वर्तमान में एक मार्गदर्शक ज्योति पुंज हैं सात पाप

वर्तमान में, व्यक्तियों, समाजों और देशों को बिगड़ते नैतिक और नैतिक ताने-बाने के कारण कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चेतना और इन पापों की स्वीकृति नैतिक जागृति का कारण बन सकती है और समाज और दुनिया की सभी मौजूदा बुराइयों को दूर कर सकती है। भ्रष्टाचार की बढ़ती प्रवृत्ति, श्रम का आर्थिक शोषण, अन्य बातों के अलावा अत्यधिक असमानता को धन सृजन के नैतिक तरीके अपनाकर रोका जा सकता है। यदि राजनेता नैतिक सिद्धांतों का पालन करते हैं, तो सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और राजनीति के अपराधीकरण के रूप में लोकतांत्रिक समाजों के खिलाफ बुराइयों को संबोधित किया जा सकता है। काम करने की क्षमता के साथ मजबूत नैतिक चरित्रों का निर्माण-विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा की दोधारी तलवार की रचनात्मक धार को तेज कर सकता है, साथ ही यह आतंकवाद, नक्सलवाद और अलगाववाद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनैतिक और भ्रष्ट उपयोग को कम करने में प्रभावी होगा। प्राकृतिक संसाधनों के असावधानीपूर्वक उपयोग से जलवायु संकट और अंतर-पीढ़ीगत न्यायसंगतता संबंधी मुद्दे पैदा हुए हैं।

डॉ. सत्यवान सौरभ

ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और अन्य नैतिक गुणों के प्रतीक महात्मा गांधी हमारे समाज और पूरी दुनिया को नैतिक आचरण की ओर ले जाने का प्रयास किया। उनकी सात पापों संबंधी अवधारणा उनके नैतिक विश्वासों और नैतिक मूल्यों का प्रमाण है। गांधी जी के सात पाप काम के बिना धन, विवेक के बिना सुख, बिना मानवता के विज्ञान, बिना चरित्र का ज्ञान, बिना सिद्धांत की राजनीति, बिना नैतिकता के व्यापार,बिना त्याग के पूजा। सामाजिक पापों की यह सूची गांधीजी ने अपने किसी गोरे मित्र को भेजी थी। फिर उसे 22 अक्टूबर 1925 के यंग इंडिया में भी प्रकाशित किया था। गांधीजी के अनुसार नैतिकता, अर्थशास्त्र, राजनीति और धर्म अलग-अलग इकाइयां हैं, पर सबका उद्देश्य एक ही है- सर्वोदय। ये सब यदि अहिंसा और सत्य की कसौटी पर खरे उतरते हैं, तभी अपनाने योग्य हैं। राजनीति यदि लक्ष्यहीन है, निश्चित आदर्शों पर नहीं टिकी, तो वह पवित्र नहीं।

राजनीति से मिली शक्ति का उद्देश्य है- जनता को हर क्षेत्र में बेहतर बनाना। तटस्थता, सत्य की खोज, वस्तुवादिता और नि:स्वार्थ भाव एक राजनेता के आदर्श होने चाहिए। वॉलेंटरी पॉवर्टी यानी स्वेच्छा से गरीबी अपनाना और डी-पॉजेशन यानी निजी वस्तुओं का त्याग, राजनेता के लिए अनिवार्य कर्म है। धन बिना कर्म के मंजूर नहीं होना चाहिए, अनुचित साधनों से बिना परिश्रम से कमाया गया धन अस्तेय नहीं, चुराया हुआ धन है। अपने लिए जितना जरूरी हो, उतना रखकर बाकी जनता की अमानत समझकर न्यासी भाव से उसे कल्याण कामों में लगाना धनी व्यक्ति का कर्त्तव्य है। आत्मा के अभाव में सभी प्रकार के सुख सिर्फ भोग और वासना मात्र हैं। आत्मा से उनका अभिप्राय उस आंतरिक आवाज से है जो आत्म अनुशासन से सुनाई पड़ती है। यही गलत और सही का विवेक देती है। दूसरों को दुख देकर पाया गया सुख पाप है, अस्थायी है। यदि इस सुख को स्थायी बनाना है तो पहले मूलभूत सुखों से वंचित लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करो।
मनुष्य का लक्ष्य पवित्र होते हुए भी ज्ञान के बिना गलत रास्तों पर चलने का खतरा रहता है। चरित्र पर कलंक लग जाता है। सुंदर चरित्र या व्यक्तित्व के बिना ज्ञानी भी कभी-कभी पापी की कोटि में आ जाता है। राम के भक्त गांधीजी, राम को प्रत्येक नागरिक में देखना चाहते थे। व्यापार में अक्सर नैतिकता कुरबान हो जाती है, व्यापारी निजी और पेशे की नैतिकता को अलग-अलग तत्व मानते हैं। जरूरत से ज्यादा नफा लेने वाला व्यक्ति यदि अपनी दुकान पर ग्राहक का छूट गया सामान लौटा देता है तो भी वह नीतिवान नहीं माना जाएगा। जमाखोर किसी डाकू से कम नहीं होते। पूजा त्याग के अभाव में कर्मकांड मात्र रह जाती है। जीवन में धर्म का महत्व गांधीजी ने हर क्षेत्र में माना। परंतु धर्म भी आत्म विकास का साधन है। छोटे-छोटे स्वार्थों और आसक्तियों का त्याग विकास को पूर्णता की ओर ले जाता है। दूसरे धर्मों के प्रति आदर और सहनशीलता का भाव अहिंसा और सत्य का पालन है। दूसरे के धर्म में दखल देना, दूसरे धर्मावलंबियों को चिढ़ाने और लड़ने के मौके ढूंढना- पूजा की पवित्रता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं।

