विपक्ष को बेधने के लिए भाजपा के तरकश में कई तीर

 पीएम मोदी ने अपने नारे से इंडी को मूल मुद्दों से भटकाया

 बिहार में 40 और देश में 400 पार का नारा

दीपक कुमार तिवारी

पटना। भाजपा या यू कहें कि नरेंद्र मोदी के तरकश में कितने तीर हैं, यह किसी को नहीं पता। वे कब कौन-सा तीर चलाएंगे, इसके बारे में तो और भी किसी को पता नहीं होता। हमलावरों को चुटकी बजा कर मूल मुद्दे पर चुप करा देना या उनको दूसरे मुद्दों में उलझा देना नरेंद्र मोदी की कला है। मोदी ने लोकसभा चुनाव में विपक्ष को ऐसा उलझाया कि वे उससे बाहर निकलना ही नहीं चाहते। घूम-फिर कर वे वहीं आकर अटक जाते हैं, जहां मोदी ने उलझाया था।

इच्छा तो हर किसी को शिखर छूने की ही रहती है। नरेंद्र मोदी की भी ऐसी इच्छा हो तो अचरज नहीं। अचरज ही नहीं, किसी भी तरह से उसे गलत भी नहीं ठहराया जा सकता है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने जब 1984 का चुनाव लड़ा तो गजब की सहानुभूति लहर दिखी थी। लोगों ने 403 सीटें कांग्रेस की झोली में डाल दी थीं।

लोकसभा में वह रिकार्ड 40 साल में कोई नहीं तोड़ पाया। सच तो यह है कि आजादी के बाद से अब तक कोई इस रिकार्ड को नहीं तोड़ पाया। मोदी ने 2019 में कोशिश जरूर की थी, लेकिन सीटें 303 यानी स्थापित रिकार्ड से सौ कम रह गई थीं। भाजपा को 2014 में 282 सीटें आई थीं। 2014 के मुकाबले मोदी की सीटें जरूर बढ़ गईं, पर रिकार्ड नहीं तोड़ पाए। संभव है कि उस रिकार्ड को तोड़ने की मोदी की मंशा रही हो। इसी मंशा के कारण उन्होंने लोकसभा चुनाव की घोषणा के पहले ही आबकी बार 400 पार का नारा उछाल दिया।

नरेंद्र मोदी सरकार के दो कार्यकाल यानी 10 साल की विफलताएं बता कर विपक्ष जनता को अपने पक्ष में लामबंद करने की योजना बना चुका था। मोदी ने 15 लाख खाते में नहीं भेजे। दो करोड़ रोजगार का वादा पूरा नहीं किया। महंगाई पहले के मुकाबले और बढ़ गई। सामुदायिक समरसता बिगड़ी। विपक्ष को मोदी खत्म करना चाहते हैं। क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व मिटाना चाहते हैं मोदी।

विपक्ष के पास जनता के बीच ले जाने के ये प्रमुख मुद्दे थे। मोदी ने 400 पार का नारा क्या दिया, सभी मूल मुद्दों से भटक कर इसी में उलझ गए। सबकी ऊर्जा इसमें जाया होने लगी कि मोदी का 400 पार का सपना तो कोरी कल्पना है। किसी ने कहा कि उन्हें इतनी ही सीटें आएंगी, तो किसी ने कहा कि इससे अधिक सीटें नहीं मिलने वालीं।

विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस के राहुल गांधी हों या बिहार के लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव, विपक्षी पार्टियों का हर नेता इसी भविष्यवाणी में उलझ गया कि मोदी को कितनी सीटें मिलेंगी। सभी मोदी की 400 पार की संख्या के मकड़जाल में ही उलझ कर रह गए।
आंकड़ों के आकलन और भविष्यवाणी में ही विपक्ष उलझ कर रह गया।

किसी ने मोदी के दावे में दम देखा भी तो इसके लिए ईवीएम पर दोष मढ़ने की कोशिश की। ईवीएम का मामला सर्वाेच्च अदालत तक पहले से ही पहुंचा हुआ था। सर्वाेच्च अदालत ने ईवीएम के बदले बैलट पेपर से वोटिंग कराने की मांग खारिज कर दी। भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से ही विपक्ष ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाते रहा है। साथ ही बैलट पेपर से चुनाव कराने को अधिक पार्दर्शी बताता रहा है।

