“इतिहास की सीख छोड़ फ्रेम में उलझा युवा वर्ग”

(संघर्ष की गाथा भूली, तस्वीरों की दुनिया में खोया युवा)

 

आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि युवा वर्ग केवल फ्रेम और क्लिक की दुनिया में सिमटकर न रह जाए। क्षणभंगुर छवियाँ उसे आकर्षित करती हैं, परंतु इतिहास और साहित्य ही स्थायी आत्मबल देते हैं। फ्रेम से मिली चमक पल भर की है, लेकिन साहित्य से मिला आत्मसत्य पीढ़ियों तक ऊर्जा देता है। आवश्यकता है कि युवा वर्ग सोशल मीडिया की सतहीता से बाहर निकलकर संस्कृति और ज्ञान की गहराई को पहचाने। इतिहास से सीखना और साहित्य से जुड़ना ही उनके जीवन को दिशा देगा। यही भविष्य को सार्थक बनाने का मार्ग है।

डॉ. प्रियंका सौरभ

 

पीढ़ी 1990 के बाद पैदा हुई, उसके हिस्से ‘इतिहास’ कम ‘फ्रेम’ ज्यादा आए। मोबाइल, कैमरा और सोशल मीडिया की दुनिया ने उन्हें घटनाओं की गहराई में जाने की बजाय केवल सतही फ्रेम और दृश्य-छवियों तक सीमित कर दिया। आज का युवा वर्ग अतीत के संघर्षों से शिक्षा लेने के बजाय इंस्टेंट फ्रेमों में फँसा है। यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

आधुनिकता के उन्माद के बावजूद हमारे सार्वजनिक जीवन में जो शून्यता, दरिद्रता और दिशाहीनता दिखाई देती है, उसके कारण बहुत दूर जाकर नहीं खोजने पड़ते। यह शून्यता दरअसल हमारी स्मृतियों और सांस्कृतिक आत्मबोध के बिखराव से पैदा हुई है। इतिहास हमें बताता है कि क्या हुआ, जबकि साहित्य यह दिखाता है कि क्या हो सकता था और क्या होना चाहिए था। साहित्य को आत्मसत्य इसलिए कहा गया है कि वह मनुष्य को केवल सूचना नहीं, बल्कि अनुभव और मूल्य देता है।

भारत का इतिहास किसी सुखद घटनाओं की लड़ी नहीं है। इसमें युद्ध, संघर्ष, विद्वेष, विभाजन और बँटवारा है। लेकिन इन्हीं अंधेरे अध्यायों के बीच स्वतंत्रता आंदोलन की गाथा भी है। 1857 से 1947 तक का काल केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, वह साहित्य का भी स्वर्णकाल था। स्वतंत्रता संग्राम और साहित्य जैसे एक-दूसरे में घुल गए थे। कवि, लेखक और कलाकार केवल दर्शक नहीं थे, बल्कि वे इतिहास के सह-निर्माता थे। उनके गीत, कविताएँ और उपन्यास आम जनमानस में ऊर्जा और चेतना जगाते थे। यही कारण है कि आज़ादी की लड़ाई केवल तलवार और आंदोलन की गाथा नहीं रही, बल्कि साहित्यिक कृतियों की भी कहानी बनी।

लेकिन यह गौरवशाली परंपरा आज कहीं खो गई है। एक प्राचीन सभ्यता की प्राणवत्ता उसके सांस्कृतिक प्रतीकों और जीवनदायी आस्थाओं में निहित होती है। यही प्रतीक एक समय में हमारे चिंतन, सृजन और व्यवहार को अर्थ प्रदान करते थे। जब यह जीवन्त समग्रता खंडित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट जाती है, तो वे केवल नामलेवा अनुष्ठानों तक सिमट जाते हैं। पूजा-पाठ तो बचा रहता है, परंतु उससे कोई नयी प्रेरणा नहीं निकलती। आज का भारतीय समाज इसी विडंबना से गुजर रहा है—हमारे पास परंपराएँ तो हैं, लेकिन उनमें जीवन्तता नहीं है।

हम अपने ही देश में आत्मनिर्वासित प्राणियों की तरह जीने को विवश हो गए हैं। हमारी नैतिक मर्यादाएँ, हमारे अध्ययन और हमारे विचार—सब पर विदेशी भाषा और सोच का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। अंग्रेज़ी का वर्चस्व केवल एक शैक्षिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक निर्भरता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसी पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा था—“अंग्रेज़ी भाषा ने संस्कृत का सर्वाधिकार छीन लिया है। आज भारतीय विद्याओं की जैसी विवेचना और विचार अंग्रेज़ी भाषा में हैं, उसकी आधी चर्चा का भी दावा कोई भारतीय भाषा नहीं कर सकती। यह हमारी सबसे बड़ी पराजय है। राजनीतिक सत्ता के छिन जाने से हम उतने नतमस्तक नहीं हैं, जितने अपने विचार की, तर्क की, दर्शन की, अध्यात्म की अपनी सर्वस्व भाषा छिन जाने से। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में हम अपनी ही विद्या को अपनी बोली में न कह सकने के उपहासास्पद अपराधी हैं। यह लज्जा हमारी जातीय है।”