वर्तमान में, व्यक्तियों, समाजों और देशों को बिगड़ते नैतिक और नैतिक ताने-बाने के कारण कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चेतना और इन पापों की स्वीकृति नैतिक जागृति का कारण बन सकती है और समाज और दुनिया की सभी मौजूदा बुराइयों को दूर कर सकती है। भ्रष्टाचार की बढ़ती प्रवृत्ति, श्रम का आर्थिक शोषण, अन्य बातों के अलावा अत्यधिक असमानता को धन सृजन के नैतिक तरीके अपनाकर रोका जा सकता है। यदि राजनेता नैतिक सिद्धांतों का पालन करते हैं, तो सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और राजनीति के अपराधीकरण के रूप में लोकतांत्रिक समाजों के खिलाफ बुराइयों को संबोधित किया जा सकता है। काम करने की क्षमता के साथ मजबूत नैतिक चरित्रों का निर्माण-विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा की दोधारी तलवार की रचनात्मक धार को तेज कर सकता है, साथ ही यह आतंकवाद, नक्सलवाद और अलगाववाद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनैतिक और भ्रष्ट उपयोग को कम करने में प्रभावी होगा। प्राकृतिक संसाधनों के असावधानीपूर्वक उपयोग से जलवायु संकट और अंतर-पीढ़ीगत न्यायसंगतता संबंधी मुद्दे पैदा हुए हैं।

नैतिकता के साथ व्यापार को अपनाने से निश्चित रूप से विचारशील उत्पादन और जिम्मेदार उपभोग तरीके को बढ़ावा मिलेगा। इस प्रकार, सात पाप वर्तमान परिदृश्य में हम सभी के लिए एक मार्गदर्शक ज्योति पुंज हैं। हमें इन शिक्षाओं के माध्यम से महात्मा गांधी की नैतिक शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए और सभी की भलाई के लिए सभी प्रकार के अनैतिक कार्यों का त्याग देना करना चाहिए।

(लेखक रिसर्च स्कॉलर, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट हैं)

  • Related Posts

    भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में क्यों आंका गया है?
    • TN15TN15
    • June 13, 2026

    एस आर दारापुरी  भारत को लंबे समय तक…

    Continue reading
    बच्चों में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता
    • TN15TN15
    • June 11, 2026

    बच्चे किसी भी राष्ट्र का भविष्य होते हैं।…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    यूपी में फर्जी ब्रिगेडियर हुआ गिरफ्तार, ले रखी थी स्टार लगी कार! 

    • By TN15
    • June 13, 2026
    यूपी में फर्जी ब्रिगेडियर हुआ गिरफ्तार, ले रखी थी स्टार लगी कार! 

    अपने दम पर यूपी विधानसभा चुनाव लड़ेगी आज़ाद समाज पार्टी 

    • By TN15
    • June 13, 2026
    अपने दम पर यूपी विधानसभा चुनाव लड़ेगी आज़ाद समाज पार्टी 

    विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर सीटू गौतम बुद्ध नगर का आह्वान-बच्चों के हाथ में औजार नहीं, किताब दो

    • By TN15
    • June 13, 2026
    विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर सीटू गौतम बुद्ध नगर का आह्वान-बच्चों के हाथ में औजार नहीं, किताब दो

    वानी से इंकार, चाहिए जिला हिसार

    • By TN15
    • June 13, 2026
    वानी से इंकार, चाहिए जिला हिसार

    भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में क्यों आंका गया है?

    • By TN15
    • June 13, 2026
    भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में क्यों आंका गया है?

    CJP पर संजय राउत का बड़ा दावा, ‘अभिजीत दीपके और प्रधानमंत्री की अमेरिका में मीटिंग हुई, फोटो…’

    • By TN15
    • June 11, 2026
    CJP पर संजय राउत का बड़ा दावा, ‘अभिजीत दीपके और प्रधानमंत्री की अमेरिका में मीटिंग हुई, फोटो…’