‘बिहार में बीजेपी नेतृत्व की सरकार 2025 में बननी चाहिए’

 केंद्र में एनडीए सरकार बनते ही नीतीश को लेकर बदले अश्विनी चौबे के सुर

दीपक कुमार तिवारी

पटना। भारतीय जनता पार्टी पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के एक बयान के बाद बिहार की राजनीति में खलबली है। उनके बयान के बाद बिहार में कई राजनीतिक सवाल खड़े हो गए हैं। माना जा रहा है उनके बयानों का सीधा असर बिहार के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी पर पड़ने वाला है। दरअसल, बीजेपी के सीनियर लीडर अश्विनी चौबे ने दिल्ली में एक बयान में यह कहा कि वो जमीनी स्तर के कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भाजपा में दरी तक उठाने का काम किया है। उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि 2025 में बिहार में बीजेपी की सरकार बने।

इसके बाद उन्होंने जो बात कही वह सीधे तौर पर बिहार के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी को टारगेट करने वाला है।अश्विनी चौबे ने दिल्ली में एक बयान में यह कहा कि बिहार प्रदेश अध्यक्ष भाजपा किसी को भी बनाएं, वो उसके साथ खड़े रहेंगे। मगर आयातित माल नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि आयातित लोगों को मंत्री, सांसद, विधायक बनाया मगर राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष मूल रूप से उस विचारधारा का होना चाहिए जो विचारधारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेई ने पार्टी को दी है।

अश्विनी चौबे के इस बयान के बाद यह माना जा रहा है कि उनका सीधा टारगेट बिहार के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी हैं।बताया जा रहा है कि अश्विनी चौबे का यह बयान उस वक्त आया है, जब उन्होंने खुद को राज्यपाल बनाए जाने का ऑफर ठुकरा दिया है। ऐसे में यह माना जा रहा है की अश्विनी चौबे बिहार के प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभालने के इच्छुक हैं।

अश्विनी चौबे बीजेपी के विचारधारा के जमीन स्तर के कार्यकर्ता भी हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेई के सिद्धांतों वाले नेता भी हैं। ऐसे में इस बात का अनुमान लगाया जा रहा है कि अश्विनी चौबे बिहार के अगले प्रदेश अध्यक्ष के रूप में खुद को प्रोजेक्ट करते हुए नजर आ रहे हैं।

बिहार बीजेपी के प्रदेश इस वक्त दो पदों पर हैं। सम्राट चौधरी एक तरफ जहां बिहार के डिप्टी सीएम का पद भी संभाल रहे हैं और प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी। ऐसे में बीजेपी के सिद्धांत पर एक व्यक्ति एक पद के खिलाफ है। इधर, अश्विनी चौबे की तरह ही सम्राट चौधरी ने भी संगठन में काम करने की अपनी इच्छा जता दी है। उन्होंने कहा कि वह संगठन का काम देखना चाहते हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष यदि सम्राट चौधरी बने रहते हैं तो उन्हें बिहार के उपमुख्यमंत्री का पद छोड़ना होगा।

मगर सवाल तो यह है कि क्या भाजपा अपने प्रदेश अध्यक्ष में बदलाव करेगी? माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे के बाद बीजेपी सवर्ण समाज को साधने का प्रयास करेगी। बीजेपी के पास सवर्ण समाज को साधने के लिए कई चेहरे हैं। जिन्हें बीजेपी आगे कर सकती है। एक तरफ जहां अश्वनी चौबे ब्राह्मण चेहरा हैं। जिससे छेड़छाड़ का खमियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा है। अश्विनी चौबे बक्सर लोकसभा सीट से सांसद थे। यहां बाहरी मिथिलेश तिवारी को उतारने के बाद बीजेपी को यह सीट गंवानी पड़ी।

आरा में आरके सिंह की भी हार हुई। अनुमान है कि यहां सवर्ण समाज एकजुट नहीं हुआ। शाहाबाद और मगध के क्षेत्र में राजपूत, ब्राह्मणों और सवर्ण समाज की नाराजगी थी। ऐसे में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अश्वनी चौबे, मिथिलेश तिवारी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष संजय जयसवाल को आगे बढ़ा सकती है। गोपाल जी ठाकुर भी इस रेस में शामिल माने जा रहे हैं।

बीजेपी के सामने चुनौती यह है कि उसे एक तरफ सवर्ण समाज को भी साधना है। और कुशवाहा समाज को भी नाराज नहीं करना है। बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव कुशवाहा समाज पर दांव खेल रहे हैं। लालू की कोशिश है कि कुशवाहा समाज को बीजेपी और जेडीयू से तोड़कर अपने पाले में लाया जाए।

वजह साफ है, विधानसभा चुनाव नजदीक है। मुसलमान और यादवों के बाद लव-कुश समाज की संख्या बिहार में सबसे ज्यादा है। ऐसे में बीजेपी लव कुश समाज को नाराज करने का रिस्क किसी हाल में नही लेना चाहेगी। एक पद एक व्यक्ति के सिद्धांत के अनुसार ज्यादा संभावना यह है कि बीजेपी बिहार के डिप्टी सीएम के रूप में सम्राट चौधरी के चेहरे को ही कंटिन्यू करे। ब्राह्मण और राजपूत समाज को संतुष्ट करने के लिए अश्विनी चौबे, मिथिलेश तिवारी, गोपाल जी ठाकुर जैसे चेहरों को आगे करे।

यदि वैश्य समाज से कोई चेहरा बीजेपी चुनती है। तो वह चेहरा संजय जायसवाल का भी हो सकता है। लेकिन अश्वनी चौबे के बयान के अनुसार देखा जाए तो बीजेपी के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी ‘आयातित’ भी हैं और भाजपा की उस विचारधारा से भी नहीं जुड़े हुए जो विचारधारा दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी की है।

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