वास्तव में जिसे द्विवेदी जी ने ‘उपहासास्पद अपराध’ कहा, उसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार भारतीय सम्भ्रांत शिक्षित वर्ग रहा है। उसने अंग्रेज़ी को श्रेष्ठता और भारतीय भाषाओं को पिछड़ेपन का चिह्न बना दिया। आज स्थिति यह है कि युवा पीढ़ी अपनी ही भाषा में बोलने से हिचकती है, अपनी संस्कृति को आधुनिकता के विपरीत मानती है और साहित्य को केवल पाठ्यक्रम की किताबों तक सीमित समझती है।

1990 के बाद जन्मी पीढ़ी का संकट यही है। उनके पास सूचनाओं का अंबार है, पर आत्मसत्य नहीं। वे मोबाइल स्क्रीन पर इतिहास की झलकियाँ देखते हैं, पर उसकी गहराई में नहीं उतरते। उनकी चेतना फ्रेमों और क्लिप्स पर आधारित है। इस पीढ़ी ने ‘इतिहास’ कम और ‘फ्रेम’ ज्यादा देखे हैं। यही कारण है कि उनमें वह गहराई नहीं है, जो साहित्य और इतिहास से संवाद करने पर आती।

इतिहास से हमें संघर्ष, धैर्य और त्याग की शिक्षा मिलती है। लेकिन फ्रेम हमें केवल तात्कालिक दिखावा और सतही आकर्षण देता है। यही वजह है कि युवा वर्ग की ऊर्जा दिशाहीन होती जा रही है। उनके पास विकल्प बहुत हैं, पर संकल्प नहीं। फ्रेम की दुनिया क्षणभंगुर है—एक फोटो, एक रील, एक क्लिक पल भर में आती है और मिट जाती है। जबकि इतिहास की सीख स्थायी है—वह आने वाली पीढ़ियों को भी दिशा देती है। यदि युवा वर्ग इस आत्मसत्य को समझने में असफल रहा, तो वह न केवल अपने वर्तमान को खो देगा बल्कि भविष्य को भी अंधकारमय कर लेगा।

साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। यह व्यक्ति और समाज को अपने आत्म से मिलाने वाला माध्यम है। साहित्य हमें बताता है कि हमारी जड़ें कहाँ हैं और हमारे सपनों का आकाश कहाँ तक फैला है। साहित्य के बिना समाज केवल सूचनाओं का ढेर रह जाता है, आत्मबोध और दिशा खो देता है। यही कारण है कि आज साहित्य को पुनः केंद्र में लाने की आवश्यकता है।

आज का प्रश्न यही है—क्या हम इस पीढ़ी को फिर से साहित्य और इतिहास से जोड़ पाएँगे? क्या हम उन्हें दिखा पाएँगे कि संस्कृति कोई बोझ नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का आधार है? यह तभी संभव होगा जब भारतीय भाषाओं को केवल बोलचाल तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें ज्ञान और शोध की भाषा बनाया जाए। नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया के फ्रेम और क्लिक क्षणिक हैं। वे पल भर में आते हैं और गायब हो जाते हैं। लेकिन साहित्य और संस्कृति वे आधार हैं, जिन पर स्थायी आत्मविश्वास खड़ा होता है।

यह पीढ़ी तभी सार्थक होगी जब वह अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिकता को आत्मसात करेगी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो साहित्य केवल पुस्तकालयों में बंद रह जाएगा और संस्कृति केवल त्योहारों के सजावटी फ्रेम में कैद हो जाएगी। तब हम केवल उपभोक्ता समाज रह जाएँगे, सृजनशील सभ्यता नहीं।

आज आवश्यकता है कि विद्यालय और विश्वविद्यालय साहित्य को केवल परीक्षा का विषय न मानें, बल्कि जीवन का अनुभव मानें। लेखकों और कवियों को पुनः समाज के केंद्र में लाने की ज़रूरत है। भाषा को बोझ नहीं, गौरव का माध्यम बनाने की आवश्यकता है। और सबसे बढ़कर, नई पीढ़ी को यह एहसास दिलाना होगा कि साहित्य का आत्मसत्य ही वह शक्ति है, जो उन्हें इतिहास की गहराई और भविष्य की दिशा दोनों देता है।

इतिहास हमें यह दिखाता है कि हमने क्या खोया और क्या पाया। साहित्य हमें यह सिखाता है कि हम क्या हो सकते हैं। यही कारण है कि साहित्य और इतिहास का संबंध इतना गहरा और अविभाज्य है। यदि नई पीढ़ी इस आत्मसत्य से जुड़ने में असफल रही, तो वह न तो इतिहास समझ पाएगी और न ही भविष्य गढ़ पाएगी।

आधुनिकता का उन्माद तभी सार्थक होगा, जब वह साहित्य और संस्कृति की आत्मा से जुड़कर नई रचनात्मकता पैदा करेगा। अन्यथा हम केवल ‘फ्रेम’ की पीढ़ी रह जाएँगे—जहाँ गहराई नहीं होगी, केवल सतही छवियाँ होंगी। यही इस समय की सबसे बड़ी चेतावनी भी है और सबसे बड़ा समाधान भी।

 

डॉ. प्रियंका सौरभ

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