समाजवाद को जाने और अपनाये बिना बकवास है समाजवाद की बात करना! 

चरण सिंह राजपूत 

ब देश में समाजवाद की बात की जाती है तो वैसे तो महात्मा गांधी से सबसे बड़े समाजवादी माने जाते हैं पर राजनीतिक रूप से डॉ. राम मनोहर लोहिया, लोक नारायण जयप्रकाश, आचार्य नरेंद्र देव, कर्पूरी ठाकुर चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर का नाम प्रमुख रूप से आता है। हालांकि आज की पीढ़ी में अधिकतर नेता इन समाजवादी पुरोधाओं के बारे में बहुत कम जानते हैं। इसका बड़ा कारण इन नेताओं के बाद जो समाजवादी नेता देश में स्थापित हुए उन्हें विचारधारा पर ध्यान न देते हुए जातिवाद, वंशवाद और परिवारवाद पर ही ज्यादा ध्यान दिया। ये वजह है कि जब समाजवाद की बात होती है तो अधिकतर लोग यह समझते हैं कि लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, शरद यादव नीतीश कुमार जैसे नेताओं को लेकर बात हो रही है। जो भी मेरी थोड़ी बहुत समझ समाजवाद और समाजवादियों को लेकर है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि जेपी क्रांति के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी उसके बाद समाजवादी अपने पथ से भटक कर निजी स्वार्थ की राजनीति में मशगूल हो गए। समाजवाद की बात करने वाले नेताओं को यह समझना होगा कि बंगलों में रहकर समाजवाद पर काम नहीं किया जा सकता है। संघर्ष, समर्पण और त्याग से ही समाजवाद की स्थापना हो सकती है। आज तो स्थिति यह है कि गैर बराबरी की  बात की जाये तो अधिकतर पार्टी के नेतृत्व का ही विरोध होगा। समाजवाद के नाम पर चलने वाले कई दलों में खुद पूंजीवाद हावी है। आज की तारीख में जिस तरह से समाजवादी अपने पथ से भटके हैं। जिस तरह से सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा समाजवाद का मजाक बना रही है।ऐसे में इस बात पर मंथन की जरुरत है कि क्या वास्तव में देश में सामजवाद पर काम हो रहा है। कहने को तो चाहे कांग्रेस हो, समाजवादी पार्टी हो, राजद हो, रालोद हो, एनसीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस हो, आप हो यह भी कह सकते हैं कि भाजपा को छोड़कर सभी दल समाजवाद पर चलने का दावा करते हैं पर क्या देश में समाजवाद पर काम हो रहा है ? यदि हो रहा है होता तो फिर समाजवाद पर चल रही पार्टियां पिछड़ क्यों रही हैं ?
दरअसल समाजवाद के नाम पर चल रहे अधिकतर दल वंशवाद और परिवार की नीति अपनाये हुए है। कार्यकर्ताओं को गुलाम बनाने की प्रवत्ति राजनीतिक दलों में खूब पनप रही है। ऐसे में जब तक जमीनी स्तर पर जमीनी मुद्दों को लेकर जमीनी संघर्ष नहीं होगा तब तक समाजवाद की बात करना बेमानी होगी।  सबसे पहले तो कार्यकर्ताओं के साथ ही लोगों को भी समाजवाद के बारे जानना बहुत जरुरी है। दरअसल समाजवाद एक आर्थिक-सामाजिक दर्शन है। समाजवादी व्यवस्था में धन-सम्पत्ति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियन्त्रण के अधीन रहते हैं। आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक प्रत्यय के तौर पर समाजवाद निजी सम्पत्ति पर आधारित अधिकारों का विरोध करता है। समाजवाद की एक बुनियादी प्रतिज्ञा यह भी है कि सम्पदा का उत्पादन और वितरण समाज या राज्य के हाथों में होना चाहिए। राजनीति के आधुनिक अर्थों में समाजवाद को पूंजीवाद या मुक्त बाजार के सिद्धांत के विपरीत देखा जाता है। एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में समाजवाद युरोप में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में उभरे उद्योगीकरण की अन्योन्यक्रिया में विकसित हुआ है। ब्रिटिश राजनीतिक विज्ञानी हैरॉल्ड लॉस्की ने कभी समाजवाद को एक ऐसी टोपी कहा था जिसे कोई भी अपने अनुसार पहन लेता है। समाजवाद की विभिन्न किस्में लॉस्की के इस चित्रण को काफी सीमा तक रूपायित करती है। समाजवाद की एक किस्म विघटित हो चुके सोवियत संघ के सर्वसत्तावादी नियंत्रण में चरितार्थ होती है, जिसमें मानवीय जीवन के हर सम्भव पहलू को राज्य के नियंत्रण में लाने का आग्रह किया गया था। उसकी दूसरी किस्म राज्य को अर्थव्यवस्था के नियमन द्वारा कल्याणकारी भूमिका निभाने का मंत्र देती है। जहां तक भारत में समाजवाद की बात है तो यहां पर एक अलग किस्म के सूत्रीकरण की कोशिश की गयी है। डॉ. राममनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और नरेन्द्र देव के राजनीतिक चिंतन और व्यवहार से निकलने वाले प्रत्यय को ‘गाँधीवादी समाजवाद’ की संज्ञा दी जाती है। समाजवाद अंग्रेजी और फ्रांसीसी शब्द ‘सोशलिज्म’ का हिंदी रूपांतर है। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इस शब्द का प्रयोग व्यक्तिवाद के विरोध में और उन विचारों के समर्थन में किया जाता था, जिनका लक्ष्य समाज के आर्थिक और नैतिक आधार को बदलना था और जो जीवन में व्यक्तिगत नियंत्रण की जगह सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे। समाजवाद शब्द का प्रयोग अनेक और कभी कभी परस्पर विरोधी प्रसंगों में किया जाता है, जैसे समूहवाद अराजकतावाद, आदिकालीन कबायली साम्यवाद, सैन्य साम्यवाद, ईसाई समाजवाद, सहकारितावाद, आदि – यहाँ तक कि नात्सी दल का भी पूरा नाम ‘राष्ट्रीय समाजवादी दल’ था। समाजवाद की परिभाषा करना कठिन है। यह सिद्धांत तथा आंदोलन, दोनों ही है और यह विभिन्न ऐतिहासिक और स्थानीय परिस्थितियों में विभिन्न रूप धारण करता है। मूलत: यह वह आंदोलन है जो उत्पादन के मुख्य साधनों के समाजीकरण पर आधारित वर्गविहीन समाज स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है और जो मजदूर वर्ग को इसका मुख्य आधार बनाता है, क्योंकि वह इस वर्ग को शोषित वर्ग मानता है जिसका ऐतिहासिक कार्य वर्गव्यवस्था का अंत करना है।

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