आरक्षण पर बिहार के दलितों में दो फाड़

 चिराग और मांझी में 7 vs 10 की लड़ाई शुरू

दीपक कुमार तिवारी

पटना । कभी मंडल कमीशन को लेकर सवर्ण और पिछड़ों के बीच जिस घमासान की कुरूप तस्वीर से पूरे भारत को गुजरना पड़ा था, आज आरक्षण को लेकर बहुत कुछ ऐसी ही कुरूप तस्वीर उभरने लगी है। इस उभार के साथ दलित राजनीति में भी फूट के बीज तो पड़ गए। अब आंदोलन का रुख पकड़ चुकी दलित राजनीति का भी विभाजन हो गया, जहां एक ओर संपन्न दलित तो दूसरी ओर गरीब दलित अपने अपने हक के लिए आमने-सामने हो गए हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2005 में महादलित आयोग बनाया। फिर इस आयोग के रिपोर्ट के बाद सीएम नीतीश कुमार ने 2007 में एक बड़ा फैसला करते हुए दलित और महादलित की बड़ी लकीर खींची थी। हो यह रहा था कि दुषाध, पासी, धोबी और रविदास सबसे ज्यादा लाभ आरक्षण या अन्य योजना मद में उठा रहे थे। तब नीतीश सरकार का एक बड़ा मकसद महादलित को बनाने को लेकर यह था कि वंचित दलित यानी महादलित को सरकार की योजनाओं का लाभ कैसे मिले। उसे कोटा के अंदर कैसे प्रमोट करें। योजनाओं का लाभ पहले कैसे मिले।
मकसद यह था कि दलित की कुछ मजबूत जातियों को एक अलग कैटेगरी में रख कमजोर दलित को आरक्षण या फिर अन्य योजनाओं का लाभ मिल सके। लेकिन तत्कालीन दुषाद, पासी, धोबी और रविदास के नेताओं के दवाब में दलित महादलित का विभाजन समाप्त कर दिया।
हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा सेकुलर (हम) के नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने वंचित दलित की आवाज बनकर उभरे हैं। इनका मानना है कि हमारी लड़ाई मुसहर, भुइयां, डोम, चमार, धोबी, नट मेहतर, तूरी, रजवार, भोक्ता और अन्य घुमंतू जातियों के लिए हैं। राजनीतिक गलियारों की माने तो जीतन राम मांझी 10 प्रतिशत दलित की राजनीति कर रहे हैं और चिराग पासवान 7 प्रतिशत वोट की।
लोजपा सुप्रीमो चिराग पासवान वैसे तो कोर्ट के निर्णय के साथ खड़े हैं, जहां दलित में और कोई विभाजन रेखा नहीं चाहते। यह दीगर कि कभी ये भी कहते थे कि संपन्न दलित सुविधा छोड़ दें ताकि वंचित दलित आरक्षण की सुविधा ले सकें।
वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क कहते हैं कि दलित राजनीति को लेकर जो चर्चा हो रही है वह कितना वाजिब है या गैर वाजिब यह समझना जरूरी है। ऐसा इसलिए कि यह निर्णय न्यायालय का है। इसमें कोई भी सरकार शामिल नहीं है। ऐसे मुद्दे पर राजनीति चलती रहेगी तो एक दिन दलित राजनीत ही खत्म हो जाएगी। ऐसा इसलिए भी अब दलितों को भी समझ में आने लगा है कि कौन हमारी हकमारी कर रहा है। वे कौन हैं जो आरक्षण का लाभ ऊपर ही ऊपर उठा लेते हैं।
चिराग पासवान जो कहा करते थे कि संपन्न दलित को आरक्षण की सुविधा छोड़ देनी चाहिए। ताकि जो आरक्षण का लाभ नहीं उठा सके हैं उसे भी आरक्षण मिल सके। मगर वोट की राजनीत पर पकड़ बनाए रखने को 7 प्रतिशत राजनीति की रोटी सेंकने लगे हैं।

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