतुर शक्तियां खून की नदियां बहती रहीं।
वैसे तख्तापलटों का इतिहास मुख्य रूप से 19वीं सदी के मध्य से शुरू होता है। इस काल में शाह वंश ने गोरखा साम्राज्य की स्थापना की। हालांकि, अधिकांश प्रमुख घटनाएं 20वीं सदी और उसके बाद की हैं। 1846 में यहां के इतिहास सबसे कुख्यात तख्तापलट हुआ था। प्रधानमंत्री जंग बहादुर राणा ने काठमांडू के दरबार में कई दरबारियों, राजकुमारों और सैनिक अधिकारियों की हत्या कर अपने वंश की सत्ता स्थापित की। राणा का शासन 104 वर्षों तक चला, जिसमें राजा केवल औपचारिक प्रमुख थे। 1951 में राणा परिवार के खिलाफ लोकतांत्रिक आंदोलन हुआ। इसका नेतृत्व प्रजा परिषद ने किया।
जानकारों के अनुसार इसे भारत का समर्थन भी था जो खुद अंग्रेजों की गुलामी से 1947 में आजाद हुआ था। तबके राजा त्रिभुवन ने भारत में शरण ली और राणा शासन को उखाड़ फेंका। जनवरी 1951 को संवैधानिक राजतंत्र बहाल हुआ और मोहन शमशेर राणा को हटाकर एमपी कोइराला प्रधानमंत्री बने। यह एक प्रकार का “लोकतांत्रिक तख्तापलट” था। पर ऐसा नहीं कि यह यहीं समाप्त हो गया।

सत्ता का संघर्ष बदस्तूर जारी रहा।

1996-2006 का दौर राजनीतिक अस्थिरता का रहा।
माओ की विचारधारा से प्रेरित वहां की जनता से 10 वर्षों के संघर्षों में राजा ज्ञानेन्द्र का तख्तापलट दिया। हालांकि अपनी सत्ता बचाने के लिए तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र ने एक फरवरी 2005 को आपातकाल घोषित कर स्वयं प्रधानमंत्री बन गए। उन्होंने सभी राजनीतिक गतिविधियां रोक दीं। यह नेपाल का अंतिम प्रमुख राजशाही तख्तापलट था, लेकिन इससे जनता का आंदोलन और तेज हो गया। इसके पूर्व राजपरिवार में हुए सत्ता संघर्ष में राजा वीरेन्द्र और परिवार के अधिकतर सदस्यों की हत्या हो गई और ज्ञानेन्द्र राजा बन गए।
2006 के लोकतांत्रिक आंदोलन के बाद तख्तापलटों का दौर समाप्त हो गया।नेपाल में राजशाही कब तक थी? नेपाल में शाह वंशीय राजशाही लगभग 240 वर्ष तक चली, लेकिन इसकी प्रकृति समय के साथ बदलती रही। 1768 में पृथ्वी नारायण शाह ने गोरखा से विस्तार कर आधुनिक नेपाल की नींव डाली।

 

राणा शासन काल अपने शासनकाल में नाममात्र के राजा थे।

 

नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र 1951 में बहाल हुआ लेकिन राजाओं ने कई बार हस्तक्षेप किया। 28 मई 2008 को संविधान सभा ने नेपाल को “संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित किया और राजशाही औपचारिक रूप से समाप्त हो गई। ज्ञानेन्द्र शाह को पदच्युत कर दिया गया। इसके बाद राजा ज्ञानेन्द्र को नागरिक के रूप में जीवन व्यतीत करने को कहा गया। 2006 के जनआंदोलन जो कि, राजा ज्ञानेन्द्र के तख्तापलट के खिलाफ था ने राजतंत्र के अंत की नींव रखी।
आज नेपाल एक गणराज्य है, जहां राष्ट्रपति प्रमुख हैं।
क्योंकि वह आंदोलन “लोकतंत्र की बहाली” के लिए था। आंदोलनकारी वामपंथी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित थे और उन्होंने इस आंदोलन से जनता को जोड़ा था जो कि इस बार दूर दूर तक देखने को नहीं मिल रहा है।
कम से कम इस आंदोलन को जनआंदोलन तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें न तो आम जनता दिखाई दे रही है और न ही गंभीरता। नारे भी व्यवस्था विरोधी नहीं व्यक्ति विरोधी लगवाए जा रहे हैं। आंदोलनकारियों ने मुख्य विरोध सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाये जाने पर किया। भारत की मुख्यधारा की मीडिया कि रिपोर्टों के अनुसार आंदोलनकारी राजनीतिक भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, असमानता को अपनी समस्याओं की मुख्य वजह मान रहे हैं। ओली सरकार के मंत्रियों पर घोटालों का आरोप भी लगाया जा रहा है। इस बीच राष्ट्रपति, पीएम, कई मंत्रियों के घरों में आग लगा दी गई, संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट सहित कई सरकारी इमारतों में तोड़ फोड़ की गई। पूर्व प्रधानमंत्री झाला नाथ की पत्नी को घर में बंद कर जिंदा जला दिया गया। पूर्व प्रधानमंत्री देउबा और उनकी पत्नी को भी पीटा गया। आंदोलनकारियों ने एक न्यूज़ चैनल की इमारत में आग लगा दी। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभावशाली नेता ‘प्रचंड’ के घर पर भी पथराव हुआ। कई पार्टियों के ऑफिस व जेल पर भी हमला किया गया,इसका फायदा उठाते हुए बड़ी संख्या में कैदी भी भाग खड़े हुए। सेना ने सत्ता की कमान संभाल ली है।अब शांति की उम्मीद होनी चाहिए।
ध्यान रहे कि राजा ज्ञानेन्द्र के खिलाफ हुए आंदोलन का उद्देश्य राजतंत्र की समाप्ति करना ही नहीं पूर्ण लोकतंत्र स्थापित करना भी था। इस बार के आंदोलन में जिस तरह से संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट को निशाना बनाया गया उससे तो यही लगता है कि आंदोलन लंपट तत्वों के हाथ में चला गया है।
वर्ना विश्व के तमाम देशों में राजशाही का प्रतीक राज़ा मात्र शोभा की वस्तु ही रह गया। शायद वैश्विक परिस्थितियों के कारण भी नेपाल में ऐसा न हो सका। राजशाही भी पूरी तरह से कमजोर नहीं हुई थी।

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