बेबसी में उलझती गई नई बहुरिया

पुष्पा सिंह विशेन 

वह खुश थी अपनी दूसरे। विवाह से आखिर एक पति को छोड़ कर आई थी। जिस लड़के से रिश्ता तय हुआ था वह इकलौता था।मीत नाम था बहुत ही ज्यादा अमीर भी नहीं हैं उसके घर वाले लेकिन निधि बहुत ही खुश है,वह जानती है कि कैसे ईमानदार और व्यवहार कुशल लोगों को बेवकूफ बना कर मैं अपना काम कर वहां से निकल सकती हूं।
उसके इस सोच से सभी अंजान हैं और आज तक स्वयं के परिवार वालों को भी उसकी वीभत्स सोच का पता नहीं है। पहले पति विद्याधर को छोड़ चुकी है, चर्मरोग का हवाला देकर और उसकी मां बहन को भी बुरा साबित करने में बहुत ही साफगोई से सफल हो गयी थी क्योंकि कि वो  दुष्ट महिलाओं के उस हथियार को बहुत ही मासूमियत से प्रयोग करते हुए आंसुओं के खारे समंदर में डुबोकर सम्मोहित करने में सक्षम हो जाती है। घर परिवार वालों को भी आज तक पता नहीं चल पाया है कि उनके घर की  ये लड़की चुप्पी साधे हुए रहती है और अनेक प्रकार की मानसिक यातनाएं देने में माहिर हैं। बिल्कुल नागिन की तरह ।
मीत उसे देख चुका था और हप्ते भर में विवाह भी हो गया था। आखिर दूसरी बार बहुत ही सामान्य तरीके से सब कुछ सम्पन्न हुआ और वह आ गयी लाल जोड़े में उस घर में अपने शातिर दिमाग का प्रयोग करने।
किसी तरह दो-चार दिन निकले थे दोनों हनीमून पर चले गए। वहां से आते ही तीसरे दिन काम के दबाव की बात अपनी बहन से करते हुए अपने खतरनाक उद्देश्य की शुरुआत कर चुकी थी।
आनन-फानन में मीत ने महंगी काम वाली घर में लग दी। लेकिन जिसका लक्ष्य ही वीभत्स हो उसे क्या फर्क पड़ता है।
धीरे-धीरे घर में ओछी हरकत से सभी उसकी मंशा को समझने लगे हैं और वह गर्भवती भी हो गयी है। लेकिन इस अनचाहे गर्भ से उसे नफरत है। अनेक प्रकार से पति,सास, ससुर सभी को अपने व्यवहार से आहत करती है और सभी उसे कुछ नहीं कहते हैं। फिर भी हजारों शिकायतें पीहर वालों तक पहुंचाती रहती है। समय बीतता है और वह नहीं चाहते हुए भी मां बन जाती है। वहां भी बच्चे को पैदा करते समय बहुत ही ज्यादा गड़बड़ करती है। चिकित्सकों की सूझबूझ से बच्चा पैदा हो जाता है। घर पर बच्चे को  चिपकाए हुए रहती है ताकि कोई उसे छू नहीं सकते।आखिर यही तो उसके लिए मोहरा बनेगा और उसे करोड़पति बनाने में अपना सहयोग देगा।
वो बहुत ही ज्यादा परेशान है।कि अब तो मुझे यहां  कुछ समय तक रहना  पड़ेगा। जो उसके लिए मुश्किल है दस महीने हो गए। खानपान में लापरवाही करने पर यह बच्चा जिंदा रहा।वह इस घर से निकलने की जुगत लगाती रहती है। फिर से एक बार उसके घर वाले उसके आंसुओं के समंदर में डूब जाते हैं।और उसकी झूठी बातें सही मान कर एक और परिवार को प्रताड़ित करने में अपना सहयोग करते हुए,यह भी नहीं सोचते कि उनकी शातिर बेटी अपना घर तोड़ रही है।वह अपने माता-पिता को बुला कर रात्रि में ही चली जाती है।और घर से सारे आभूषण भी ले जाती है।और मीत के माता-पिता एवं बहन अपना सिर धुनते रह जाते हैं। उसके पास मीत का सत्रह दिन का बेटा है और वह इस बार भी एक परिवार को लूटने में सफल हो जाती है। भावनाओं से खेलने के लिए। अपने नवजात शिशु को भी अपनी कुटिलता का मोहरा बना देती है।हर महीने हर महीने अर्थ प्राप्ति का साधन समझती है। तीसरे घर की उम्मीद इस बच्चे ने खत्म जो कर दिया है।एक कुटिल मुस्कान उसके अधरों पर रेंगती है, वह सफलता के शिखर पर स्वयं को समझती है।

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