अदालत ने मामले में अंतिम निर्णय तक पहुंचने के पहले तमाम पहलुओं पर विचार किया। अदालत ने टिप्पणी की- पुराने दिनों के चुनाव याद हैं। इसलिए बैलट पेपर से चुनाव नहीं होंगे। बूथ लूट जैसी घटनाओं की पुनारवृत्ति से बचने के लिए ईवीएम से चुनाव ही उम्दा उपाय है। यह सच भी है। बिहार, यूपी समेत कई राज्यों से तब बूथ लूट और बंगाल में साइंटिफिक रिगिंग की अक्सर चुनाव के दौरान खबरें आती थी।

उन्हीं परेशानियों को देख कर ईवीएम से चुनाव की व्यवस्था चुनाव आयोग ने शुरू की थी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 2014 में नरेंद्र मोदी ईवीएम के जरिए हुए मतदान से ही चुने गए थे। तब तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की ही सरकार थी।

देश पहला लोकसभा चुनाव 1951-52 में हुआ था। चुनाव 25 अक्तूबर 1951 को शुरू हुए और फरवरी 1952 तक यानी तकरीबन चार महीने चले। तब लोकसभा में 489 सीटें ही होती थीं। पहले आम चुनाव में 1,949 उम्मीदवार चुनाव लड़े थे। तब गिनी-चुनी राजनीतिक पार्टियां थीं। 2019 में तो 50 से अधिक पार्टियों ने चुनाव लड़ा था।

2019 के चुनाव में सात राष्ट्रीय दलों के अलावा बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय दल शामिल थे। अब तो उम्मीदवारों की संख्या हजारों में पहुंच जा रही है। अगर बैलट पेपर पर चुनाव होते तो पैसे की कितनी बर्बादी होती, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसे समझने के लिए पहले आम चुनाव के कुछ तथ्यों पर गौर कीजिए। पहले चुनाव में मतदान केंद्र पर हर प्रत्याशी के लिए अलग-अलग रंग की मतपेटी अलॉट की गई थी।

वोटर लिस्ट तैयार करने में सिर्फ टाइपिंग के लिए छह महीने के कांट्रैक्ट पर 16,500 क्लर्कों ने काम किया। वोटर लिस्ट को प्रिंट कराने में 380,000 रीम कागज का उपयोग हुआ था। तब जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर देश में महज 17 करोड़ से थोड़ा अधिक ही वोटर थे। आज वोटरों की संख्या 97 करोड़ पहुंच गई है। यानी पांच गुनी से ज्यादा संख्या है। अगर बैलट पेपर के जमाने में हम लौटते तो खर्च कितना होता, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

राहुल गांधी कहते हैं कि इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा 180 से अधिक सीटें नहीं जीत पाएगी। नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव कहते हैं कि चुनाव में विपक्षी दलों को बराबरी का मौका मिल जाए तो बाजपा 100 सीटें भी नहीं जीत पाएगी। भाजपा से बराबरी में उन्होंने सात बाधाओं का जिक्र किया है।

इनमें हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, गोदी मीडिया, केंद्रीय जांच एजेंसियों और चुनाव आयोग का दुरुपयोग, ईवीएम, इलेक्टोरल बांड, धन बल और छल बल को भाजपा से विपक्ष की बराबरी में तेजस्वी बाधक बताते हैं। आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल का आकलन है कि भाजपा को इस बार अधिकतम 220 से 230 सीटें ही मिलेगी।

मोदी सरकार नहीं बना पाएंगे। टीएमसी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी कह रहीं- भाजपा नारा दे रही है कि इस बार 400 पार। मेरा चैलेंज है कि वह पहले 200 सीटों के मानदंड को ही पार कर ले। 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने 200 से अधिक सीटों का संकल्प लिया था, लेकिन 77 पर ही संतोष करना पड़ा। यानी मूल मुद्दों की बजाय विपक्षी पार्टियों के नेता जीत-हार के आंकड़े में ही उलझ कर रह गए हैं।

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