ट्रंप का टैरिफ वार और हम

अरुण श्रीवास्तव

एक कहावत है साहेब की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी दोनों खतरनाक होती है। कुछ ऐसा ही भारत अमेरिका या यूं कहें कि, मोदी-ट्रंंप के रिश्तों को लेकर हो रहा है। जबसे ट्रंंप दूसरी बार सत्ता में आये तबसे ही रिश्तों में खटास के लक्षण दिखाई देने लगे थे। अपने शपथ ग्रहण समारोह में भारत को निमंत्रण न देना भारत की अपेक्षा चीन के राष्ट्रपति को खुद फोन करके आमंत्रित करना और भारत के मुखिया नरेंद्र मोदी के अमेरिका पहुंचने पर उनका स्वागत ना करना या स्वागत के लिए बाहर न आना संकेत देने लगा कि अब पहले जैसा नहीं है। हालांकि यह मोदी की आधिकारिक अमेरिकी यात्रा नहीं थी पूर्व तय कार्यक्रम के बिना अमेरिका चले गए थे।
गौरतलब है कि पहले कार्यकाल ‘हाउदी मोदी और नमस्ते ट्रंप’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए दोनों देशों के‌ संबंधों में गर्माहट देखने को मिल रही थी। संकेत तो पहली बार अमेरिका पहुंचने पर ही ट्रंप ने दे दिया था। ट्रंप के शपथ लेने के बाद कई राष्ट्रों के प्रमुख अमेरिका पहुंचे और ट्रंप में अपने आवास के बाहर आकर निजी तौर पर सबका स्वागत किया पर जब हमारे प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका पहुंचे तो उसके स्वागत के लिए अपने एक अधिकारी को भेजा। इसी बीच पहलगाम में हुए आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद घटी घटनाओं ने ‘कोढ़ में खाज’ का काम किया। ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके चल रहे युद्ध (ऑपरेशन सिंदूर) को रुकवाया और इसके लिए व्यापारिक डील तोड़ देने की धमकी दी थी। हालांकि इसके पहले उन्होंने चुनाव में मतदान बढ़ाने के लिए यूएस-ऐड के तहत भारत को भारी रकम देने की बात कही फिर मोदी का नाम लेते हुए इसकी पुष्टि भी की। वहीं दूसरी ओर हमारी तरफ से तरह से खंडन नहीं हुआ जिस तरह से अमेरिका ने नाम लेते हुए दावा किया था। भारत की तरफ से एक बार भी हमारे पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जिन्हें अपना मित्र कहते थे का नाम लेकर उनके बयान को गलत नहीं ठहराया बल्कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से खंडन कराया गया।
बात यहीं समाप्त नहीं होती अमेरिका ने अपने देश में रह रहे विदेशी नागरिकों को भेजे जाने के क्रम में भारतीयों को ‘हाथों में हथकड़ी पांवों में बेड़ी’ डालकर उन्हें सेना के हवाई जहाज से भेजा और हमारी तरफ से इस बात का विरोध नहीं किया गया, नाराजगी नहीं जताई गई। सेना के जहाज में सीट की जगह बेंच होती है।
वहीं पर कोलंबिया जैसे छोटे देश ने अमेरिका का विरोध किया और अपने नागरिकों को लाने के लिए अपना जहाज़ भेजा। दबने की हद तो तब हो गई जब अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान इसका विरोध नहीं किया बल्कि अपने नागरिकों के प्रवेश के तरीके पर ही सवाल खड़े कर दिए। सवाल प्रवेश करने के तरीके का नहीं गलत तरीके से भेजे जाने को लेकर था।
बताते चलें कि टॉयलेट जाने के लिए भी भारतीयों के हाथ-पैर नहीं खोले गए थे।‌ इनमें महिलाएं और बच्चे भी थे।
मानसून सत्र के पहले सत्ता पक्ष दलील देता रहा कि ट्रंप की वजह से ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध विराम नहीं हुआ। संसद में तो हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान के डीजीएमओ की ‘चिरौरी’ करने पर सीज़ फायर हुआ। उन्होंने संसद को बताया कि पाकिस्तान के डीजीएमओ ने फोन कर आग्रह किया कि,’अब तो बस करिए महाराज’।
देश की जनता के लिए महत्वपूर्ण यह नहीं है कि दुश्मन देश के डीजीएमओ ने ‘महराज’ शब्द का प्रयोग किया। महत्वपूर्ण यह है कि अमेरिका ने हमारे देश के दुश्मन को लंच/डिनर पर बुलाया, आई लव पाकिस्तान कहा। भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू के पलड़े पर रख कर तौल दिया। पीएम मोदी ने एक सभा में खुद कहा कि, कनाडा से लौटते समय ट्रंंप ने आग्रह कर कहा कि जब इतने पास आये हैं तो मिलते हुए जाइए तो मैंने (कुछ इस तरह जवाब दिया कि मुझे भगवान के दरबार में जाना है पहले वहां जाऊंगा’।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को विदेशी मदद ही नहीं मिली बल्कि उसे आतंकवाद विरोधी संगठन का उपाध्यक्ष भी बना दिया गया। ज़ाहिर सी बात है कि ये सब अमेरिका के सहयोग के बिना नहीं हुआ होगा।
कुल मिलाकर अमेरिका क़दम क़दम पर हम भारतियों को अपमानित कर रहा है और हम इसका माकूल जवाब तक नहीं दे रहे हैं। लगभग तीन दर्जन बार ट्रंप दावा कर चुके हैं कि भारत पाकिस्तान के बीच सीज़ फायर उन्होंने कराया और डील की धमकी देकर कराया था, यही नहीं हर बार हमारे पीएम मोदी का नाम तक लिया। एक बार तो दस्तावेज (शपथपत्र जैसा) दाखिल कर अपनी बात दोहराई। तब भी हमारे पीएम मोदी ने एक बार भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नाम तक नहीं लिया।
ट्रंंप ने कई बार हमारे देश पर भारी टैरिफ लगाने की (धमकी दी) बात कही। छोटे से छोटे देशों ने इसका विरोध किया, चीन ने एक बार नहीं कई बार जवाबी टैरिफ लगाने की घोषणा भी की लगाया भी। उसके घोषणा करने पर अमेरिका बैक फुट पर भी आया पर हमने एक बार भी ट्रैफिक का विरोध नहीं किया और ये तक नहीं कहा कि अगर आप टैरिफ लगाएंगे तो हम भी जब जवाबी टैरिफ टैरिफ लगाएंगे। यही नहीं बजट पेश करने के पहले ही अमेरिका से आने वाली बाइक (हार्ले डेविडसन) पर 125 फीसद लगने वाले टैक्स को घटकर 15% कर दिया, अमेरिका के एक बड़े व्यापारी एलन मस्क ने तो मुंबई में अपने इलेक्ट्रिक वाहन का शोरूम तक खोल दिया हालांकि इसे भारत में बनाए जाने की बात कही थी लेकिन बाद में शोरूम खोल कर हमारी सरकार को लॉलीपॉप पकड़ा दिया। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि हमने मस्क की ‘स्टार लिंक’ जैसी राक्षसी स्कीम को भी मंजूरी दे दी है। लोग आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि अगर स्टार लिंक आया तो यहां की टेलीकॉम कंपनियां बर्बाद हो जाएंगी जैसा कि टैरिफ लगाने के दौरान देखा गया ट्रंप ने 25% टैरिफ को बढ़ाकर 50% कर दिया और कहा कि अतिरिक्त टैरिफ तब नहीं लगेगा जब भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा यह भारत के रूस से तेल खरीदने पर जुर्माना है। हमारे देश का गोदी मीडिया इस जुर्माने का नाम तक नहीं ले रहा है बल्कि उसने इस 25% को एडिशनल टैरिफ नाम दिया है। इस जुर्माने का तुरंत दिखाई देने लगा। इसका 48 अरब डॉलर के निर्यात पर सीधा असर पड़ा।

इसका हमारे देश के कपड़ा, परिधान, रत्न-आभूषण, झींगा, चमड़ा-जूता और पशु निर्यात पर तुरंत असर पड़ा। अवसरवादी शेयर बाजार प्रभावित हुआ। सेंसेक्स 849 अंक गिरा जिसका नतीजा यह हुआ कि, 5.57 लाख करोड़ रुपए डूब गए। साथ ही ऐसी आशंका जताई जा रही है कि जीडीपी, बाजार और कमाई पर भी असर पड़ेगा। अर्थव्यवस्था 1.1 % तक घट जाएगी, आपूर्ति बाधित होगी और आर्डर भी रद होंगे क्योंकि अमेरिका को भारत दस अरब डॉलर का कपड़ा और नौ अरब डॉलर का मशीनरी व इंजीनियरिंग का सामान निर्यात करता है। कंपनियों की कमाई और क़र्ज़ पर संकट गहराएगा। बहरहाल इससे उन लोगों को क्या लेना-देना जिन्होंने ट्रंप की जीत के लिए यज्ञ किए थे।

 

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